Explainer: 'हम शौक से दिल्ली, मुंबई नहीं जाते' 21 सालों में कितना बदला बिहार, क्या कहते हैं पलायन के आंकड़े?
मजदूर दिवस श्रम शक्ति और उनके अधिकारों के सम्मान का दिन है, लेकिन बिहार की कड़वी सच्चाई क्या है, पटना से अविनाश की रिपोर्ट पढ़ें.

Published : May 1, 2026 at 3:22 PM IST
पटना : 1 मई यानी मजदूर दिवस. मजदूर की बात हो और बिहार की चर्चा ना हो तो खालीपन सा लगता है. अब इसे विडंबना कहिए या मजबूरी, पर जमीनी सच्चाई यही है कि मजदूरी के लिए बिहार के लोगों को दूसरे प्रदेश या फिर विदेश पलायन करना पड़ता है.
जब भी पलायन की चर्चा होती है बिहार का नाम सबसे पहले आता है. रोजी-रोटी के लिए बिहार से लाखों की संख्या में लोग हर साल पलायन करते हैं. यह सिलसिला पिछले कई दशकों से चला रहा है. नीतीश कुमार ने 2025 विधानसभा चुनाव से पहले एक करोड़ नौकरी और रोजगार का वादा किया था, मकसद था बिहार से पलायन को रोका जाए. नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री की कुर्सी सम्राट चौधरी को सौंप दी है. सम्राट चौधरी के लिए रोजी-रोटी के लिए पलायन रोकना अब एक बड़ी चुनौती है.
पलायन का दंश झेलता बिहार : बिहार के लिए पलायन एक बड़ा चैलेंज बना हुआ है. नवंबर 2005 में जब नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री बने तब उन्होंने पलायन रोकने के लिए कई कदम उठाया. बाद में उन्होंने दावा भी किया कि कई राज्यों में बिहार से होने वाला पलायन कमा है.
उस समय नीतीश कुमार इसका भी जिक्र करते रहे कि पंजाब के मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि बिहार से मजदूरों के नहीं आने से कृषि कार्य पर असर पड़ रहा है. लेकिन पिछले 20 सालों में जितने भी रिपोर्ट तैयार हुए हैं. सभी में यही बात सामने आयी कि बिहार से लाखों की संख्या में रोजी-रोटी के लिए लोग गुजरात, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और दक्षिण के राज्यों में जाते हैं.

पलायन को लेकर जो अब तक रिपोर्ट आते रहे हैं, उसने सरकार के लिए चुनौती जरूर बढ़ाया है:-
1. 2022-23 में बिहार सरकार के जातीय गणना रिपोर्ट में भी 53 लाख से अधिक लोगों के पलायन करने की बात कही गई. इसमें सबसे अधिक 45 लाख से अधिक रोजगार के लिए पलायन करते हैं. 5 लाख के करीब शिक्षा के लिए पलायन करते हैं.
2. नीति आयोग की 2022 में रिपोर्ट आई उसमें कहा गया 51.2 फीसदी लोग बिहार में गरीब हैं, जबकि 2005 में 54 फीसदी के आसपास लोग गरीब थे. इसी गरीबों के कारण लोग पलायन के लिए मजबूर होते हैं. इस पर काफी बवाल भी मचा. विपक्ष को हमला करने का मौका मिला.
3. उससे पहले 2020 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंस ने जो रिपोर्ट तैयार की उसमें हर दूसरे घर से पलायन की बात कही गई. ओबीसी, एससी, एसटी समुदाय से सबसे अधिक लोग पलायन करते हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि अंग्रेज के आने से पहले से ही बिहार से पलायन होता रहा है.
4. 2011 की जनगणना के आधार पर जनरल ऑफ माइग्रेशन अफेयर्स ने एक रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया कि सबसे अधिक 19% बिहार के मजदूर दिल्ली जाते हैं, उसके बाद बंगाल, महाराष्ट्र और अन्य दूसरे शहर. रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि माइग्रेशन का सबसे बड़ा कारण रोजगार ही होता है.
5. 2022 में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनामी ने बेरोजगारी को लेकर एक रिपोर्ट जारी की जिसमें कहा गया बिहार में 19% से अधिक बेरोजगारी है और इसके कारण ही पलायन होता है

पलायन करना क्यों है मजबूरी? : कई राज्यों में काम कर चुके मोहम्मद यूनुस का कहना है कि बिहार में पर्याप्त रोजगार नहीं मिलता है. अगर यहां काम मिलता भी है तो काम के बदले मजदूरी बहुत कम होती है. जबकि विकसित राज्यों में मजदूरी ठीक-ठाक मिल जाती है. मोहम्मद यूनुस टेलरिंग का काम करते हैं. अभी बिहार आये हैं लेकिन केरल, बेंगलुरु, तमिलनाडु, मुंबई और दिल्ली में जाकर काम कर चुके हैं. कहते हैं वहां काम के बदले अच्छा रेट मिलता है और सुविधाएं भी दी जाती है.

'चैलेंज आज भी है लेकिन पहल हुई है' : अर्थशास्त्रीय प्रोफेसर नवल किशोर चौधरी का कहना है कि पलायन आज भी बिहार की सबसे बड़ी समस्या है. बिहार कृषि प्रधान राज्य है लेकिन जिस प्रकार से पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में कृषि क्रांति हुई बिहार उसमें पीछे रह गया. कृषि को उद्योग से भी यहां जोड़ा नहीं गया है. बेरोजगारी का यह सबसे बड़ा कारण है. एक तो कृषि को आधुनिक बनाना होगा और कृषि आधारित उद्योग पर ज्यादा फोकस देना होगा.
''एमएसएमई पर केंद्र सरकार ने काम शुरू किया है उसका बिहार को भी लाभ मिल रहा है. नौकरी रोजगार को लेकर भी सरकार की चिंता बढ़ी है. ऐसे में आने वाले समय में बिहार में स्थिति बेहतर होगी इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है. हालांकि यह सरकार के लिए बड़ा चैलेंज जरूर है. सरकार को गन्ना उद्योग, जूट उद्योग इसी तरह के कृषि आधारित उद्योगों पर ज्यादा जोर देना चाहिए.''- प्रो. नवल किशोर चौधरी, अर्थशास्त्री

MSME सेक्टर में बढ़ा है रोजगार : एमएसएमई पर पिछले कुछ सालों में काफी काम हुआ है. बिहार के सांसदों डॉक्टर मोहम्मद जावेद, डॉक्टर आलोक कुमार सुमन और अशोक कुमार यादव की ओर से पूछे गए प्रश्न पर सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उद्यम राज्य मंत्री शोभा करांदलाजे ने जवाब दिया था कि 2022 से 2025 तक 3 सालों में बिहार में 11 लाख 34156 एमएसएमई निबंधित हुए हैं. जिसमें 77 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला है. सबसे अधिक रोजगार पटना, मुजफ्फरपुर, गया, भागलपुर, समस्तीपुर जिले में मिला है.
केंद्र सरकार के अनुसार बिहार के पांच प्रमुख जिलों में एमएसएमई में मिले रोजगार:-
| जिला | MSME निबंधित | रोजगार |
| पटना | 125984 | 753646 |
| मुजफ्फरपुर | 65021 | 465876 |
| गया | 46808 | 327500 |
| भागलपुर | 42875 | 266645 |
| समस्तीपुर | 47355 | 316320 |
लोन देने में बैंकों ने भी दिखाई है दरियादिली : पिछले 5 सालों में बैंकों ने भी कर्ज देने में एमएसएमई पर थोड़ी दरियादिली दिखाई है. 2020-21 में जहां 20277 करोड़ एमएसएमई सेक्टर को बैंकों ने कर्ज दिया था, जो 2024- 25 में बढ़कर 47101.21 करोड़ हो गया. इसके कारण भी इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर बढ़े हैं. केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार बिहार में सबसे अधिक 61467 एमएसएमई व्यापार क्षेत्र में निंबाधित है. उसके बाद 270579 विनिर्माण क्षेत्र में और 249510 सेवा क्षेत्र में एमएसएमई निबंधित है.
'टॉप 5 राज्यों में बिहार होगा शामिल' : जदयू विधायक दल के नेता और पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री श्रवण कुमार का कहना है एक करोड़ 81 लाख महिलाओं को रोजगार से जोड़ा गया है. 16 लाख शहरी क्षेत्र में भी महिलाओं को रोजगार से जोड़ने पर काम हुआ है. जब इतनी संख्या में महिलाएं रोजगार में आएंगी तो अकेले थोड़े काम करेंगी, उनके साथ उनके परिवार के लोग भी होंगे.

''हमारे नेता नीतीश कुमार ने एक करोड़ नौकरी रोजगार का वादा किया है. सम्राट चौधरी की सरकार भी उस पर काम कर रही है. लगातार वैकेंसी निकल रही है. मतलब नौकरी और रोजगार पर लगातार काम किया जा रहा है. ऐसे में पलायन रुकना ही है. 5 सालों में बिहार को हम लोग देश के टॉप 5 राज्यों में शामिल करने पर काम कर रहे हैं.''- श्रवण कुमार, पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री
विपक्ष के दिखाया आईना : हालांकि विपक्ष पलायन को लेकर सरकार पर लगातार हमला करता रहा है. राजद के महासचिव रणविजय साहू का कहना है कि बिहार से पलायन लगातार हो रहा है. बिहार के लोगों को हर जगह अपमानित होना पड़ रहा है.
''बंगाल, हरियाणा सहित अन्य राज्यों में बिहारी को पीटा जा रहा है लेकिन सत्ता पक्ष के लोग सिर्फ ठगने का काम करते हैं. दिल्ली में गरीब तबके के बिहारी को गोली मार दिया गया लेकिन बिहार से लेकर केंद्र तक सत्ता में बैठे एनडीए के लोगों की जुबान नहीं खुली.''- रणविजय साहू, महासचिव, आरजेडी

नीतीश कुमार के तरफ से पहल : 2020 में नीतीश सरकार के तरफ से 10 लाख नौकरी और 10 लाख रोजगार का वादा किया गया था. 2025 में कहा गया की 10 लाख से अधिक नौकरी और 40 लाख से अधिक रोजगार दे दिया गया है और उसके बाद फिर से एक करोड़ नौकरी और रोजगार का वादा किया गया.
पलायन रोकने के लिए नीतीश कुमार के समय ही कई कदम उठाए गए, जैसे जीविका दीदियों को रोजगार से जोड़ा गया. इसके कारण लाखों की संख्या में जो जीविका दीदी के परिवार से जुड़े हुए लोग थे वह बिहार लौटे हैं. जीविका से जुड़े हुए अधिकारियों का कहना है कि जीविका के रोजगार के बढ़ते कदम के कारण पिछले 3 सालों में 10 लाख लोग लौटे हैं.
खासकर जीविका दीदी के पति और उनके परिवार के सदस्य बिहार लौटे हैं. पहले पंजाब, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के राज्यों में रोजगार के लिए जाते थे. जीविका दीदियों के ज्वेलरी, सिलाई, हस्तशिल्प, नर्सरी, किराना दुकान जैसे व्यवसाय में प्रशिक्षण लेने के बाद उतरने के कारण ऐसा संभव हुआ है.
आंगनबाड़ी केंद्रों के बच्चों के पोशाक का काम भी सरकार ने जीविका दीदी को दे दिया गया है. 50000 से अधिक जीविका दीदी इस काम में लगी हुई हैं. आज जीविका दीदी के 5000 पति सिलाई केंद्रों पर मास्टर ट्रेनर की भूमिका निभा रहे हैं. इसी तरह अस्पतालों में भी खाना बनाने का काम जीविका दीदी को सौंपा गया है. उसमें भी उनके पति और परिवार के सदस्य मदद कर रहे हैं. इनमें से अधिकांश लोग पहले दूसरे राज्यों में जाकर काम करते थे.
''मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को आर्थिक मदद दी जा रही है, इससे भी बड़ी संख्या में महिलाएं रोजगार की तरफ कदम आगे बढ़ाई हैं. उनके परिवार के लोग भी उनके साथ हैं. इससे पलायन रोकने में मदद मिली है.''- हिमांशु शर्मा, जीविका के सीईओ
विधानसभा चुनाव में बना था बड़ा मुद्दा : 2025 विधानसभा चुनाव में पलायन पहली बार बड़ा मुद्दा बना था. जन सुराज के संयोजक प्रशांत किशोर ने तो इसे भुनाने की कोशिश भी की लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली. तभी तो विपक्षी वनेता कहते हैं, सरकार की तरफ से दावा भले ही कुछ हो लेकिन सच्चाई यही है कि आज भी छठ जैसे महापर्व में लाखों की संख्या में लोग भेड़-बकरी की तरह ट्रेनों में लौटते हैं. अभी ईरान युद्ध के समय भी बड़ी संख्या में लोग लौटे हैं. कोरोना के समय भी 50 लाख के करीब लोग बिहार लौटे थे.
'मंथन करने की जरूरत है' : एक्सपर्ट का साफ कहना है कि सरकार एमएसएमई सहित कई क्षेत्रों में काम कर रही है. नए फैसले भी ले रही है लेकिन इसके बावजूद पलायन आज भी बड़ा चैलेंज है. इसमें सबसे अधिक मजदूरी के लिए ही लोग पलायन करते हैं. ऐसे में 1 मई बड़ा दिन है. सरकार को एक बार फिर से इस पर मंथन करने की जरूरत है.
ये भी पढ़ें :-
क्यों मनाया जाता है अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस, जानें इस दिन का इतिहास और महत्व

