'स्वीट' सरस्वती की धूम: आखिर क्यों हर कोई मांग रहा है यही मूर्ति? टूट गए निर्यात के सारे रिकॉर्ड!
कोलकाता के 37 वर्षीय मूर्तिकार ने सरस्वती मूर्ति के पारंपरिक स्वरूप को बदल दिया है. कुमारतुली के इस मूर्तिकार ने नई शैली पेश की है.


Published : January 10, 2026 at 8:05 PM IST
कोलकाता: दुर्गा पूजा अब एक सामुदायिक उत्सव से बदलकर एक वैश्विक उत्सव बन गई है. यूनेस्को (UNESCO) की मान्यता मिलने के बाद, विदेशी धरती पर बंगाल की परंपरा के साथ दुर्गा पूजा मनाने की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. अब यही रुझान सरस्वती पूजा में भी देखा जा रहा है. कुमारतुली के मूर्तिकारों के संघ की रिपोर्ट के अनुसार, सरस्वती माता की सौ से अधिक मूर्तियां पहले ही विदेश भेजी जा चुकी हैं.
इस साल विदेश निर्यात की गई सरस्वती मूर्तियों की संख्या 100 के आंकड़े को पार कर गई है, जिसने पिछले सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. हालांकि, मूर्तियों की यह मांग केवल विदेशों तक सीमित नहीं है. भारत के अन्य राज्यों में भी इनकी भारी मांग है. सरस्वती मूर्तियों की मांग में आई इस समग्र उछाल से मूर्तिकार बेहद खुश हैं. दुर्गा और काली पूजा से पहले कुमारतुली में जैसी हलचल रहती है, ठीक वैसा ही नजारा अब सरस्वती पूजा से पहले भी देखने को मिल रहा है.
कलाकार बंकिम पाल कहते हैं, "पिछली दुर्गा पूजा में लगभग एक हजार दुर्गा मूर्तियां विदेश गई थीं. मेरी बनाई मूर्तियां भी सऊदी अरब और लंदन जैसी जगहों पर गई हैं. पहले विदेश में रहने वाले बंगालियों को इन मूर्तियों के बारे में पता नहीं चल पाता था. अब मीडिया और सोशल मीडिया की मदद से वे इनके बारे में जान रहे हैं और ऑर्डर दे रहे हैं, क्योंकि वहां ऐसी मूर्तियां उपलब्ध नहीं हैं. अब हमारे पास बहुत से ग्राहक हैं."

कुमारतुली क्ले आर्टिस्ट्स कल्चरल एसोसिएशन के संयुक्त सचिव बाबू पाल का कहना है, "यह चलन पहले नहीं था. पहले सिर्फ दुर्गा की मूर्तियां ही विदेश जाती थीं. अब अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी विदेश जा रही हैं. सौ से अधिक सरस्वती मूर्तियां पहले ही भेजी जा चुकी हैं. पहले, कलाकार 'ऑफ-सीजन' (जब पूजा का समय नहीं होता) के दौरान खाली बैठे रहते थे. अब बाजार बहुत अच्छा है, और कलाकार साल भर काम में व्यस्त रहते हैं."
बाबू पाल बताते हैं कि पहले, दुर्गा की मूर्तियां 'शोला' (भारतीय कॉर्क) से बनाई जाती थीं. केवल 5-7 मूर्तियां ही विदेश जा पाती थीं. फिर फाइबरग्लास का चलन आया. इनकी संख्या लगातार बढ़ी और अब एक हजार से अधिक हो गई है. इसी तरह, सरस्वती मूर्तियों की मांग भी अब लगातार बढ़ रही है.
सरस्वती मूर्तियों का नया अंदाज
आमतौर पर सरस्वती माता की मूर्ति पारंपरिक रूप से पीली साड़ी पहने, उनके बाएं हाथ के पास एक हंस और हाथ में तानपुरा (वीणा) लिए हुए दिखाई देती है. हर कोई इसी रूप को देखने का आदी है. लेकिन इस बार, कुमारतुली के एक 37 वर्षीय मूर्तिकार ने सरस्वती मूर्ति के इस पारंपरिक स्वरूप को बदल दिया है.
कुमारतुली के इस मूर्तिकार ने अपने काम के जरिए एक नई शैली पेश की है, ठीक वैसी ही जैसा प्रसिद्ध कलाकार सनातन डिंडा पहले कर चुके हैं. दुर्गा पूजा के दौरान सनातन डिंडा द्वारा बनाई गई दुर्गा मूर्ति, जिसका चेहरा गौतम बुद्ध से प्रेरित था, उसने दर्शकों का मन मोह लिया था. उसी तर्ज पर, इस कलाकार द्वारा बनाई गई 'स्वीट' सरस्वती अब कुमारतुली में एक नया ट्रेंड बन गई है.

कौन हैं ये कलाकार
इन कलाकार का नाम दीपांकर पाल है. वह साल 2012 से कुमारतुली में विभिन्न प्रकार की मूर्तियां बना रहे हैं. दीपांकर के दादा शीतल चंद्र पाल और उनके पिता तरुण पाल थे. वे तीन पीढ़ियों से मूर्ति बनाने के इस काम में लगे हुए हैं. दीपांकर ने अपने पिता और दादा से ही मूर्ति बनाने की कला सीखी है. उन्होंने कोलकाता में '74 पल्ली' और 'युवक बृंदा' सहित कई दुर्गा पूजा पंडालों के लिए 'थीम' आधारित मूर्तियां बनाई हैं.
कैसे शुरू हुआ 'स्वीट' सरस्वती का ट्रेंड?
साल 2015 में, कलाकार दीपांकर पाल ने मध्य कोलकाता के चोरबागान की एक पूजा समिति के लिए सरस्वती माता की एक मूर्ति बनाई थी, जो एक छोटी बच्ची जैसी दिखती थी. इसका चेहरा बहुत ही प्यारा और मुस्कुराहट भरा था. यहां तक कि उनका वाहन 'हंस' भी एक खिलौने वाले हंस जैसा बनाया गया था. दूसरे शब्दों में कहें तो, यह पारंपरिक सरस्वती मूर्ति से पूरी तरह अलग थी. उस 'स्वीट' सरस्वती ने दर्शकों का मन मोह लिया था.
इसके बाद, दीपांकर पाल को इसी शैली में दुर्गा मूर्ति बनाने का ऑर्डर मिला. उन्होंने वह मूर्ति बनाकर आसनसोल भेजी, जिसके फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गए. बाद में, उन्होंने इसी प्यारी बच्ची वाली शैली में शिव और पार्वती सहित कई अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां भी बनाईं. आज, कुमारतुली के विभिन्न कलाकारों के वर्कशॉप में जाने पर इन गुड़िया जैसी दिखने वाली 'स्वीट' सरस्वती मूर्तियों की भारी मांग साफ देखी जा सकती है.
कलाकार की जुबानी
दीपांकर पाल ने कहा, "एक रचना ने लोगों के मन पर छाप छोड़ी है. इस शैली में बनी मेरी मूर्तियों को अब बहुत से लोग पसंद कर रहे हैं. पूरे कुमारतुली में कई कलाकारों को विभिन्न क्लबों से इसी शैली में मूर्तियां बनाने के ऑर्डर मिले हैं. मैं इससे बहुत खुश हूं. मेरे रचनात्मक कार्य की सफलता अब रंग ला रही है। हालांकि, मैं आने वाले सालों तक सिर्फ इसी एक शैली तक सीमित नहीं रहूंगा. मैं फिर से कुछ नया सोच रहा हूं."
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