बिहार में देवी स्वरूप में हो रही भगवान बुद्ध की पूजा, महिलाएं लगाती हैं सिंदूर
बिहार के गयाजी में एक स्थल ऐसा भी है, जहां भगवान बुद्ध को देवी स्वरूप में पूजा जाता है, जानिए क्या है पूरी कहानी.

Published : February 20, 2026 at 7:06 AM IST
रिपोर्ट : रत्नेश कुमार
गया: बिहार के गया में भगवान बुद्ध देवी के रूप में भी पूजे जाते हैं. यह परंपरा सदियों से चली आ रही है. जिला मुख्यालय से करीब 35-40 किलोमीटर दूर स्थित है भुरहा और दुब्बा गांव. यह दोनों सटे हुए गांव है. यहां देवी का मंदिर है. इस मंदिर में भगवान बुद्ध की दो प्रतिमाएं हैं. भगवान बुद्ध की यह दोनों प्रतिमाएं अष्टधातु की बताई गई हैं. किंतु सबसे आश्चर्य वाली बात यह है कि इन दोनों प्रतिमाओं की पूजा देवी रूप में की जाती है. आज जानते हैं इसकी क्या है पूरी कहानी.
भुरहा-दुब्बा क्षेत्र में पहली रात्रि किया था आराम: दरअसल, बौद्ध आस्था का महत्वपूर्ण केंद्र भुरहा-दुब्बा बौद्ध धर्मावलंबियों की आस्था का बड़ा केंद्र है. माना जाता है कि जब राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान की प्राप्ति हुई तो वह सारनाथ के लिए रवाना हुए. जिसके बाद उन्होंने पहली रात्रि विश्राम करने के लिए भुरहा-दुब्बा गांव को चुना. इसके कई प्रमाण भी यहां मिलते हैं.
बौद्ध विरासत से जुड़ी सामग्रियां हो रही है विलुप्त: जानकार मानते हैं, कि इतिहास में भी इस स्थली का जिक्र है. हालांकि आज तक इस महत्वपूर्ण स्थल का समुचित विकास नहीं हो पाया है. बौद्ध विरासत से जुड़ी सामग्रियां भी धीरे-धीरे यहां से विलुप्त होती जा रही हैं. यही वजह है कि ऐतिहासिक पौराणिक स्थली से मिलने वाली भगवान बुद्ध की प्रतिमाओं को कहीं देवी रूप में तो कहीं गौरैया बाबा के रूप में भी पूजा जा रहा है.

महिलाएं सिंदूर लगाकर करती है पूजा: भुरहा-दुब्बा के इस मंदिर में महिलाएं देवी माता का स्वरूप मानकर भगवान बुद्ध की प्रतिमा पर सिंदूर लगाती हैऔर मन्नत मांगती है. इसी देवी मंदिर में देवी माता के सात पिंड भी हैं. लोगों का मानना है कि यहां मांगी हुई मन्नत जरूर पूरी होती है.

प्रतिमाओं को लोहे की छड़ से बांधकर रखा गया है: लोग बताते हैं कि इसी के चलते एक बार यहां भगवान बुद्ध की मूर्ति चोरी करने की कोशिश की गई थी. हालांकि यह किसी तरह से तस्करों के चंगुल में जाने से यह दोनों प्रतिमाएं बच गई थी. इसके बाद ग्रामीणों ने दोनों मूर्तियों को लोहे के छड़ से सोल्डिंग कराकर एक तरह से बांधकर रखा है, ताकि यह मूर्तियां भविष्य में चोरी न हो.

मूर्तियों को लोहे की छड़ से बांधने के पीछे का कारण: इस संबंध में गांव वालों का कहना है, कि यहां पहले हर घर के बाहर छोटी मूर्तियां यूं ही पड़ी रहती थी. छोटी मूर्तियां धीरे-धीरे करके चोरी हो गई. छोटे स्तूप भी चोरी कर लिए गए. किंतु जो बड़ी मूर्तियां थी, वह मंदिर में या फिर अन्य स्थानों पर शेष रह गई है. इसी में से भगवान बुद्ध की दो मूर्ति भूरहा स्थित देवी मंदिर में स्थापित है. वहीं, कुछ और प्रतिमाओं के बारे में लोग बताते हैं, कि भगवान बुद्ध की कुछ प्रतिमाओं को गोरेया बाबा के रूप में भी पूजा जाता है.

सीएम नीतीश कुमार भी आ चुके हैं यहां, फिर भी नहीं किया गया संरक्षित : इस ऐतिहासिक बौद्धस्थली में जो प्रमाणित साक्ष्य मिले है, उसके बाद कई वीआईपी यहां आते रहे है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इस इलाके में आ चुके हैं. उन्होंने इस स्थान को संरक्षित करने का भी निर्देश दिया था. हालांकि आज तक ठोस पहल नहीं की गई. भुरहा दुब्बा का गढ़ भी अपना अस्तित्व खोता जा रहा है. गांव वालों का मानना है कि आज भी यदि इस स्थान की खुदाई की जाए, तो सैकड़ो प्राचीन मूर्तियां और स्तूप मिलने तय हैं.

भगवान बुद्ध से जुड़ा यह महत्वपूर्ण स्थल है : वहीं, इस संबंध में सेवानिवृत शिक्षक राजदेव प्रसाद सिंह बताते हैं कि गुरुआ के भुरहा- दुब्बा और गुनेरी के इलाके में गौतम बुद्ध को मानने वालसे लंबी काफी संख्या में आते हैं. कई स्तूप और भगवान बुद्ध की मूर्ति स्कूलों में भी संरक्षित कर रखा गया है.
"अज्ञानता के कारण भगवान बुद्ध की मूर्ति को देवी की प्रतिमा मानकर लोग पूज रहे हैं. एक समय यह कोल राजा का भी गढ़ हुआ करता था. गढ़ के नीचे मूर्तियां ही मूर्तियां हैं. यदि सही तरीके से पुरातत्व विभाग लगे और खुदाई की जाए, तो कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं. सही तरीके से इस स्थान का विकास किया जाए, तो यह अंतरराष्ट्रीय पर्यटन स्थल के रूप में उभर कर सामने आ सकता है." -राजदेव प्रसाद सिंह, सेवानिवृत शिक्षक

भगवान बुद्ध की सदियों से हो रही देवी के रूप में पूजा: वहीं, देवी मंदिर के पुजारी रोशन कुमार पांडे बताते हैं, कि यहां सदियों से भगवान बुद्ध की प्रतिमा की पूजा देवी माता के रूप में होती रही है, जो आज भी जारी है.

यहां बिखरे हैं बौद्ध एवं हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण साक्ष्य: इस संबंध में मगध विश्वविद्यालय बोधगया के प्राचीन भारतीय एवं एशियाई अध्ययन विभाग के डॉक्टर शंकर शर्मा बताते हैं, कि यहां एक से बढ़कर एक बौद्ध एवं हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण साक्ष्य हैं. यह पुरातात्विक स्थली है. पिछले कुछ सालों से मगध विश्वविद्यालय बोधगया के प्राचीन भारतीय एवं एशियाई अध्ययन विभाग के शिक्षकों द्वारा इस इलाके का भ्रमण किया जा रहा है. अब तक सभी सर्वेक्षण में कई महत्वपूर्ण बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेषों की पहचान की गई है. डॉ. शंकर शर्मा ने बताया कि मगध विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर शशि प्रताप शाही के निरंतर प्रयासों एवं संकल्प से पुरातात्विक महत्व के खोजों को बढ़ावा मिल रहा है.

"भुरहा-दुब्बा से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर गुनेरी स्थित है. यहां भी प्राचीन बौद्ध पुरावशेष के अवशेष ब्रिटिश काल से ही संरक्षित हैं. यदि भुरहा-दुब्बा का पुरातत्विक अध्ययन होता है, तो विभिन्न रहस्यों से पर्दा उठने की प्रबल संभावना है." - डॉ. शंकर शर्मा, शिक्षक, मगध विश्वविद्यालय बोधगया

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