स्कूल जाने के लिए हर दिन जान दांव पर! नाव चलाकर पहुंच रहे 50 बच्चे
बिहार के नालंदा में बच्चों के अंदर है पढ़ाई का ऐसा जुनून. खुद से सकरी नदी में नाव चालकर पढ़ने जाते हैं स्कूल.

Published : February 26, 2026 at 6:55 PM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: "सड़क से जाएंगे तो 10 किलोमीटर दूर जाना पड़ेगा, सुबह 6 बजे निकलेंगे तो 12:30 बज जाएगा. इसलिए नाव से स्कूल जाना मजबूरी है."- सुधा कुमारी, छात्रा
"पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं है, बस नाव चलाकर आना पड़ता है. हम डॉक्टर बनना चाहते हैं. हमारी मांग है कि जल्द से जल्द पुल बने ताकि हमें जान जोखिम में न डालनी पड़े."- करीना कुमारी, छात्रा
ये वो बच्चियां है जिन्हें हर रोज नाव चलाकर अपने साथ-साथ 50 बच्चों को स्कूल ले जाना पड़ता है. वहीं बारिश के समय नदी का बहाव तेज होने की वजह से अपनी पढ़ाई पर ब्रेक लगाना पड़ता है. दूसरे शब्दों में कहें तो भविष्य संवारने के लिए जिंदगी दांव पर लगानी पड़ती है.
बच्चों को हाथों में चप्पू थामने की लाचारी : सरकार द्वारा शिक्षा को लेकर किए जा रहे दावे और हकीकत के बीच कितना फासला है, इसकी जीती-जागती तस्वीर नालंदा जिले के गिरियक प्रखंड के सकुचीडीह गांव में देखने को मिलती है. यहां के बच्चों के कंधों पर सिर्फ किताबों का बोझ नहीं है, बल्कि उनके नन्हे हाथों में चप्पू (नाव चलाने का डंडा) थामने की लाचारी भी है.

बाजार भी नाव से जाते हैं ग्रामीण : जिला मुख्यालय से करीब 30 किलोमीटर दूर गाजीपुर पंचायत का सकुचीडीह गांव आज भी विकास की मुख्यधारा से कटा हुआ है. गांव के बच्चों को पढ़ने के लिए और ग्रामीणों को अपनी रोजमर्रा की जरूरतों (बाजार, अस्पताल) के लिए भी उफनती नदी को नाव के सहारे पार करना पड़ता है.

एक नाव के सहारे पूरा गांव : दोनों गांव में 1-1 हजार की आबादी है. इतनी बड़ी आबादी के लिए न पुल है, न नाव की अच्छी व्यवस्था और न ही प्रशिक्षित नाविक. नदी को पार करने के लिए सिर्फ एक नाव है. जिसे नाविक नहीं गांव के बच्चे ही चलाते हैं. नाव चलाना इनका काम नहीं बल्कि इनकी मजबूरी है.
96.84 मीटर लंबे पुल का निर्माण होना है : इसके लिए चुनावी घोषणा में पुल बनाने का आश्वासन भी दिया गया. बावजूद इसके आजतक सिरत और सूरत जस की तस है. सकुचीडीह और सकुचीसराय के बीच सकरी नदी पर मुख्यमंत्री ग्रामीण सेतु योजना के तहत 96.84 मीटर लंबे पुल का निर्माण होना है. पर काम अब-तक शुरू नहीं हो सका है. पुल को बनाने की लागत कोई छोटी-मोटी नहीं बल्कि करीब 6.20 करोड़ रुपये तय की गई है.

शिलान्यास के बाद से कोई अधिकारी नहीं दिखा : इस पुल के निर्माण का काम जुलाई 2025 से शुरू होना था. शिलान्यास हुए सात महीने बीत चुके हैं पर अब तक पुल की एक ईंट भी नहीं रखी गई है. ग्रामीण महिलाएं बताती हैं कि शिलान्यास का बोर्ड लगाने के बाद से न तो कोई ठेकेदार नजर आया और न ही विभाग का कोई अधिकारी.
''गांव में न बाजार है न दुकान, छोटी सी थाली खरीदने भी नदी पार करके सराय जाना पड़ता है. वोट तो सब मांगते हैं, लेकिन पुल कोई नहीं बनाता है.'' - दौलती देवी, ग्रामीण महिला

दूसरे गांव जाने के लिए पैदल रास्ता 10 किमी लंबा : सकरी नदी गाजीपुर पंचायत को दो हिस्सों में बांटती है. सकुचीडीह गांव में कक्षा 1 से 5 तक ही स्कूल है. हाई स्कूल और प्लस टू की पढ़ाई के लिए बच्चों को नदी पार करके सकुचीसराय जाना पड़ता है. जब नदी में पानी ज्यादा होता है या नाव नहीं मिलती, तो महज एक किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए ग्रामीणों और बच्चों को गोवर्धन बिगहा या मानपुर के पुल से होकर 10 किलोमीटर का लंबा चक्कर काटना पड़ता है. इससे बचने के लिए बच्चे खुद नाव चलाकर स्कूल जाते हैं.
9वीं कक्षा की छात्राएं चप्पू संभालती हैं : हैरानी की बात यह है कि प्रशासन ने नदी पार करने के लिए कोई सरकारी नाव या नाविक मुहैया नहीं कराया है. ग्रामीणों ने चंदा इकट्ठा करके एक टूटी-फूटी नाव का जुगाड़ किया है. जब कोई नाविक नहीं होता, तो करीना कुमारी, सुधा कुमारी जैसी 9वीं कक्षा की छात्राएं खुद चप्पू संभालती हैं और अपने साथ 50 अन्य बच्चों को नदी पार कराती हैं.
''बरसात के समय नदी में जब ज्यादा पानी रहता है तो कोई गांव के एक्सपर्ट नाविक जिन्हें तैरना आता है उनके साथ आते हैं, नहीं तो पढ़ाई छोड़नी पड़ती है.'' सुधा कुमारी, छात्रा

छात्रों की एक ही गुहार- पुल का निर्माण जल्द हो : अप्रैल से स्कूल में नया सत्र शुरू होगा. ऐसे में यहां पढ़ने वाले सभी छात्रों की सरकार व प्रशासन से एक ही मांग हैं कि जल्द से जल्द पुल बनाया जाए, ताकि आने वाले दूसरे छात्र छात्राओं को पढ़ाई के लिए आने-जाने में आराम हो.
विद्यालय में 13-14 गांवों से बच्चे आते हैं : उत्क्रमित मध्य विद्यालय सकुचीसराय के विज्ञान शिक्षक धर्मेंद्र कुमार बताते हैं, कि उनके विद्यालय में 13-14 गांवों से बच्चे आते हैं. इनमें से सकुचीडीह के 40-50 बच्चे हैं, जिनमें 30 लड़कियां हैं. ये सभी नाव चलाकर यहां तक आते हैं.
"अभी मौसम ठीक है, लेकिन बरसात में गांव का संपर्क टूट जाता है. इसके बावजूद जिन बच्चों में पढ़ने की ललक है, वे जान जोखिम में डालकर आते हैं. कई बार संतुलन बिगड़ने का डर रहता है." - धर्मेंद्र कुमार, विज्ञान शिक्षक, उत्क्रमित मध्य विद्यालय सकुचीसराय

पुल बनाने की परमिशन अब तक नहीं : दो गांवों के बीच पुल के मिर्माण में हो रही देरी को लेकर जब हमने ग्रामीण कार्य विभाग (राजगीर) की एग्जीक्यूटिव इंजीनियर मुनिता कुमारी से बात की तो उन्होंने परमिशन नहीं मिलने की बात कही. उम्मीद है जल्द फाइनल मंजूरी मिलेगी.
''सकुचीडीह के पास सकरी नदी पर पुल का शिलान्यास हो चुका है. वरीय अधिकारियों के आदेश पर डीपीआर (DPR) को फिर से जांच के लिए मुख्यालय भेजा गया है. अभी वह स्वीकृत होकर वापस नहीं आई है, इसी कारण काम शुरू नहीं हुआ है.'' - मुनिता कुमारी, एग्जीक्यूटिव इंजीनियर, ग्रामीण कार्य विभाग
देश को आजाद हुए लगभग 8 दशक होने वाले हैं. माना जा सकता है कि इन सालों में हर शहर तरक्की की राह पर चल रहा होगा. पर क्या ऐसा सच में हो रहा है? सकुचीडीह गांव इसपर कई सवाल खड़े करता है. बिहार में आज भी कई ऐसे इलाके हैं जहां विकास अपनी धीमी रफ्तार से दौड़ रहा है. यहां हर गांव में स्कूल तो है पर वहां तक पहुंचे के लिए न तो कोई सड़क है और न ही कोई पुल.
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