बिहार में यहां से हुई थी तिलकुट बनाने की शुरुआत! देश से लेकर लंदन-अमेरिका तक होता है करोड़ों का कारोबार
गया का तिलकुट वाला गांव, जहां करोड़ों का तिलकुट बनाया जाता है. मुस्लिम कंट्री से लेकर लंदन और अमेरिका तक यहां का तिलकुट फेमस है.

Published : December 12, 2025 at 7:04 AM IST
गया: बिहार के गया जिले से करीब 50 किलोमीटर दूर स्थित डंगरा गांव की पहचान सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि विश्व प्रसिद्ध गुड़ के तिलकुट की राजधानी के तौर पर होती है. सदियों पुराना यह गांव ठंड के मौसम में तिलकुट की मिठास और कूटने की आवाज से गूंज उठता है.
सैकड़ों साल पुराना इतिहास: डंगरा में गुड़ की मिठाइयां बनाने की परंपरा सैकड़ों वर्ष पुरानी है. पहले लड्डू, पेड़ा, जलेबी और शक्करपारे बनते थे, लेकिन धीरे-धीरे गुड़ का तिलकुट ही गांव की असली पहचान बन गया. व्यवसायी बताते हैं कि गुड़ के तिलकुट का आविष्कार सबसे पहले यहीं हुआ था.
डंगरा के पानी का है असली जादू: कारोबारी मनोज बताते हैं कि डंगरा के पानी में कुछ खासियत है जो तिलकुट को अनोखा स्वाद और सोंधी खुशबू देता है. दूसरे स्थान के पानी से यही कारीगर तिलकुट बनाएं तो वह स्वाद नहीं आता है. मिट्टी की हांडी में बनने से इसकी महक और बढ़ जाती है.

“सैकड़ों सालों से हमारे पूर्वज गुड़ का तिलकुट बना रहे हैं. सबसे पहले तिलकुट का आविष्कार डंगरा में ही हुआ था. यहां का पानी और मिट्टी की हांडी ही असली राज है. कहीं और बनाओ तो वैसा स्वाद कभी नहीं आता.”-मनोज उर्फ पप्पू गुप्ता, कारोबारी

गुड़ के तिलकुट की है खास पहचान: डंगरा के निवासी मो.मंजूर बताते हैं कि डंगरा की खासियत यह भी है कि यहां आज भी सिर्फ गुड़ का तिलकुट बनता है, चीनी का एक दाना भी नहीं डाला जाता है. यही शुद्धता और पारंपरिक तरीका इसे गया के टिकारी और रमना रोड के तिलकुट से अलग और बेहतर बनाता है. यहां से उनके रिश्तेदार दुबई, सऊदी अरब, कुवैत तक तिलकुट लेकर जाते हैं.

“हम मुस्लिम हैं, लेकिन डंगरा का तिलकुट हमारा भी सबसे पसंदीदा है. सऊदी, कुवैत, पाकिस्तान में हमारे रिश्तेदार रहते हैं, उन्हें कूरियर से ही भेजते हैं. कोई आता है तो बिना तिलकुट लिए वापस नहीं जाता.”-मो.मंजूर, डंगरा के निवासी

करोड़ों का कारोबार, हजारों को रोजगार: कारोबारी मनोज बताते हैं कि हर साल नवंबर से फरवरी-मार्च तक चलने वाले तीन-चार महीने के सीजन में डंगरा में सैकड़ों टन तिलकुट बनता है. 30 से अधिक बड़ी दुकानें हैं. एक दुकान रोज 2 से 6 क्विंटल तक तिलकुट बनाता है. कुल मिलाकर 9000 क्विंटल (लगभग 900 टन) से अधिक तिलकुट का उत्पादन होता है, जिसका कारोबार कई करोड़ रुपये का होता है. हजारों कारीगरों को मौसमी रोजगार मिलता है.

विदेशों तक पहुंचता है डंगरा का तिलकुट: कारोबारी कुबेर बताते हैं कि डंगरा का तिलकुट दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, ओडिशा, झारखंड सहित देश के कोने-कोने में जाता है. लेकिन इसकी सबसे बड़ी डिमांड विदेशों से आती है. दुबई, सऊदी अरब, कुवैत, लंदन, अमेरिका तक लोग इसे सौगात के रूप में ले जाते हैं या कूरियर से मंगवाते हैं.

“दुबई, सऊदी, कुवैत, लंदन, अमेरिका हर देश से लोग आते हैं और हमारे तिलकुट की डिमांड करते हैं. जो मुस्लिम देशों से आते हैं, वो ट्रॉली भर-भर के ले जाते हैं. एक बार जो खा लेता है, वो जीवन भर भूल नहीं पाता.”-कुबेर, कारोबारी
मकर संक्रांति पर चरम पर होती है डिमांड: मकर संक्रांति के आसपास तिलकुट की बिक्री अपने चरम पर पहुंच जाती है. इस पर्व पर तिल और गुड़ का विशेष महत्व होता है, इसलिए लोग बड़े पैमाने पर डंगरा का तिलकुट खरीदते हैं. ठंड खत्म होते ही यह कारोबार फिर शांत हो जाता है.

किफायती कीमत, हर वर्ग की पहुंच में: 300 से 400 रुपये प्रति किलो की कीमत पर मिलने वाला यह तिलकुट गरीब से अमीर तक सभी के लिए आसानी से उपलब्ध है. पंजे भर का एक टुकड़ा जो कोई खा ले, वह जीवन भर इसके स्वाद को नहीं भूलता.

स्वास्थ्य के लिए लाभकारी और धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण: गुड़ और तिल से बना यह तिलकुट ठंड में शरीर को गर्मी देता है और कई स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है. मकर संक्रांति पर तिल दान और भोजन का विशेष महत्व होने से इसका धार्मिक जुड़ाव भी गहरा है.

दुनिया जानती है, फिर भी प्रचार की कमी: हालांकि डंगरा का तिलकुट विश्व स्तर पर मशहूर है, लेकिन इसका संस्थागत प्रचार-प्रसार अभी भी कम है. फिर भी इसकी गुणवत्ता और स्वाद ने इसे बिना किसी बड़े विज्ञापन के वैश्विक पहचान दिला दी है. कहते हैं न अच्छी चीज खुद अपनी पहचान बना लेती है, डंगरा के तिलकुट ने भी यही किया है.
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