खुदकुशी कर चुके किसानों के बच्चों के लिए 'मसीहा' बना यह कॉलेज! आम के बगीचे की कमाई से मिल रही मुफ्त उच्च शिक्षा
बिना किसी सरकारी मदद के, इन बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च उठाया जाता है. जानिए इस प्रेरणादायक पहल की पूरी कहानी.


Published : July 7, 2026 at 8:33 PM IST
सतारा (महाराष्ट्र): किसान वीर महाविद्यालय ने उन बच्चों के जीवन में शिक्षा का उजाला लाने का काम किया है, जिनके किसान माता-पिता ने सूखे और फसल खराब होने के कारण अपनी जीवन लीला समाप्त कर ली थी. अब उनके परिवारों को नई उम्मीद के साथ फिर से खड़े होने में मदद मिली है. 'जनता शिक्षण संस्था' द्वारा संचालित 'किसान वीर महाविद्यालय' पिछले एक दशक से ऐसे किसान परिवारों के बच्चों को स्नातक स्तर तक मुफ्त शिक्षा प्रदान कर रहा है.
इस शैक्षणिक पहल की शुरुआत कैसे हुई?
वाई में 'किसान वीर महाविद्यालय' की स्थापना 1962 में हुई थी. इस कॉलेज का नाम प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी आबासाहेब के नाम पर रखा गया था, जिन्हें 'किसान वीर' के नाम से भी जाना जाता था. एक ऐसे समय में जब विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या के मामले बढ़ रहे थे, तब कांग्रेस के दिवंगत वरिष्ठ नेता प्रतापराव भोसले 'जनता शिक्षण संस्था' की कमान संभाल रहे थे.
साल 2016 में, प्रोफेसरों और प्रशासनिक कर्मचारियों के सहयोग से, उन्होंने इन प्रभावित परिवारों के बच्चों की पढ़ाई को आसान बनाने के लिए 'जय किसान बॉयज हॉस्टल' की स्थापना की. उनके लिए एक आवासीय शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की.

छात्रों का चयन कैसे किया जाता है?
इस पहल के बारे में 'ईटीवी भारत' से बात करते हुए कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. गुरुनाथ फगारे ने बताया कि 'जय किसान बॉयज हॉस्टल' की स्थापना प्रतापराव भोसले के विज़न के आधार पर की गई थी. उन्होंने कॉलेज के प्रोफेसरों को विदर्भ और मराठवाड़ा क्षेत्रों में भेजा था.
जिला कलेक्टरों और तहसीलदारों के माध्यम से आत्महत्या करने वाले किसानों के प्रभावित परिवारों की सूचियां प्राप्त की गईं. प्रोफेसरों ने इन परिवारों से संपर्क किया. इस प्रक्रिया ने आत्महत्या कर चुके किसानों के बच्चों के लिए शिक्षा के दरवाजे खोल दिए.

संस्थान पढ़ाई का पूरा खर्च उठाता है
1990 के दशक में, किसान वीर महाविद्यालय परिसर के भीतर दो एकड़ के भूखंड पर आम के पौधे लगाए गए थे. आज वहां एक खूबसूरत बगीचा फल-फूल रहा है. साल 2016 में इसी बगीचे के ठीक बगल में 'जय किसान बॉयज हॉस्टल' की स्थापना की गई थी. इस बगीचे से आमों की बिक्री से होने वाली कमाई का उपयोग छात्रों की उच्च शिक्षा में सहायता के लिए किया जाता है.
प्रो. अमोल कावड़े हॉस्टल के अधीक्षक के रूप में सेवा दे रहे हैं. प्रिंसिपल डॉ. गुरुनाथ फगारे ने 'ईटीवी भारत' से बात करते हुए बताया कि प्रो. कावड़े ने छात्रों की मदद से इस जैविक आम के बगीचे को सींचा और बड़ा किया है.

बिना सरकारी अनुदान के चलने वाली पहल
प्रिंसिपल डॉ. फगारे ने बताया कि 'जय किसान बॉयज हॉस्टल' में रहकर 11वीं कक्षा से लेकर स्नातक और स्नातकोत्तर तक की शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों की संख्या 90 तक पहुंच गई है. 11वीं कक्षा में दाखिले से लेकर डिग्री पूरी होने तक, इन छात्रों को अपनी जेब से एक भी रुपया खर्च नहीं करना पड़ता है.
बिना किसी सरकारी अनुदान के चलने वाली यह अनूठी पहल आज एक प्रेरणास्रोत बन चुकी है. हॉस्टल में रहने वाले छात्र पढ़ाई के साथ-साथ खेती-किसानी के व्यावहारिक कौशल भी सीखते हैं, जैसे आम की ग्राफ्टिंग, खाद बनाना और जैविक खेती. उन्होंने बताया कि इस वर्ष हापुस (अल्फांसो), पायरी और केसर आमों की बिक्री से लगभग 1.25 लाख रुपये की कमाई हुई है.

विभिन्न क्षेत्रों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले छात्र
पिछले एक दशक में, परभणी, बीड़, लातूर, जलगांव, बुलढाणा और अकोला जैसी जगहों के रहने वाले आत्महत्या कर चुके किसानों के बच्चों ने किसान वीर कॉलेज में पढ़ाई की है. इनमें से कइयों ने डाक विभाग, पुलिस बल व सेना में नौकरियां हासिल की हैं. कुछ वकील बन गए हैं, तो कुछ व्यवसाय में सफल हुए हैं. इसके साथ ही उनके परिवार सफलतापूर्वक सामाजिक मुख्यधारा में वापस लौट आए हैं.
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