पूरे भारत में कहीं नहीं देखा होगा 'देखा-देखी भवन'
बिहार का एक भवन चर्चा का विषय बना हुआ है. आम दिखने वाला यह भवन असल में कई रिश्तों का गवाह है. पढ़ें ग्राउंड रिपोर्ट

Published : February 20, 2026 at 7:15 PM IST
रिपोर्ट: राजेश कुमार
जमुई: उत्तर भारत में लड़का और लड़की को शादी से पहले मिलवाना बड़ा अहम काम होता है. हर कोई होटल और रेस्तरां को अफोर्ड नहीं कर सकता है. ऐसे में परिवार वाले मंदिर से लेकर स्टेशन तक पहुंचते हैं. बातचीत का सिलसिला शुरू होता है और रिश्तों की डोर वहीं से बंधनी शुरू हो जाती है. कई बार लोग मंदिर या स्टेशन पर मिलने से सकुचाते नजर आते हैं. ऐसे में जमुई का 'देखा-देखी भवन' आदर्श साबित हो रहा है.
शर्म के बीच दो रिश्तों की होती है परख: बिहार के 'देखा-देखी भवन' में कुछ बुजुर्ग, पास ही खड़ी सकुचाई सी युवती और थोड़ी दूरी पर नजरें झुकाए खड़ा एक युवक, बाहर से देखने वालों को यह दृश्य साधारण लग सकता है, लेकिन यह पल बहुत खास है. यही वह पल होता है, जब दो परिवारों की तकदीर एक-दूसरे से जुड़ने लगती है. बातों-बातों में गांव, खेती, परिवार और संस्कारों का जिक्र होता है और यहीं से रिश्तों की नींव पड़ जाती है और कुछ महीनों बाद वही युवक-युवती विवाह के बंधन में बंधे नजर आते हैं.
तय हुई शादी: ईटीवी भारत संवाददाता जब ग्राउंड पर पहुंचे तो देखा कि शादी विवाद हेतु देखा-देखी भवन में लखीसराय से आए लड़के (आकाश कुमार) पक्ष के परिवार और जमुई के लड़की (अंजली कुमारी) पक्ष के परिवार के बीच बातचीत चल रही है. दोनों परिवार के लोगों ने एक-दूसरे से बात की और तमाम चीजों को समझा.
हर जिले में बने देखा-देखी भवन: लड़के के पिता देवेंद्र ठाकुर ने कहा कि हमलोग लखीसराय के चानन से आए हैं. ऐसा भवन इससे पहले कभी नहीं देखा था. यह हर जिले में बनना चाहिए. लड़का-लड़की के देखा-देखी के बाद सबकुछ तय हो गया और फिर दोनों पक्ष के लोगों ने मां काली का आशीर्वाद लिया और अपने अपने घर को लौट गए. अब दोनों परिवार शादी की तैयारी में जुट गया है.

"देखा-देखी भवन देखकर बहुत खुशी हो रही है. यहां अनिवार्य है और हर जगह होना चाहिए. हमारी तो सरकार से मांग है कि हर जिले, प्रखंड, पंचायत में इस प्रकार की व्यवस्था की जाए, ताकि गरीब परिवार जो होटल या हॉल का खर्चा उठाने में सक्षम नहीं है, उन्हें सहुलियत होगी. पहले भी देखते आए हैं कि धार्मिक स्थलों में गरीब परिवार शादी विवाह करवाते हैं. ऐसे में धार्मिक स्थलों के आसपास भी इस तरह का भवन बना दिया जाए तो गरीब और मध्यमवर्गीय लोगों को काफी मदद मिलेगी."- देवेंद्र ठाकुर, लड़के के पिता
लड़की के पिता ने जाहिर की खुशी: ईटीवी भारत से बात करते हुए लड़की पक्ष से लड़की के पिता अशोक ठाकुर ने कहा कि "हम जमुई के झाझा प्रखंड के रहने वाले हैं. लड़का और लड़की पक्ष से दोनों परिवार पहुंचा है. हम अपनी लड़की के रिश्ते के लिए यहां आए हैं. इस तरह का भवन इससे पहले हमने कहीं आजतक नहीं देखा था. देखकर काफी प्रसन्नता हुई. गरीब परिवार को सहयोग मिल रहा है."

ऐसा भवन पहले कभी नहीं देखा: वहीं लड़का पक्ष के साथ आए राजकुमार शर्मा ने बताया कि कहीं भी 'ऐसा भवन, ऐसी स्वच्छता, ऐसी व्यवस्था नहीं देखी थी. यहां आकर जानकारी मिली कि पहले यह एक यात्री पड़ाव था, जो जर्जर हो गया था. लोग उपयोग नहीं कर पाते थे, लेकिन उक्त भवन को नया रूप दिया गया.
"जिस तरह से इस भवन को व्यवस्थित किया गया है और सुचारू तरीके से देखभाल की जा रही है, यह एक अदभुत और सराहनीय काम है. सरकार को स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद, मंत्री को भी इस ओर ध्यान देना चाहिए और भी जिले में और पंचायत स्तर पर भी इस प्रकार के भवन का निर्माण किया जाना चाहिए."- राजकुमार शर्मा, लड़का पक्ष के साथ आए शख्स

जमुई का देखा-देखी भवन: बिहार का इकलौता 'देखा-देखी भवन' जमुई जिले में है. इस भवन के अस्तित्व में आने की कहानी भी बहुत दिलचस्प है. दरअसल जमुई-मलयपुर मार्ग पर एक यात्री शेड का निर्माण तत्कालीन सांसद और मंत्री रहे आरजेडी के नेता जय प्रकाश नारायण यादव ने करवाया था, लेकिन कुछ समय बाद इस शेड की स्थिति दयनीय हो गई. रख रखाव के अभाव में यह शेड कभी भी जमींदोज हो सकता था.

मंदिर प्रबंधन ने लिया संज्ञान: सरकारी उपेक्षा का शिकार इस यात्री शेड पर तब पास के ही काली मंदिर के प्रबंधन संचालक अशोक सिंह की नजर पड़ी. उन्होंने यात्री शेड का कायाकल्प कर दिया और भव्य काली मंदिर का निर्माण करवाने वाले अशोक सिंह ने मंदिर कमेटी की ओर से यात्री शेड का जीर्णोद्धार कराया. उन्होंने यहां बैठने के लिए पक्की व्यवस्था, लाइट, पंखा, शौचालय, पीने के पानी आदि का इंतजाम कराया. भवन का रंगरोगन कर उसे नया नाम 'शादी विवाह हेतु देखा देखी भवन' दिया गया.
अशोक सिंह ने बनाया भवन: मां कालिका मंदिर के संस्थापक मलयपुर निवासी अशोक सिंह ने बताया कि लोग दूर-दूर से काली मंदिर में पूजा करने आते हैं. कई जोड़ों की शादी तय करने के लिए परिवार वाले मंदिर में आते थे, लेकिन लोगों की संख्या ज्यादा होती थी. सबसे अधिक परेशानी बारिश के मौसम में होती थी. मंदिर में अधिक लोगों को रोकने की व्यवस्था नहीं थी. ऐसे में जर्जर यात्री शेड को देखा-देखी भवन का रूप देने का आइडिया आया.

"यात्री शेड बनने के दो साल बाद निवर्तमान सांसद जय प्रकाश नारायण यादव ने हमें यात्री शेड के पीछे शौचालय बनाने के लिए अपनी जेब से 60 हजार रुपये दिए थे. 60 हजार मैंने अपनी जेब से लगाए और 5 शौचालय और एक टंकी का निर्माण कराया. फिर हमने इसका नाम देखा-देखी भवन कर दिया. गरीब परिवार यहां जुटते हैं और रिश्ता तय करते हैं. यह सेवा पूरी तरह से फ्री है."- अशोक सिंह, संस्थापक, काली मंदिर

साफ-सफाई से लेकर सारी व्यवस्था करता है प्रबंधन: सबसे खास बात यह है कि यात्री शेड से देखा-देखी भवन बनने के बाद इस एरिया की साफ-सफाई का जिम्मा भी मंदिर प्रबंधन ने अपने कंधों पर उठा लिया है. मंदिर और भवन के आस-पास साफ-सफाई से लेकर कचरा प्रबंधन और सड़क की धुलाई तक का काम मंदिर प्रबंधन ही करता है. यही कारण है कि देखा-देखी भवन के आस-पास गंदगी का नामोनिशान नहीं है.
क्यों रखा गया नया नाम?: नए नामकरण के बारे में मंदिर के संस्थापक अशोक सिंह ने बताया कि कई बार हमने देखा है कि गरीब परिवार मंदिर के आसपास लड़की लड़का देखा देखी भी करते हैं. यहां तक की मंदिर में शादी विवाह भी साधारण तरीके से करते हैं. तभी ख्याल आया कि मंदिर के आसपास होने के कारण नए लुक में यात्री शेड का निर्माण भी हो गया है और नया नाम भी इसे दे दूं, ताकि रस्मों के साथ जोड़ियां यहां आराम से बन सके. आज इसका इस्तेमाल राहगीर, श्रद्धालु के साथ- साथ शादी विवाह करने वाले गरीब परिवार भी कर रहे हैं.
कई वर्ग करते हैं भवन का इस्तेमाल: स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां राहगीर यात्री तो बैठते ही हैं, मंदिर के ठीक सामने रहने के कारण पूजा अर्चना करने आए श्रद्धालु भी विश्राम करते हैं. साथ ही शादी विवाह के सीजन में गरीब परिवार वर वधू पक्ष के लोग भी पहुंचते हैं. लड़की-लड़का (वर-वधू) का देखा देखी और दोनों परिवार का मिलना- जुलना भी उक्त स्थान पर ही हो जाता है.
"पहले तो ऐसा भवन नहीं देखा था. हां मंदिर में शादी होते देखा था, लेकिन इस प्रकार का इंतजाम किया जाए तो बहुत सहुलियत होगी."- संजू देवी, ग्रामीण महिला
बैठने की खास व्यवस्था: देखा-देखी भवन में चारों तरफ सीमेंट का चबूतरा बनाया गया है, ताकि ज्यादा भीड़ होने पर भी लड़का और लड़की का कुनबा आराम से बैठ सके. साथ ही एक चबूतरा थोड़ा पास बनाया गया है, जिसमें लड़का-लड़की बैठकर आमने-सामने बातचीत कर सकें. भवन में पंखा, बिजली, पीने के पानी और शौचालय का भी इंतजाम है.स्थानीय लोगों का कहना है कि अगल-बगल कोई दूसरा यात्री शेड नहीं था. रास्ते में बस एक ही जर्जर यात्री शेड था, जिसका राहगीर उपयोग नहीं कर पा रहे थे.
लंबे समय तक किसी ने नहीं ली सुध: राह चलते लोग सड़क किनारे पेड़ों के नीचे कहीं भी ठहरकर विश्राम करते थे. इसी बीच बगल में भव्य काली मंदिर का निर्माण हुआ. मंदिर के आसपास की काया ही बदल गई. मंदिर के ठीक सामने वर्षो से जर्ज़र हालत में पड़े यात्री शेड की कोई सुध लेने वाला नहीं था. जबकि मंदिर में पूजा-अर्चना करने के लिए इसी रास्ते से स्थानीय अधिकारी, पदाधिकारी, विधायक, सांसद मंत्री भी पहुंच चुके हैं.
आरजेडी नेता का सरकार पर हमला: ईटीवी भारत से बात करते हुए राजद नेता व पूर्व मंत्री जय प्रकाश नारायण यादव ने कहा कि चतुर्दिक विकास के लिए एक जनप्रतिनिधि को भी अपने दायित्व का निर्वहन ठीक ढंग से करना चाहिए. साथ ही उन्होंने वर्तमान सरकार पर जमकर निशाना साधा.
"जाके पांव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई. सरकार में रहने के दौरान राजद ने लालू यादव ने जनता के लिए बहुत काम किए हैं. रेलवे पुल से लोगों को लाभ हुआ. जमीन का दाम सौ गुणा बढ़ा है और 10 हजार परिवार बस गए हैं."- जय प्रकाश नारायण यादव, पूर्व मंत्री व राजद नेता

खंडहर से रिश्ते का सफर: वाकई मलयपुर का शादी विवाह हेतु देखा देखी भवन केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा भर नहीं है, बल्कि एक सोच का दूरगामी परिणाम है. यह मिसाल है कि अगर नीयत साफ हो और जनता के लिए मन में कुछ करने का जज्बा हो तो एक खंडहर को भी रिश्तों की बुनियाद रखने वाली खूबसूरत जगह में बदला जा सकता है.
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