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चूड़ा-दही से तय होता है बिहार के सत्ता का भविष्य, कई बार गिर चुकी है सरकारें, इसबार क्या होगा?

बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सियासी संवाद, मेल-मिलाप और शक्ति प्रदर्शन का भी बड़ा मंच रही है.

Makar Sankranti 2026 Bihar Politics
बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : January 10, 2026 at 8:55 PM IST

12 Min Read
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  • रिपोर्ट: आदित्य झा

पटना: मकर संक्रांति पर हर साल की तरह इसबार भी बिहार का सियासी चूड़ा-दही भोज चर्चा में है. राजनीतिक दल और नेता पार्टी कार्यालयों और आवासों पर पारंपरिक भोज का आयोजन कर रहे हैं, जिसको लेकर नेताओं को न्योता दिया जा रहा है. बिहार के इस खास भोज पर पूरे देश के नेताओं की नजर होती है, क्योंकि कई बार भोज के बाद बिहार की सियासत बदल चुकी है.

सरकार तक गिर जाती है..: गयाजी के तिलकुट, दियारा की दही और भागलपुरी चूड़ा खाते ही नेताओं के मन बदलने लगते हैं. कई महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसले पर मुहर लगती है. राज्य में सरकार तक गिर जाती है. ऐसा भी देखने को मिला है कि जिसके यहां भोज का आयोजन होता है, वही सत्ता से बाहर हो जाते हैं. इसलिए इस भोज को चूड़ा-दही पॉलिटिक्स भी कहा जाता रहा है.

देखें रिपोर्ट (ETV Bharat)

लालू यादव ने की थी शुरुआत: वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी कहते हैं कि इसकी शुरुआत 1994-95 में लालू प्रसाद यादव ने की थी. मुख्यमंत्री रहते हुए लालू यादव ने चूड़ा-दही का भोज दिया था. पहले दिन बिहार के तमाम नेता और दूसरे दिन आम लोगों को लालू यादव ने भोज पर बुलाया था. इसकी चर्चा देशभर के मीडिया में हुई थी. तब से लालू यादव हर साल इसका आयोजन करते रहे हैं. धीरे-धीरे कई राजनीतिक दलों के नेता भोज देने लगे.

बिहार की राजनीति में मकर संक्रांति पर चूड़ा-दही का भोज देने का श्रेय लालू प्रसाद को जाता है. लालू प्रसाद ने भोज देने की परंपरा की शुरुआत की. दो दिन भोज दिया करते थे. पहले दिन नेता और अगले दिन गरीब गुरवे और उनके समर्थक आते थे. लालू प्रसाद खुद अपने हाथों से खाना परोसते थे." -कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार

2026 का मकर संक्रांति खास: इस साल का मकर संक्रांति खास मानी जा रही है, क्योंकि राजद में अंदरूनी सियासत और पारिवारिक समीकरणों के बीच तेज प्रताप यादव अलग राजनीतिक संदेश देने की कोशिश की है. तेज प्रताप इसबार चूड़ा-दही का भोज दे रहे हैं. पहला और बड़ा सार्वजनिक सियासी आयोजन है. तेज प्रताप यादव ने बीजेपी, जदयू और राजद के नेताओं को निमंत्रण दिया है. तेज प्रताप यादव 14 जनवरी को भोज दे रहे हैं.

Makar Sankranti 2026 Bihar Politics
मकर संक्रांति पर भोज का आयोजन (ETV Bharat)

सभी दलों को न्योता : वरिष्ठ पत्रकार कौशलेंद्र प्रियदर्शी का कहना है कि तेज प्रताप यादव का यह भोज सिर्फ एक सामाजिक आयोजन नहीं, बल्कि उनकी सियासी मौजूदगी और स्वतंत्र पहचान को मजबूत करने की कोशिश है. परिवार और पार्टी के भीतर चल रही चर्चाओं के बीच तेज प्रताप का सभी दलों को न्योता देना यह संकेत देता है कि वे टकराव से ज्यादा संवाद की राजनीति को तरजीह देना चाहते हैं.

"तेज प्रताप यादव के द्वारा दिए जाने वाले चूड़ा-दही भोज पर सबों की नजर रहेगी. माना जा रहा है कि इस आयोजन के जरिए तेज प्रताप यादव यह दिखाना चाहते हैं कि वे बिहार की राजनीति में अलग धारा और सोच के साथ मौजूद हैं." -कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार

नितिन नबीन के यहां भोज: नितिन नबीन हर वर्ष अपने सरकारी आवास पर मकर संक्रांति के अवसर पर चूड़ा-दही भोज का आयोजन करते रहे हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनने के बाद इस वर्ष नितिन नबीन के द्वारा 16 जनवरी को अपने सरकारी आवास पर चूड़ा-दही भोज का आयोजन किया गया है. गठबंधन के सभी घटक दलों के बड़े नेताओं व कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया गया है.

विजय सिन्हा के यहां भोज: बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा कई वर्षों से मकर संक्रांति के अवसर पर भोज का आयोजन करते रहे हैं. उप मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने सरकारी आवास पर वह चूड़ा-दही भोज का आयोजन करते हैं. इस बार भी विजय सिन्हा के द्वारा 13 जनवरी को भोज का आयोजन किया जाएगा.

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मकर संक्रांति पर भोज का आयोजन (ETV Bharat File)

लोजपा (R) द्वारा भोज का आयोजन: मकर संक्रांति के अवसर पर लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान हर वर्ष भोज का आयोजन करते थे. चिराग पासवान की पार्टी के अध्यक्ष बनने के बाद यह परंपरा उनके द्वारा भी निभाई जा रही है. चिराग पासवान दिल्ली और पटना में इसका आयोजन करते हैं. पटना में 15 जनवरी को पार्टी के प्रदेश कार्यालय पटना में भोज का आयोजन किया गया है.

"पार्टी कार्यालय में मंकर संक्रांति के मौके पर भोज का आयोजन किया जाएगा. इस आयोजन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावे गठबंधन के सभी बड़े नेताओं को निमंत्रण भेजा जा रहा है." -राजेश भट्ट, पार्टी प्रवक्ता

राजनीतिक रूप लेता गया भोज: शलेंद्र प्रियदर्शी बताते हैं कि मकर संक्रांति का भोज का मतलब केवल भोज देना था, लेकिन धीरे-धीरे यह राजनीतिक रूप ले लिया. साल 2015 में दिल्ली में रामविलास पासवान द्वारा दिए गए पहले भोज को याद कर कौशलेंद्र प्रियदर्शी कहते हैं कि इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल हुए थे. रामविलास पासवान पहली बार बिहार से बाहर दिल्ली में मकर संक्रांति पर भोज का आयोजन किया था, लेकिन इसका असर बिहार की सियासत पर पड़ा था.

2015 में राज्य में बदली थी सरकार: जिस वक्त रामविलास पासवान भोज का आयोजन किए थे, उसी साल बिहार में विधानसभा चुनाव होने थे. उस वक्त तक नीतीश कुमार एनडीए के साथ थे. एनडीए अपना पैठ बनाए रखना चाह रही थी. बिहार चुनाव 2015 में नीतीश कुमार एनडीए छोड़ महागठबंधन के साथ चुनाव लड़े थे और सीएम पद की शपथ ली थी.

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चूड़ा-दही से तय होता है बिहार का सत्ता (ETV Bharat)

2017 में गिर गयी थी महागठबंधन सरकार: बिहार में महागठबंधन की सरकार बने हुए दो साल ही हुए थे कि मकर संक्रांति 2017 में एक बार फिर सियासी बदलाव देखने को मिला. उस समय राबड़ी देवी आवास पर चूड़ा-दही भोज का आयोजन किया गया था. सीएम नीतीश कुमार इस भोज में शामिल हुए थे. लालू यादव नीतीश कुमार के साथ सरकार बनाकर काफी खुश थे.

नीतीश कुमार ने एनडीए के साथ बनायी थी सरकार: भोज के दौरान लालू यादव ने नीतीश कुमार को दही का टीका लगाया था. लालू यादव ने इसके माध्यम से संदेश दिया था कि नीतीश-लालू का साथ हमेशा रहने वाला है. नीतीश कुमार ने भी मीडिया से बात करते हुए कहा था कि अब बीजेपी का जादू नहीं चलने वाला है, लेकिन कुछ महीनों के बाद ही राज्य में महागठबंधन की सरकार गिर गयी. नीतीश कुमार एनडीए के साथ मिलकर सरकार बनायी.

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भोज के मौके पर लालू यादव के साथ नीतीश कुमार, साथ में राबड़ी देवी और तेज प्रताप (ETV Bharat File)

अशोक चौधरी कांग्रेस से जदयू में हुए थे शामिल: मकर संक्रांति का भोज राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए मायने रखता है. यही वह समय होता है, जब चूड़ा-दही की मिठास से गिले शिकवे भुला देते हैं और फिर से घर वापसी कर लेते हैं या फिर नयी पार्टी में शामिल हो जाते हैं. मंकर संक्रांति 2018 में JDU नेता वशिष्ठ नारायण सिंह के घर पर भोज का आयोजन किया गया था. इसमें तत्कालीन कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक चौधरी शामिल हुए थे. इसी भोज के डेढ़ महीने बाद अशोक चौधरी JDU में शामिल हो गए थे.

भोज के नाम पर जमानत की मांग: इन सब राजनीतिक घटना पर कौशलेंद्र प्रियदर्शी बताते हैं कि मकर संक्रांति के भोज के नाम पर न केवल राजनीति होती रही है, बल्कि इसके नाम पर जमानत तक की मांग कोर्ट से की गई. लालू प्रसाद 2018 में जेल में बंद थे. 12 जनवरी 2018 को लालू प्रसाद ने कोर्ट से बेल लेने के लिए यह आवेदन दिया था कि उनके घर पर हर वर्ष मकर संक्रांति के दिन हजारों लोग खाना खाते हैं, इसीलिए उनको बेल दिया जाए.

"लालू यादव ने कहा था कि 'यदि भोज में नहीं पहुंच पाएंगे तो बड़ी बेज्जती होगी.' कोर्ट के तत्कालीन जज शिवपाल सिंह ने लालू प्रसाद की जमानत अर्जी खारिज करते हुए कहा कि 'इस बार आपके साथ हम भोज खाएंगे.' इसपर लालू यादव ने कहा था कि हुजूर मेरे साथ खाइयेगा तो आप बदनाम हो जाइयेगा." -कौशलेंद्र प्रियदर्शी, वरिष्ठ पत्रकार

राजनीतिक कड़वाहट में मिठास: वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय का मानना है कि मकर संक्रांति के चूड़ा-दही भोज की सबसे बड़ी खासियत यही रही है कि यह राजनीतिक कड़वाहट को कुछ समय के लिए पीछे छोड़ देता है. बड़े नेताओं के आवास पर छोटे से छोटे कार्यकर्ता पहुंचकर उनसे संवाद कर सकते हैं. मंच साझा करने से लेकर एक ही पंगत में बैठकर भोजन करने तक, यह दिन नेताओं को करीब लाने का काम करता है.

"पटना में होने वाले सियासी भोज अक्सर अनौपचारिक बातचीत के गवाह रहे हैं. कई बार गठबंधन की अटकलें, सुलह-सफाई और भविष्य की रणनीतियों पर चर्चा भी इसी तरह के आयोजनों में होती रही है. हालांकि, सार्वजनिक रूप से इन चर्चाओं की पुष्टि कम ही होती है, लेकिन सियासी गलियारों में इसके संकेत जरूर मिलते हैं." -सुनील पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

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वरिष्ठ पत्रकार सुनील पांडेय (ETV Bharat)

सियासी केंद्र पर नजर: सुनील पांडेय कहते हैं कि मकर संक्रांति के दिन भोज देने वाले नेताओं का आवास राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बन जाता है. सुबह से ही नेताओं के आवासों पर लोगों की भीड़ जुटने लगती है, लेकिन सबों की नजर विरोधी दल के नेताओं की उपलब्धता पर रहती है. क्योंकि राजनीति में सियासत किस करवट जा रही है, उसका संकेत भोज में शामिल नेताओं की मौजूदगी से पता लगने लगता है.

"भोज में खाने के स्वाद या व्यंजन पर चर्चा नहीं होती है. चर्चा इस बात की होती है किस दल के बागी विधायक किस नेता के यहां भोज खाने के लिए पहुंचे हैं. यानी कहा जाए तो वर्तमान राजनीति किस करवट जाने वाली है, इसका संकेत मकर संक्रांति की भोज में दिखने लगता है." -सुनील पांडेय, वरिष्ठ पत्रकार

पलटेंगे या बने रहेंगे: वाकई में मकर संक्राति की मिठास लोगों के अंदर गिले शिकवे को भुलाने का काम करती है. भागलपुर का कतरनी चूड़ा, दियारा की मलाई वाली दही और गया का तिलकुट खाकर नेता एक नई शुरुआत करते हैं या फिर अपनी लॉयल्टी बनाए रखते हैं.

गया के तिलकुट की बात अलग: बिहार के मंकर संक्रांति में कतरनी चूड़ा, मलाई वाली दही और गया का तिलकुट खास मायने रखता है. गया के तिलकुट की बात करें इसके स्वाद में जादू है. खस्ता और करारा, हल्का दबाने पर टूट जाता है. इसके तिल का सौंधापन और गुड़ और चीनी की मिठास लोगों को अपनी ओर खींच लाती है.

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गया का फेमस तिलकुट (ETV Bharat)

शुद्धता और सांस्कृतिक पहचान: यही नहीं अपनी शुद्धता और सामग्री के लिए भी फेमस है. भुने हुए तिल और उच्च गुणवत्ता वाले गुड़ या चीनी का उपयोग किया जाता है. इसमें घी या तेल का उपयोग नहीं किया जाता है. गया के पानी और जलवायु का असर भी रहता है. इसे खाने से जोड़ों के दर्द में राहत मिलती है, क्योंकि तील की तासीर गर्म होती है. गया के तिलकुट की पहचान एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में भी है.

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दियारा की दही (ETV Bharat)

दियारा की दही: यह बिहार के गंगा क्षेत्र में मिलने वाली शुद्ध दही है. खाने में गाढ़ी और मलाईदार होती है. इससे मजा दोगुणा हो जाता है. अपनी खास स्वाद के कारण बिहार से यूपी तक लोकप्रिय है. मकर संक्रांति के मौके पर बंपर डिमांड होती है. इसे तैयार करने के भी तरीके अलग हैं.

कैसे तैयार करें दियारा वाली दही?: दियारा जैसी दही बनाने के लिए फुल क्रीम दूध को अच्छी तरह उबाला जाता है. इसके बाद थोड़ा ठंडा होने दिया जाता है. इसके बाद गुनगुना दूध में थोड़ी पुरानी दही मिलाकर फेंटा जाता है. फिर इसे एक मिट्टी के बर्तन में रखकर 5-6 घंटे के लिए ढक कर छोड़ दिया जाता है. फ्रिज में रखने से ज्यादा गाढ़ी हो जाती है.

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भागलपुर का चूड़ा (ETV Bharat)

भागलपुर का कतरनी चूड़ा: भागलपुर का कतरनी चूड़ा देश के साथ-साथ विदेशों में भी खाया जाता है. इसका अद्वितीय सुगंध और स्वाद ऐसा है कि दूसरा चूड़ा खाने का मन नहीं करेगा. मुलायम और हल्का होता है. भारत सरकार की ओर से जीआई टैग दिया गया है.

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