बड़ी खबर : जन्म के 97 दिन तक वेंटिलेटर पर रहा नवजात, दावा- देश का पहला मामला
दावा है कि राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश में पहला मामला है, जिसमें 97 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद नवजात स्वस्थ हुआ है.

Published : February 26, 2026 at 7:28 PM IST
कोटा: राजस्थान में कोटा के निजी और सरकारी अस्पताल में एक नवजात 97 दिन तक वेंटिलेटर पर रहने के बाद स्वस्थ हुआ है. अस्पताल में ही फीड कराते (दूध) समय एस्पिरेट कर गया था. उसकी श्वास नली में दूध चला गया था, जिसके चलते उसके हार्ट ने काम करना बंद कर दिया था. तत्काल उसे अस्पताल में सीपीआई दी गई और उसके बाद वेंटिलेटर पर लिया गया.
इसके बाद वेंटिलेटर हटाने पर नॉर्मल ऑक्सीजन पर वह मेंटेन नहीं कर पा रहा था. उसके फेफड़े लगातार सिकुड़ रहे थे. इसके कारण उसकी छाती में गड्ढे पड़ रहे थे और सांस लेने में काफी परेशानी हो रही थी. ऐसा चलता तो उसकी जान भी चली जाती, इसलिए वापस वेंटिलेटर सपोर्ट देना पड़ रहा था.
कोटा हार्ट अस्पताल के नियोनेटोलॉजिस्ट डॉ. महेंद्र गुप्ता ने बताया कि 'माय योजना' के तहत निशुल्क उपचार के लिए 2 महीने का नवजात उनके अस्पताल में भर्ती हुआ था. यह पहले से मेडिकल कॉलेज के अस्पतालों में 63 दिन वेंटिलेटर पर रहा था. हमारे यहां पर उसे नेजल एफेफओ मशीन (वेंटिलेटर) पर रखा गया था. हमारे अस्पताल में बच्चा 41 दिन भर्ती रहा, जिसमें से 34 दिन वेंटिलेटर पर रहा है.
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मूल रूप से बारां जिले के छीपाबड़ौद के भावपुरा निवासी जमनालाल लववंशी की पत्नी सविता ने मेडिकल कॉलेज के नए अस्पताल में 17 अक्टूबर को बालक को जन्म दिया था. नवजात का वजन भी 3 किलो के आसपास था. अस्पताल में ही फीड कराते (दूध) समय 19 अक्टूबर एस्पिरेट कर गया था. उसकी श्वास नली में दूध चला गया था, जिसके चलते उसके हार्ट ने काम करना बंद कर दिया था. तत्काल उसे अस्पताल में सीपीआई दी गई और उसके बाद वेंटिलेटर पर लिया गया. पहले मेडिकल कॉलेज फिर जेके लोन के बाद उन्होंने निजी अस्पताल में भर्ती करवाया था.

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अस्पताल के निदेशक डॉ. नीता जिंदल के अनुसार वेंटिलेटर पर रहकर सरवाइव करने वाला 97 दिन का नवजात के मामले में यह पहला ही मामला है. इसमें पहले मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में केयर की और उसके बाद हमने केयर की है. डॉ. अंकुर जैन ने बताया कि बच्चों को ट्रैक स्ट्रोमी डालने की जगह से सीधे नाक से ही वेंटिलेटर को कनेक्ट किया गया था. इस तरह से विदेश में कई बार उपचार होता है, लेकिन भारत में भी इस तरह से नवजातों का उपचार नेजल एफेफओ मशीन के जरिए किया गया है. ऐसा हाड़ौती में पहली बार हुआ है.
बालक के पिता जमनालाल लववंशी ने बताया कि जेके लोन में नवजात की ट्रैक स्ट्रोमी (नली) डालने के लिए चिकित्सकों ने कहा था. हालांकि, हम इसके लिए तैयार नहीं थे, इसलिए निजी अस्पताल में हमने बच्चे को भर्ती कर दिया था. यहां पर 41 दिन रहा, जिसमें से 34 दिन वेंटिलेटर पर रहा है.

