Explainer 34 साल की सत्ता को गिराने वाली दीदी… 15 साल बाद खुद कैसे हार गई?
2011 की जीत से 2026 की हार तक… पूरी कहानी

Published : May 5, 2026 at 2:53 PM IST
|Updated : May 5, 2026 at 5:05 PM IST
वीडियो टीम हिंदी
कोलकाता से लेकर दिल्ली तक हर तरफ जीत का जश्न है. हर तरफ कार्यकर्ताओं में उत्साह है. आज ये जश्न बीजेपी का है. ठीक पंद्रह पहले ऐसा ही जश्न टीएमसी ने मनाया था.
बात 2011 की है. 34 सालों के कम्युनिस्ट शासन को धूल चटाकर ममता बनर्जी यानी दीदी सत्ता में आईं, लेकिन पंद्रह साल बाद उनका भी किला ढह गया. 2026 के विधानसभा चुनाव में उन्हें बीजेपी के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा. ईटीवी भारत के आज के एक्सप्लेनर में बात करेंगे कि बंगाल की सत्ता में दीदी का उदय कैसे हुआ? कैसे वह एक के बाद एक विवादों में घिरती गईं और आखिरी कैसे दीदी के लोकप्रिय शासन का पतन हो गया?
लेफ्ट के खिलाफ गुस्सा और ममता का उदय
2011 में दीदी का सत्ता में आना एक करिश्मा था, क्योंकि उन्होंने 34 साल तक चली CPM के नेतृत्व वाली सरकार को शिकस्त दी. बंगाल की तत्कालीन कम्युनिस्ट सरकार ने भूमि सुधार और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में कई काम किए लेकिन 2000 के दशक के अंत तक आते-आते उनके खिलाफ लोगों का गुस्सा चरम पर पहुंच गया. सिंगुर विवाद ने आग में घी डालने का काम किया.

सिंगुर और नंदीग्राम से दीदी की राजनीति की रफ्तार
साल 2006 में तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने सिंगुर में टाटा की नैनो कार फैक्ट्री के लिए 997 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया. कई किसानों ने जबरन उपजाऊ जमीन छीनने और उसके लिए कम मुआवजा देने का आरोप लगाया.
लोगों के गुस्से को ममता बनर्जी की टीएमसी ने भुनाया. ममता दीदी मां, माटी और मानुष का नारा देकर आंदोलन पर उतर आईं. उन्होंने भूख हड़ताल की. वामपंथी सरकार ने जिस तरह से उस आंदोलन को कुचलने की कोशिश की. उसके खिलाफ लोगों का गुस्सा और भड़क गया...
कड़े विरोध और हिंसा के कारण अक्टूबर 2008 में टाटा को अपनी फैक्ट्री बंगाल से उठाकर गुजरात ले जानी पड़ी. ये पश्चिम बंगाल की लेफ्ट सरकार के लिए बहुत बड़ी सियासी हार थी. इस हार ने बंगाल से वामपंथी सरकार की विदाई की पटकथा तैयार कर दी.
सिंगुर की पटकथा को नंदीग्राम में विस्तार मिला. पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम में सरकार ने एक 'स्पेशल इकोनॉमिक जोन' यानी SEZ के लिए जमीन लेनी चाही. इस बार किसानों ने पहले से ज्यादा विरोध किया. 14 मार्च 2007 को पुलिस की फायरिंग में 14 ग्रामीण मारे गए. इस घटना ने लेक्ट सरकार के खिलाफ लोगों के गुस्से को भड़का दिया.
किसानों के दर्द में दीदी किसानों की मसीहा बनकर उभरीं. उन्होंने ना सिर्फ लंबा अनशन किया, बल्कि नंदीग्राम और सिंगुर जाकर पीड़ित किसानों से मिलीं. बंगाल के लोगों ने ममता की आवाज को बुलंद किया. मई 2011 के विधानसभा चुनाव में मानों पूरा बंगाल उनके पीछे चल पड़ा. तृणमूल कांग्रेस को 294 में 227 सीटें हासिल की और लेफ्ट फ्रंट को महज 62 सीटों पर सिमटना पड़ा.

दीदी युग और लोगों में निराशा
इस जीत के साथ ही, बंगाल में दीदी युग की शुरुआत हुई. शुरू-शुरू में लोगों को दीदी से काफी उम्मीदें थीं... लेकिन जब धरातल पर दीदी की योजनाएं उतरने लगीं तो लोगों को उनसे भी निराशा होने लगी.
दीदी ने किसानों की जमीन बचाने का वादा किया था, जिसे उन्होंने निभाया भी, लेकिन इसका नकारात्मक पहलू ये हुआ कि राज्य में कोई नई बड़ी फैक्ट्री नहीं लग पाई. सिंगुर और नंदीग्राम ने निवेशकों को डरा दिया. नतीजा हुआ कि पश्चिम बंगाल का औद्योगिक विकास रुक गया. आंकड़े बताते हैं कि 1960 के दशक तक जो पश्चिम बंगाल देश का सबसे बड़ा औद्योगिक केंद्र था, 2026 आते-आते वहां का औद्योगिक उत्पादन महज 3-4 फीसदी रह गया. इससे सबसे बड़ा नुकसान युवाओं को हुआ– नौकरियां नहीं मिल रही थीं. हर साल लाखों युवा पढ़ाई पूरी कर बेरोजगारों की कतार में जुड़ते गए.
खाली सरकारी खजाना और असंतोष
ममता के खिलाफ लोगों के निराशा की दूसरी वजह थी.. खाली होता सरकारी खजाना और राज्य पर बढ़ता कर्ज़.. 2011 में राज्य का कुल कर्ज 1 लाख 91 हजार करोड़ रुपये था, जो 2025 तक बढ़कर 7 लाख 70 हजार करोड़ के पार पहुंच गया. इसके उलट ममता सरकार ने कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू की. योजनाएं अच्छी थीं, लेकिन इसने सरकारी खजाने को खाली कर दिया. सरकार को अपने खर्चों को पूरा करने के लिए कर्ज लेना पड़ा. यानी सरकार अपनी कुल कमाई का एक बड़ा हिस्सा सिर्फ कर्ज का ब्याज चुकाने में लगा रही थी. विकास कार्यों के लिए पैसों की कमी होती गई.

परिवारवाद और बगावत
एक तरफ सरकार कर्ज में दबी थी और दूसरी तरफ पार्टी में ही परिवारवाद को लेकर बगावत शुरू हो गई. ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी को धीरे-धीरे पार्टी में सबसे ताकतवर दूसरा नेता माना जाने लगा. इससे पुराने साथी नाराज होने लगे. सबसे बड़ा धक्का तब लगा जब ममता दीदी के करीबी सहयोगी सुवेंदु अधिकारी ने 2021 के चुनाव से ठीक पहले TMC छोड़कर भारतीय जनता पार्टी बीजेपी का दामन थाम लिया. उन्होंने ममता सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए. इसके बाद वह बंगाल में BJP के सबसे बड़े चेहरे बन गए. यह ममता दीदी के लिए एक व्यक्तिगत और राजनीतिक दोनों तरह की बड़ी चोट थी.
पश्चिम बंगाल में पॉलिटिकल हिंसा
दीदी लेफ्ट के जुर्म और अत्याचार के खिलाफ लड़ाई लड़कर सत्ता में आई, लेकिन उनके शासन में भी हिंसा जारी रही. पंचायत चुनाव हों या नगर निगम, हर बार मारपीट और झड़पों की खबरें आती रहीं. विपक्षी पार्टियों ने हमेशा शिकायत की कि TMC के कार्यकर्ता डर का माहौल बनाते हैं.
संदेशखाली में तत्कालीन टीएमसी नेता शाहजहां शेख पर महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और जमीन हड़पने के आरोप लगे. जनवरी 2024 में जब ईडी की टीम राशन घोटाले की जांच के सिलसिले में वहां पहुंची तो शाहजहां के गुर्गों ने ईडी पर हमला कर दिया. इसी तरह दक्षिण 24 परगना के फालटा में टीएमसी उम्मीदवार जहांगीर खान और उनके करीबियों पर डराने-धमकाने का आरोप लगे.
आरजी कर कॉलेज कांड
बंगाल की वो घटना जिसने पूरे देश को हिला दिया... वो थी कोलकाता के आरजी कर कॉलेज की घटना. 9 अगस्त 2024 को 31 साल की महिला ट्रेनी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म हुआ और उसकी हत्या कर दी गई. इसके खिलाफ पूरे देश के डॉक्टर, छात्र और आम लोग एक जुट हो गए और न्याय की मांग की.. इस घटना ने पश्चिम बंगाल में महिलाओं की सुरक्षा पर गंभीर सवाल उठाए.
भ्रष्टाचार और घुसपैठ के आरोप
आरोपों की कड़ी में कटमनी भी शामिल है. बीजेपी चुनावी रैलियों में अक्सर आरोप लगाती रही कि ममता बनर्जी के लोग आम लोगों से कमीशन वसूलते हैं. इतनी ही नहीं, ममता सरकार पर बांग्लादेशी घुसपैठियों की भी मदद करने और उन्हें संरक्षण देने का आरोप लगा है. आरोप है कि ये घुसपैठिये पश्चिम बंगाल में अपराध करते हैं. चुनाव के दौरान ये लोग तृणमूल कांग्रेस की मदद करते हैं और वोटरों को धमकाते रहे हैं. इससे ममता के पुराने समर्थकों में नाराजगी बढ़ती गई.
वोटरों में असंतोष और दीदी की विदाई
2026 के विधानसभा चुनाव में जब वोटरों ने अपनी नाराजगी का इजहार किया तो ममता बनर्जी की सत्ता का सिंहासन हिल गया... नतीजे के दिन दीदी ने शुरू में EVM में गड़बड़ी के आरोप लगाए.. लेकिन जैसे-जैसे आंकड़े स्पष्ट हुए, उन्हें हार माननी पड़ी और और इस तरह उनकी 15 साल के शासन का अंत हो गया...
जिस जनता ने साल 2011 में उन्हें सिंहासन पर बैठाया, उसी जनता ने 2026 में दीदी को सत्ता से बेदखल कर दिया..जनता को अब बीजेपी से उम्मीदें हैं...और बीजेपी पर उन उम्मीदों पर खरे उतरने की जिम्मेदारी है.

