पहले थे PA और आज हैं बिहार के बड़े नेता.. केंद्रीय मंत्री तक की इनसाइड स्टोरी जानें
PA के रूप में जमीनी अनुभव, कूटनीति और प्रशासनिक समझ से ये नेता बिहार की राजनीति के शीर्ष पर पहुंचे. रंजीत कुमार की रिपोर्ट..

Published : July 5, 2026 at 7:18 AM IST
पटना: बिहार की राजनीति में इन दिनों एक बदलाव देखने को मिल रहा है. बड़े राजनेताओं के निजी सहायक अब नीति निर्धारक की भूमिका में दिखे रहे हैं. निजी सहायकों की बढ़ती भूमिका इस बात का संकेत है कि अब केवल जनाधार ही नहीं, बल्कि नेतृत्व का भरोसा, संगठनात्मक अनुभव और लंबे समय की निष्ठा भी राजनीतिक उन्नति का महत्वपूर्ण आधार बन रहे हैं. बिहार के तमाम दलों में ऐसी मिसाल भरे पड़े हैं.
बिहार की राजनीति में PA का बढ़ता प्रभाव: कई पूर्व निजी सहायक आज मंत्री, सांसद, संगठन के शीर्ष पदों और रणनीतिक भूमिका में हैं. राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, वर्षों की नजदीकी और भरोसा उन्हें नेतृत्व की पहली पसंद बनाता है. कई ऐसे चेहरे हैं, जिन्होंने निजी सहायक के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया और आज की तारीख में वो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का हिस्सा बन चुके हैं. कई नेता तो केंद्र और बिहार की सरकार में नीति निर्धारक की भूमिका में हैं.
ललन सिंह और संजय झा: जदयू में ऐसे कई उदाहरण हैं जो इस बात को तस्दीक हैं कि निजी सहायकों की भूमिका राजनीति में बढ़ी है. खासतौर पर अगर जनता दल यूनाइटेड की बात करें तो पार्टी के दो बड़े पद ऐसे नेताओं के हाथ में हैं, जो कभी निजी सहायक हुआ करते थे.
संभाल रहे अहम जिम्मेदारियां: जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने सियासत की नई रेखा खींची है. पार्टी के वरिष्ठ नेता ललन सिंह और संजय झा संगठन और सरकार दोनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा रहे हैं. राजनीतिक गलियारों में इन्हें नेतृत्व के भरोसेमंद सहयोगियों के रूप में देखा जाता है.

JDU के नीति निर्धारक की भूमिका में ललन सिंह: बात अगर केंद्रीय मंत्री ललन सिंह की कर ले तो ललन सिंह उर्फ राजीव रंजन सिंह किसी जमाने में जननायक कर्पूरी ठाकुर के निकट सहयोगी हुआ करते थे. बाद के दिनों में जब सुधा श्रीवास्तव मंत्री बनीं तो ललन सिंह की भूमिका निजी सहायक की थी. धीरे-धीरे जनता दल यूनाइटेड के अंदर ललन सिंह का कद बढ़ता गया और नीतीश कुमान ने उन्हें अहम जिम्मेदारियां सौंपी.
ललन सिंह बिहार सरकार में मंत्री रहे और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचे. वर्तमान में राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह नरेंद्र मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं. पार्टी के अंदर महत्वपूर्ण फैसले में ललन सिंह की भूमिका होती है.राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह कुल 5 बार सांसद (MP) रहे हैं, जिसमें 4 बार लोकसभा (2004, 2009, 2019, 2024) और एक बार राज्यसभा (2000-2004) शामिल है. इसके अलावा, वह 1 बार विधान पार्षद (MLC) रहे हैं.
अरुण जेटली के करीबी हुआ करते थे संजय झा: जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा की गिनती जनता दल यूनाइटेड में कद्दावर नेता के रूप में होती है. संजय झा वर्तमान में राज्यसभा सांसद हैं और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष हैं. संजय झा बिहार सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं. नीतीश कुमार के विश्वास पात्र होने के चलते संजय झा को पार्टी की कमान मिली है.

संजय झा किसी जमाने में राजीव प्रताप रूढ़ी के निजी सहायक हुआ करते थे. बाद में वह पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के सहयोगी के रूप में भी रहे. भाजपा छोड़ने के बाद संजय झा जनता दल यूनाइटेड में आए और मुड़कर कभी पीछे नहीं देखा.
RJD में भी निजी सहायकों का कद बढ़ा है: राष्ट्रीय जनता दल में भी कई नेताओं ने निजी सहायक के रूप में काम करने के बाद बड़ा राजनीतिक मुकाम हासिल किया. सबसे ऊपर नाम अब्दुल बारी सिद्दीकी का आता है. अब्दुल बारी सिद्दीकी राजनीति के शुरुआती दौर में जननायक कर्पूरी ठाकुर के निजी सहायक हुआ करते थे.

अब्दुल बारी सिद्दीकी बिहार सरकार में वित्त मंत्री रहे और पार्टी ने उन्हें नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी वर्तमान में वह विधान पार्षद हैं. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी बिहार विधानसभा के 7 बार विधायक रह चुके हैं. उन्होंने अपने संसदीय करियर की शुरुआत 1977 में बहेड़ा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव जीतकर की थी.
लालू के हनुमान कहे जाते थे भोला यादव: भोला यादव ऐसे नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने संगठन और सत्ता दोनों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं है. भोला यादव को लालू प्रसाद यादव का हनुमान कहा जाता था और लंबे समय तक भोला यादव लालू प्रसाद यादव के निजी सहायक रहे. लालू प्रसाद यादव ने भोला यादव को विधानसभा का टिकट दिया और वह विधायक बनने में कामयाब हुए.
पार्टी के भीतर रणनीतिक फैसलों में भी इनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती रही है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता भोला यादव साल 2014 से 2015 तक बिहार विधान परिषद के सदस्य (MLC) और साल 2015 से 2020 तक बहादुरपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक (MLA) रहे.
आरसीपी सिंह के करीबी हुआ करते थे अभय कुशवाहा: राष्ट्रीय जनता दल के एक और नेता आज शीर्ष पर हैं. अभय कुशवाहा औरंगाबाद से सांसद हैं और पार्टी में उन्हें संसदीय दल का नेता बनाया है. अभय कुशवाहा जनता दल यूनाइटेड में रह चुके हैं और जब आरसीपी सिंह केंद्रीय मंत्री थे, तब अभय कुशवाहा, आरसीपी सिंह के निजी सहायक हुआ करते थे.

अभय कुशवाहा एक बार विधायक और एक बार सांसद रहे हैं. आपको बता दें कि अभय कुशवाहा साल 2015 में टिकारी (गया) विधानसभा क्षेत्र से चुने गए थे और फिर साल 2024 के लोकसभा चुनाव में औरंगाबाद निर्वाचन क्षेत्र से जीतकर पहली बार सांसद बने.
तेजस्वी के करीबी हैं संजय यादव: राष्ट्रीय जनता दल में तेजस्वी यादव के बाद सबसे ताकतवर नेता के रूप में संजय यादव उभरे हैं. संजय यादव हरियाणा के रहने वाले हैं और तेजस्वी यादव के छात्र जीवन के दोस्त हैं. जब तेजस्वी यादव सक्रिय राजनीति में आए तब संजय यादव की राष्ट्रीय जनता दल में एंट्री हुई. तब से लेकर आज तक संजय यादव लगातार तेजस्वी यादव का साथ निभा रहे हैं.

राष्ट्रीय जनता दल के अंदर संजय यादव को पार्टी का रणनीतिकार कहा जाता है. तेजस्वी यादव की सियासत में संजय यादव की महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है. संजय यादव लंबे समय तक तेजस्वी यादव के निजी सचिव के तौर पर रहे और लॉयल्टी के बदौलत उन्हें तेजस्वी यादव ने राज्यसभा भी भेजा. सामान्य तौर पर संजय यादव साये की तरह तेजस्वी यादव के साथ रहते हैं.
भाजपा ने युवाओं को दिया है मौका: भाजपा में युवाओं को जिम्मेदारी दी जा रही है. इसी क्रम में कुछ युवा नेताओं को संगठन की जिम्मेदारी दी गई है. हाल के संगठनात्मक विस्तार में संतोष रंजन और प्रभाकर मिश्रा को महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए हैं. इसे संगठन के भीतर लंबे समय तक काम करने वाले कार्यकर्ताओं और सहयोगियों पर नेतृत्व के भरोसे के रूप में देखा जा रहा है.

संतोष रंजन केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के करीबी: भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी ने अपनी टीम में संतोष रंजन को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है. इससे पहले सम्राट चौधरी के टीम में संतोष रंजन प्रदेश मंत्री थे. आपको बता दें कि संतोष रंजन शुरुआती दौर से गिरिराज सिंह के करीबी नेता माने जाते हैं. लंबे समय तक संतोष रंजन ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के निजी सहायक के रूप में काम किया है. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के साथ काम करने का फायदा संतोष रंजन को मिला और पार्टी ने उन्हें वर्तमान में मुंगेर जिले का प्रभारी भी बना रखा है.
नंदकिशोर यादव के करीबी हुआ करते थे प्रभाकर मिश्रा: प्रभाकर मिश्रा को बिहार बीजेपी का प्रदेश मंत्री बनाया गया है. प्रभाकर मिश्रा की पहचान राजनीति में नंदकिशोर यादव को लेकर हुई है. नंदकिशोर यादव बिहार भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हैं. वर्तमान में वह नागालैंड के राज्यपाल हैं.

प्रभाकर मिश्रा शुरुआती दौर से नंदकिशोर यादव के साथ रहे हैं और जब नंद किशोर यादव बिहार सरकार में मंत्री थे, तब प्रभाकर मिश्रा उनके निजी सचिव हुआ करते थे. लगभग डेढ़ दशक तक प्रभाकर मिश्रा नंदकिशोर यादव के साथ रहे और उनके साथ काम करने का लाभ भी प्रभाकर मिश्रा को मिला.
अब्दुल बारी सिद्दीकी ने क्या कहा? : ईटीवी भारत संवाददाता से बातचीत के दौरान राष्ट्रीय जनता दल के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने अनुभव साझा करते हुए कहा, "मैं राजनीति के गुर जननायक कर्पूरी ठाकुर से सीखे है. कर्पूरी ठाकुर के साथ काम करने का मेरा लंबा अनुभव रहा है. कर्पूरी ठाकुर सामाजिक न्याय के पुरोधा थे और उन्हीं की पाठशाला में रहकर मैंने सियासत को आगे बढ़ाया."
जनता दल यूनाइटेड से राष्ट्रीय जनता दल में आए अभय कुशवाहा ने ईटीवी भारत संवाददाता के सवाल के जवाब में कहा कि लालू प्रसाद यादव से हम राजनीति सीखते हैं और वह सामाजिक न्याय के पुरोधा है. लालू प्रसाद यादव की राजनीति हर रोज हमें नई ऊर्जा देती है. आरपी सिंह के साथ काम करने को लेकर अभय कुशवाहा ने कहा कि हमने कई नेताओं के साथ काम किया है उसमें एक वह भी हैं.
"लालू यादव ने देश ही नहीं बल्कि दुनिया को राजनीति का नया आयाम दिखाया है. जिस तरह से शोषित वंचित समाज, पिछड़े अति पिछड़े, दलित के उत्थान के लिए लालू प्रसाद यादव ने जिस पार्टी का गठन किया था और उसी संकल्प को लेकर आगे बढ़ाया जा रहा है."- अभय कुशवाहा, सांसद, आरजेडी

भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश उपाध्यक्ष संतोष रंजन ने कहा कि मुझे राजनीति में लाने का श्री स्वर्गीय नवीन किशोर सिन्हा को जाता है उन्होंने मुझे मंडल अध्यक्ष बनाया था. बात के दिनों में मैं माननीय गिरिराज सिंह के साथ जुड़ा और तब से उनके साथ जुड़ा हुआ है.
"मैं युवा मोर्चा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रहा, उसके बाद बिहार में प्रदेश मंत्री बना. आज की तारीख में पार्टी में मुझे प्रदेश उपाध्यक्ष मनाया है. मैं अपने वरिष्ठ नेताओं से सीख कर लगातार आगे बढ़ रहा हूं."- संतोष रंजन, प्रदेश उपाध्यक्ष, बीजेपी

राबड़ी देवी के पूर्व पीए डॉ. भीम सिंह: बिहार के वरिष्ठ राजनेता डॉ. भीम सिंह अति पिछड़ा समाज के चंद्रवंशी समुदाय से आते हैं. वह पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के निजी सहायक (PA) के रूप में कार्य कर चुके हैं. वर्तमान में वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से राज्यसभा सांसद हैं और उन्हें सूबे में भाजपा की अति पिछड़ा राजनीति की मजबूत कड़ी माना जाता है.
नीतीश सरकार में संभाली जिम्मेदारी: जदयू छोड़कर भाजपा में शामिल हुए डॉ. भीम सिंह दो बार बिहार विधान परिषद के सदस्य (MLC) रहे हैं, हालांकि वे कभी विधानसभा (MLA) के सदस्य नहीं चुने गए. वे नीतीश कुमार की सरकार में पंचायती राज और ग्रामीण विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रह चुके हैं.
सुर्खियों में मंत्री नंदकिशोर राम: बिहार सरकार के पशुपालन मंत्री नंदकिशोर राम इन दिनों सियासी गलियारों में काफी सुर्खियों में बने हुए हैं. महादलित समुदाय से आने वाले नंदकिशोर राम को हाल ही में पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी को पहले आवंटित रहा पटना का प्रतिष्ठित 'द सर्कुलर रोड' स्थित सरकारी फ्लैट आवंटित किया गया है.
निजी सहायक से कैबिनेट मंत्री तक: नंदकिशोर राम का राजनीतिक सफर भी काफी दिलचस्प रहा है. वे पूर्व मंत्री जनक राम के उस समय निजी सहायक (PA) हुआ करते थे जब जनक राम बिहार सरकार में खनन एवं भूतत्व मंत्री पद संभाल रहे थे. वर्तमान में वह पहली बार विधायक चुने जाने के बाद सीधे कैबिनेट मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं.
पहली बार में दर्ज की बड़ी जीत: उन्होंने वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार पश्चिम चंपारण की रामनगर (SC) सीट से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था. इस चुनाव में उन्होंने राजद के सुबोध कुमार को 22,773 वोटों से हराया था. भाजपा ने अपनी दिग्गज नेता पद्मश्री भागीरथी देवी का टिकट काटकर उन पर भरोसा जताया था.
एक्सपर्ट ने क्या कहा?: वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक कौशलेंद्र प्रियदर्शी कहते हैं इन दिनों कई ऐसे निजी सहायक हैं, जो सत्ता के शीर्ष पर हैं. ललन सिंह, संजय झा, अभय कुशवाहा, अब्दुल बारी सिद्दीकी सरीखे नेता आज टॉप पर हैं. निजी सहायक रहते हुए नेताओं ने राजनीति का अनुभव सीखा और बात के दिनों में उसे अनुभव का लाभ भी नेताओं को मिला.
"बड़े नेता अपने निजी सहायकों की मेहनत और भरोसे की बदौलत मुकाम हासिल करते हैं और जब उन्हें मुकाम मिल जाता है तो अपने सहायक को पुरस्कार भी देते हैं. उनकी राजनीति की गाड़ी चल पड़ती है."- कौशलेंद्र प्रियदर्शी,राजनीतिक विश्लेषक

PA कल्चर क्यों सफल है?: सवाल उठता है कि राजनीति में आखिर पीए कल्चर क्यों सफल है. इसके पीछे कुछ खास कारण है. पहला सूबे के जातीय समीकरणों को फाइलों और आंकड़ों में बारीकी से पीए लंबे वक्त तक समझते हैं. दूसरा पार्टी के आम कार्यकर्ताओं की नब्ज और उनकी मांगों को पहचानने में माहिर हो जाते हैं. सबसे बड़ा कारण है नौकरशाही से कैसे काम निकलवाना है, इसमें भी वह माहिर हो जाते हैं.
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