MGNREGA का नाम बदलने के खिलाफ 17 दिसंबर को कांग्रेस का प्रदर्शन
कांग्रेस के मुताबिक, राज्यों के नेता 17 दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेंगे, जबकि कार्यकर्ता 28 दिसंबर को गांवों में प्रदर्शन करेंगे.

Published : December 16, 2025 at 7:38 PM IST
नई दिल्ली: कांग्रेस 17 दिसंबर को जिला मुख्यालयों और 28 दिसंबर को गांवों में ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा (MGNREGA) का नाम बदलने के खिलाफ प्रदर्शन करेगी. जिसका उद्देश्य लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी की गरीबों के अधिकारियों के लिए राजनीति को जनता के बीच ले जाना है. खास बात यह है कि इस बीच कांग्रेस का स्थापना दिवस भी है.
कांग्रेस पार्टी (AICC) ने सभी प्रदेश इकाइयों को मनरेगा का नाम बदलने के खिलाफ प्रदर्शन करने का निर्देश दिया. कांग्रेस ने मंगलवार को लोकसभा में नाम बदलने के लिए पेश किए गए बिल का भी विरोध किया.
कांग्रेस की योजना के मुताबिक, राज्य के नेता 17 दिसंबर को जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन करेंगे, जबकि कार्यकर्ता 28 दिसंबर को गांवों में लोगों का समर्थन जुटाएंगे ताकि मतदाताओं को पिछली UPA सरकार से मिले काम के अधिकार की याद दिलाई जा सके.
एनडीए सरकार ने शुरू में मनरेगा योजना का मजाक उड़ाया था और कहा था कि इससे भ्रष्टाचार बढ़ता है, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि यह योजना देश के गांवों में बहुत सफल रही है, जहां करोड़ों खेतिहर मजदूरों को खराब मौसम में भी उनके घरों के पास काम मिला.
14 दिसंबर को, कांग्रेस ने 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के खिलाफ दिल्ली के रामलाली मैदान में एक बड़ी रैली का आयोजन किया था.
पार्टी सूत्रों के मुताबिक, विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने NDA पर वोटर लिस्ट में हेरफेर करके सत्ता में आने का आरोप लगाया और ग्रामीण रोजगार योजना का बिना किसी वजह के नाम बदलने पर नाराज थे, क्योंकि UPA के दिनों में इस योजना को बनाने में वह भी शामिल थे.
महाराष्ट्र के AICC सचिव बीएम संदीप ने ईटीवी भारत को बताया, "वे हमारे नेताओं नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को निशाना बनाते रहते हैं, लेकिन मुझे हैरानी है कि वे महात्मा गांधी के खिलाफ क्यों हैं. वे असल में UPA सरकार के दौरान शुरू की गई योजनाओं का नाम बदलकर उन्हें अपना बताना चाहते हैं. सभी राज्य इकाइयां 17 दिसंबर और 28 दिसंबर को केंद्र सरकार के इस कदम के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करेंगी. यह योजना ग्रामीण गरीबों के लिए थी, जिन पर एनडीए सरकार ध्यान नहीं दे रही है. इसीलिए इस योजना का नाम बदला जा रहा है."
उन्होंने कहा, "ग्रामीण रोजगार योजना ने 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को 543 में से 206 सीटें जीतने में अहम भूमिका निभाई थी. बाद में हमारे नेता ने भी इस बात को माना, जिन्होंने इस योजना को बनाने में भूमिका निभाई थी और बाद में भूमि अधिग्रहण बिल के पीछे भी वही थी, जो NDA सरकार को पसंद नहीं आया था."
महात्मा गांधी का नाम हटाने के अलावा, कांग्रेस नए बिल के उन प्रावधानों के भी विरोध में है जो केंद्र सरकार को अधिक नियंत्रण देते हैं, काम बांटने में स्थानीय पंचायतों की भूमिका में बदलाव करते हैं और योजना के लिए 40 प्रतिशत फंड देने का वित्तीय बोझ राज्य सरकार पर डालते हैं. पिछले कुछ वर्षों में, देश की सबसे पुरानी पार्टी ने केंद्र सरकार पर सालाना बजट में ग्रामीण रोजगार योजना के लिए फंड कम करने का आरोप लगाया था.
यह राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना 2006 में शुरू हुई थी, 2004 में UPA के सत्ता में आने के दो साल बाद, और बाद में इस योजना में महात्मा गांधी का नाम जोड़ा गया, जो महान स्वतंत्रता सेनानी के प्रति कांग्रेस पार्टी के सम्मान के अनुसार था. तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और UPA चेयरपर्सन सोनिया गांधी ने 2 फरवरी को अविभाजित आंध्र प्रदेश के अनंतपुर जिले में इस योजना को लॉन्च किया था.
झारखंड कांग्रेस के प्रभारी के राजू (Koppula Raju) ने ईटीवी भारत को बताया, "मैंने खुद इस योजना से ग्रामीण गरीबों की जिंदगी में बदलाव देखा, जिसने कोविड महामारी के दौरान लाखों लोगों को भूख से मरने से बचाया. सभी ग्राम पंचायतों में शुरू की गई इस योजना की सोशल ऑडिटिंग ने ग्रामीण गरीबों को सरकारी अधिकारियों को जवाबदेह ठहराने का अधिकार दिया. यह दुख की बात है कि न सिर्फ महात्मा गांधी का नाम हटाया गया है, बल्कि गरीबों के अधिकार भी छीने जा रहे हैं."
पूर्व आईएएस अधिकारी राजू ने आंध्र प्रदेश में इस योजना की देखरेख की थी.
मध्य प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी सचिव चंदन यादव ने ईटीवी भारत को बताया, "दिल्ली में हुई बड़ी रैली एसआईआर के नाम पर हो रही वोट चोरी के खिलाफ शक्ति प्रदर्शन था, जिसने हाल के बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्ष को नुकसान पहुंचाया. एनडीए के पक्ष में एकतरफा नतीजा चौंकाने वाला है क्योंकि यह जमीनी हकीकत के खिलाफ था. कांग्रेस पार्टी ग्रामीण रोजगार योजना का नाम बदलने के खिलाफ है और इस कदम का पूरी ताकत से विरोध करेगी. बिल रोजगार के दिनों की संख्या तो बढ़ाता है, लेकिन मजदूरी नहीं. साथ ही, इसमें मजदूरी के जल्द भुगतान के बारे में भी कोई जिक्र नहीं है, जो लालफीताशाही के कारण राज्यों में लंबित रहती है."
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