मेडल जीतने के बाद भी सुविधा की कमियों से जूझ रहे झारखंड के एथलीट, आखिर क्यों?
झारखंड में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट्स हैं पर पदक जीतने के बाद भी आज वो बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहे हैं.

Published : March 16, 2026 at 5:33 PM IST
रिपोर्ट- चंदन भट्टाचार्य.
रांचीः झारखंड खेल प्रतिभाओं की धरती के रूप में जाना जाता है. इस राज्य ने देश को कई बड़े खिलाड़ी दिए हैं, जिन्होंने हॉकी, तीरंदाजी और क्रिकेट जैसे खेलों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है.
लेकिन जब बात एथलेटिक्स की आती है तो तस्वीर उतनी मजबूत नजर नहीं आती. राज्य के कई एथलीट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर लौटते हैं. इसके बावजूद उन्हें वह सुविधाएं नहीं मिल पातीं जो उनके प्रदर्शन को और बेहतर बना सके.
सुविधाओं के लिए आज भी संघर्ष
झारखंड में एथलेटिक्स को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर इस खेल को हॉकी और क्रिकेट जैसी तवज्जो क्यों नहीं मिल पा रही. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को भी बेहतर कोचिंग, संतुलित डाइट और आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं क्यों नहीं मिल रही हैं.
इन्हीं सवालों को समझने के लिए हमने बात की झारखंड के अंतरराष्ट्रीय एथलीट रामचंद्र सांगा से. जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में मेडल जीतकर राज्य का नाम रोशन किया है.
नामकुम की बस्ती से निकलकर अंतरराष्ट्रीय ट्रैक तक पहुंचने की कहानी
रांची के नामकुम स्थित जोरार बस्ती के रहने वाले रामचंद्र सांगा की कहानी संघर्ष और जुनून की मिसाल है. साधारण परिवार से आने वाले रामचंद्र ने कठिन परिस्थितियों के बीच अपने खेल करियर की शुरुआत की. उनके पास शुरुआत में न तो बेहतर प्रशिक्षण की सुविधा थी और न ही खिलाड़ियों को मिलने वाली जरूरी डाइट. इसके बावजूद उन्होंने अपने सपने को जिंदा रखा और लगातार मेहनत करते रहे.
रामचंद्र सांगा बताते हैं कि साल 2019 उनके खेल करियर का अहम पड़ाव था. इसी साल उन्होंने पहली बार ट्रैक इवेंट में हिस्सा लिया और यूथ एशियन गेम्स में छठा स्थान हासिल किया. यह उपलब्धि उनके लिए बहुत बड़ी थी क्योंकि उस समय तक उन्हें किसी बड़े स्तर की कोचिंग भी नहीं मिली थी.
सुविधा की कमियों के बीच भी नहीं टूटा हौसला
रामचंद्र का कहना है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों के सामने सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी होती है. कई बार खिलाड़ियों को अभ्यास के लिए सही ट्रैक भी नहीं मिल पाता. इसके अलावा संतुलित डाइट और पेशेवर कोचिंग की कमी भी उनके प्रदर्शन को प्रभावित करती है.

इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत जारी रखी और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करना शुरू किया. खेलो इंडिया प्रतियोगिता में उन्होंने तीसरा स्थान हासिल किया, जो उनके करियर की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है.
नेशनल में चमके, फिर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचे
इसके बाद रांची में आयोजित जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में रामचंद्र सांगा ने सिल्वर मेडल जीता. इस उपलब्धि ने उन्हें एथलेटिक्स की दुनिया में नई पहचान दिलाई. इसके बाद उन्होंने 400 मीटर चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया.
लगातार बेहतर प्रदर्शन के दम पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने का मौका मिला. वहां भी उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया और कई पदक जीतकर झारखंड का नाम रोशन किया. लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद उनके सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुईं.

मेडल के बाद भी नहीं बदली खिलाड़ियों की स्थिति
रामचंद्र सांगा का कहना है कि झारखंड में एथलेटिक्स की सबसे बड़ी समस्या बेहतर कोचिंग की कमी है. राज्य में कई जगह अंतरराष्ट्रीय स्तर के स्टेडियम और ट्रैक बनाए गए हैं लेकिन वहां नियमित और उच्चस्तरीय कोचिंग की व्यवस्था नहीं है.
उनका कहना है कि एथलेटिक्स बेहद तकनीकी खेल है, जिसमें खिलाड़ी की तकनीक, फिटनेस और ट्रेनिंग का बड़ा महत्व होता है. अगर खिलाड़ियों को अनुभवी कोच का मार्गदर्शन नहीं मिलेगा तो वे अपनी पूरी क्षमता के साथ प्रदर्शन नहीं कर पाएंगे.
ट्रैक बने, स्टेडियम बने लेकिन कोच की कमी
रामचंद्र कहते हैं कि कई बार खिलाड़ी खुद ही अभ्यास करते रहते हैं और तकनीकी सुधार के लिए उन्हें सही मार्गदर्शन नहीं मिल पाता. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय स्तर की तैयारी करना मुश्किल हो जाता है. इसके अलावा डाइट भी खिलाड़ियों के लिए बड़ी समस्या है. एक एथलीट को रोजाना संतुलित और पौष्टिक आहार की जरूरत होती है ताकि उसकी फिटनेस और स्टैमिना बेहतर बना रहे. लेकिन झारखंड में कई खिलाड़ियों को नियमित रूप से यह सुविधा नहीं मिल पाती.

डाइट और ट्रेनिंग की कमी से प्रभावित होता प्रदर्शन
रामचंद्र का कहना है कि एथलेटिक्स में दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों से मुकाबला करना होता है. ऐसे में खिलाड़ियों को उसी स्तर की ट्रेनिंग और सुविधाएं मिलनी चाहिए. अगर सही डाइट और बेहतर कोचिंग मिल जाए तो झारखंड के खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और बड़ी सफलता हासिल कर सकते हैं.
झारखंड में एथलेटिक्स की एक खास बात यह भी है कि यहां के कई खिलाड़ी ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से आते हैं. इन क्षेत्रों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में कई खिलाड़ी आगे नहीं बढ़ पाते.
ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में छिपी है बड़ी खेल प्रतिभा
रामचंद्र का कहना है कि ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ियों के लिए स्पोर्ट्स हॉस्टल की व्यवस्था बेहद जरूरी है. अगर खिलाड़ियों को रहने, पढ़ाई और ट्रेनिंग की बेहतर सुविधा मिल जाए तो झारखंड से बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली एथलीट सामने आ सकते हैं.
इन दिनों रामचंद्र सांगा रायपुर में आयोजित होने वाली ट्राइबल एथलेटिक्स चैंपियनशिप की तैयारी कर रहे हैं. यह प्रतियोगिता आदिवासी खिलाड़ियों के लिए एक बड़ा मंच मानी जा रही है.
ट्राइबल एथलेटिक्स चैंपियनशिप से नई उम्मीद
इस प्रतियोगिता में देशभर के खिलाड़ी हिस्सा ले रहे हैं और झारखंड से भी करीब 25 एथलीट इसमें भाग लेने जा रहे हैं. रामचंद्र का कहना है कि यह पहल सराहनीय है क्योंकि इससे नई प्रतिभाओं को सामने आने का मौका मिलेगा. हालांकि उनका यह भी कहना है कि सिर्फ प्रतियोगिताएं आयोजित करने से खिलाड़ियों का भविष्य नहीं बदलेगा. जरूरी है कि खिलाड़ियों को लगातार बेहतर ट्रेनिंग, कोचिंग और डाइट की सुविधा मिले.
- खेलो इंडिया प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन, पूरे प्रदेश में दूसरा स्थान.
- जूनियर नेशनल चैंपियनशिप में रजत (सिल्वर) पदक.
- वर्ष 2017 की एथलेटिक्स चैंपियनशिप में स्वर्ण (गोल्ड) पदक.
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यूथ एशियाई चैंपियनशिप में पदक.
खिलाड़ियों की मांग— सुविधाएं भी मिलें और अवसर भी
इस मुद्दे पर खेल विभाग का कहना है कि एथलेटिक्स को भी अन्य खेलों की तरह पूरा महत्व दिया जा रहा है. खेल निदेशालय रांची की ओर से मिली जानकारी के अनुसार खेल नीति के तहत खिलाड़ियों के लिए कई योजनाएं लागू की गई हैं और सुविधाओं को बेहतर बनाने की दिशा में लगातार काम किया जा रहा है.
खेल निदेशक आसिफ एकराम के मुताबिक जहां भी कमी है उसे दूर करने की कोशिश की जा रही है ताकि खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर सकें. प्रति खिलाड़ी लगभग 350 रुपए डाइट की दी जा रही है और हां इस दिशा में निगरानी रखने की जरूरत है.
खेल विभाग का दावा— सुविधाएं लगातार बेहतर की जा रही
वहीं झारखंड एथलेटिक्स एसोसिएशन के सीडी सिंह का कहना है कि अगर सरकार सहयोग करती है तो संगठन भी खिलाड़ियों के विकास के लिए हर कदम पर साथ काम करने के लिए तैयार है. उनका कहना है कि झारखंड के खिलाड़ी लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए एसोसिएशन भी प्रयास कर रहा है.
प्रतिभा की कमी नहीं, जरूरत है मजबूत व्यवस्था की
खेल विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड में एथलेटिक्स का भविष्य उज्ज्वल है. अगर खिलाड़ियों को बेहतर कोचिंग, संतुलित डाइट, स्पोर्ट्स साइंस सपोर्ट और हॉस्टल जैसी सुविधाएं मिल जाएं तो झारखंड से कई अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट तैयार हो सकते हैं.
रामचंद्र सांगा जैसे खिलाड़ी इस बात का उदाहरण हैं कि सीमित संसाधनों के बावजूद मेहनत और जुनून के दम पर बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं. अगर उन्हें सही सुविधाएं और मजबूत समर्थन मिल जाए तो यही खिलाड़ी झारखंड को एथलेटिक्स के नक्शे पर नई पहचान दिला सकते हैं.
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