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'आपदा में दफन हुआ था पूरा गांव, सरकार से सिर्फ ₹5 हजार की मदद', जमा देने वाली सर्द रातें टैंट में गुजार रहे 32 परिवार

प्राकृतिक आपदा से बेघर हुए मातला गांव के लोग 2026 की बरसात से पहले स्थायी समाधान चाहते हैं.

KULLU MATLA VILLEGE
आपदा में दफन हुआ था पूरा गांव (ETV BHARAT)
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By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : February 12, 2026 at 10:38 AM IST

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कुल्लू: साल 2025 की वो मनहूस रात कुल्लू की सैंज घाटी के लिए एक ऐसा जख्म बन गई, जिसकी कसक आज भी हवाओं में महसूस की जा सकती है. मातला गांव, जो कभी अपनों की हंसी और पक्के मकानों से आबाद था, आज मलबे के ढेर पर खड़ा अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है. आपदा में गांव के 35 में से 32 घर देखते ही देखते जमींदोज हो गए और 150 से ज्यादा जिंदगियां एक झटके में बेघर हो गईं. सरकार ने 7 लाख रुपये की राहत का मरहम लगाने का वादा तो किया था, लेकिन 6 महीने बीत जाने के बाद भी ये परिवार कड़कड़ाती ठंड में टेंट और किराए के कमरों में उम्मीदों के साथ गुजर-बसर कर रहे हैं. सरकारी फाइलों के सफेद पन्नों और दावों के बीच, क्या है इन 32 परिवारों की आंखों में छिपी जमीनी हकीकत? देखिए हमारी यह स्पेशल ग्राउंड रिपोर्ट.

आपदा में 90 फीसदी गांव तबाह

ग्रामीणों का कहना है कि अगस्त 2025 के अंतिम सप्ताह में लगातार कई दिनों तक मूसलाधार बारिश हुई. पहाड़ी से दरकने की आवाजें आने लगीं. पहले जमीन में हल्की दरारें दिखीं, फिर अचानक पूरी ढलान खिसक गई. कुछ ही मिनटों में 32 घर मलबे में बदल गए. गांव के रास्ते टूट गए, पेयजल स्रोत धंस गया, स्कूल भवन में गहरी दरारें आ गईं. पंचायत घर और मंदिर भी क्षतिग्रस्त हुए. कई गौशालाएं मलबे में दब गईं. कुल 35 घरों वाले इस गांव में 90 फीसदी घर आपदा की चपेट में आ गए.

आपदा से प्रभावित परिवारों की आपबीती (ETV BHARAT)

आपदा के बाद गांव के 150 से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ना पड़ा. कुछ परिवार रिश्तेदारों के यहां शरण लेने को मजबूर हुए, कुछ ने किराए के छोटे-छोटे कमरों में ठिकाना ढूंढा, जबकि कई परिवार अब भी टेंट में रह रहे हैं. शुरुआती दिनों में प्रशासन ने प्रति परिवार 5 हजार रुपये की फौरी राहत और थोड़ा राशन दिया. लेकिन इसके बाद राहत की रफ्तार धीमी पड़ती गई.

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प्राकृतिक आपदा से मातला गांव में बेघर हुए 32 परिवार (ETV BHARAT)

टेंट में सर्द रातें बिताने को मजबूर ग्रामीण

मातला गांव की नेहा ठाकुर की आंखों में आज भी वह रातें ताजा है. वह कहती हैं, "सर्दियों में टेंट में रहना बहुत मुश्किल था. रात को ठंडी हवा सीधे अंदर आती थी. बच्चों को बार-बार सर्दी-खांसी होती रही. प्रशासन से 5 हजार रुपये और थोड़ा राशन मिला, लेकिन 7 लाख की पहली किस्त आज तक नहीं आई. अगर समय पर मदद मिल जाए तो बरसात से पहले कम से कम एक कमरा तो बना लें."

वहीं, बुजुर्ग लीला देवी बताती हैं कि कुछ लोगों को किराया मिला, लेकिन कई परिवार अब भी इंतजार कर रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता पशुओं की है. जिनके पास गाय-भैंस थीं, उनकी गौशालाएं टूट गईं. अब उन्हें कहां रखें? उनकी आवाज में चिंता साफ झलकती है.

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टेंट में सर्द रातें बिताने को मजबूर प्रभावित परिवार (ETV BHARAT)

मलबे में दफन हुई जिंदगी भर की कमाई

ग्रामीण भूमि चौहान बताते हैं, "मुख्यमंत्री ने 10 नवंबर को कहा था कि राहत जल्द मिलेगी. छह महीने हो गए, हमारे खाते खाली हैं. हमने सालों की कमाई से घर बनाए थे. सब कुछ एक पल में खत्म हो गया."

वह आगे बताते हैं कि आपदा में गांव का प्राकृतिक पेयजल स्रोत भी धंस गया था. बड़ी पाइप डालकर अस्थायी व्यवस्था की गई, लेकिन अब वह भी क्षतिग्रस्त हो चुकी है. जमीन में पानी रिस रहा है. अगर तुरंत स्थायी समाधान नहीं हुआ तो बची जमीन भी दलदल बन सकती है.

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आपदा में बुरी तरह प्रभावित हुआ मातला गांव (ETV BHARAT)

बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ा असर

आपदा में कई बच्चों की किताबें, बस्ते और जरूरी दस्तावेज मलबे में दब गए. फिलहाल अस्थायी व्यवस्था में पढ़ाई चल रही है, लेकिन नियमितता नहीं है. अभिभावकों का कहना है कि नए सत्र से पहले सुरक्षित आवास और पढ़ाई की व्यवस्था जरूरी है, वरना बच्चों का भविष्य प्रभावित होगा.

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आपदा के बाद करीब 150 लोगों को छोड़ना पड़ा गांव (ETV BHARAT)

एसडीएम बंजार पंकज शर्मा ने बताया, "2025 की बरसात में व्यापक नुकसान हुआ. सरकार ने किराए के भवन में रहने के लिए वित्तीय सहायता की घोषणा की थी. पात्र और सत्यापित परिवारों को भवन किराया सहायता के लिए 26 लाख 55 हजार रुपये जारी किए जा चुके हैं. सहायता उन्हीं परिवारों को दी गई है, जिनके मकान पूर्णतः क्षतिग्रस्त पाए गए और जिनका राजस्व विभाग ने सत्यापन किया."

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आपदा के चलते प्रभावित हुए थे हजारों परिवार (ETV BHARAT)

'सरकार ने नियमों में किया फेरबदल'

बंजार के विधायक सुरेंद्र शौरी ने कहा कि क्षेत्र में 500 से अधिक मकान पूरी तरह क्षतिग्रस्त हुए हैं और करीब 700 मकान ऐसे हैं जो कभी भी गिर सकते हैं. उन्होंने कहा कि सरकार ने नियमों में बदलाव कर दिया है, जो मकान पूरी तरह जमीन पर गिरे हों, वही पूर्ण क्षतिग्रस्त माने जा रहे हैं. जिन घरों में बड़ी दरारें हैं, वे भी रहने लायक नहीं. सरकार को उन्हें भी राहत देनी चाहिए. वहीं, एपीएमसी कुल्लू एवं लाहौल के अध्यक्ष राम सिंह मियां ने कहा कि पुनर्वास को प्राथमिकता दी जा रही है. राजस्व विभाग द्वारा पूर्ण क्षतिग्रस्त घोषित मकानों के खातों में 7 लाख रुपये की राहत राशि जल्द भेजी जाएगी. आंशिक क्षति वाले मकानों के लिए भी सहायता दी जा रही है.

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प्राकृतिक आपदा से मातला गांव में बेघर हुए 32 परिवार (ETV BHARAT)

मातला गांव के लोग अब 2026 की बरसात से पहले स्थायी समाधान चाहते हैं. उनकी मांग है कि भूमि आवंटन, पहली किस्त की त्वरित रिहाई और पेयजल-सड़क की मरम्मत जल्द हो. छह महीने से टेंट और किराए के कमरों में रह रहे परिवारों का कहना है कि अब उन्हें घोषणाओं से आगे बढ़कर जमीन पर राहत चाहिए.

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