कोलकाता में अनोखा 'हॉबी गैलरी': 200 साल पुराने लैंप का संग्रह, रनर से लेकर LED तक की कहानी!
तापस बसु भारतीय जूट निगम में काम करते थे. केंद्र सरकार की नौकरी के अलावा, वे दीये इकट्ठा करने के लिए इधर-उधर भागते रहते थे.


Published : November 16, 2025 at 8:04 PM IST
कोलकाताः पश्चिम बंगाल के मशहूर कवि सुकांत भट्टाचार्य की कविता 'रनर' में एक पंक्ति है- "हाथे लैंठन ठन ठन जोंकिरा देई आलो." यानी हाथ में लैंटर्न लेकर रनर अंधेरे में चिट्ठियां पहुंचाते थे. उस समय बिजली नहीं थी. ऐसे पुराने लैंटर्न अब कोलकाता के बेलगाचिया इलाके में दत्ता बागान की एक फ्लैट में देखे जा सकते हैं.
यहां पूर्व सरकारी कर्मचारी तापस बसु ने अपना 'हॉबी गैलरी' बनाया है. 6 फीट चौड़े और 7 फीट लंबे बेड पर सैकड़ों बल्ब और लैंप सजाए गए हैं. यह संग्रह दुनिया भर में रोशनी के विकास की 200 साल पुरानी कहानी दिखाता है. लैंप के अलावा तापस बसु के पास कई और पुरानी चीजें हैं. उम्र बढ़ने के साथ संग्रह बढ़ता जा रहा है. इस शौक के लिए उन्हें कई सम्मान मिले. क्रिकेटर सौरव गांगुली जैसे लोग भी उनसे मिल चुके हैं.

कौन हैं तापस बसु?
तापस बसु भारतीय जूट निगम में काम करते थे. केंद्र सरकार की नौकरी के अलावा, वे दीये इकट्ठा करने के लिए इधर-उधर भागते रहते थे. यह उनका शौक है. और इसी शौक से उन्होंने प्रकाश के इतने सारे स्रोत इकट्ठा किए हैं. वे 65 सालों से प्रकाश की खोज में हैं. उन्होंने एक-एक करके विभिन्न प्रकार के दीये इकट्ठा किए हैं. वे पिछले 60 सालों से अलग-अलग जगहों पर उनकी प्रदर्शनी भी लगाते रहे हैं.

संग्रहालय में क्या-क्या हैः
धावक का लालटेनः तापस के संग्रह में एक धावक का हाथ का लालटेन है. बेल्जियम के कांच से बना है. यह लालटेन इस तरह से बनाया गया था कि तेज तूफ़ान, बारिश या तेज हवा में भी नहीं बुझता था. धावक का लालटेन मिट्टी के तेल से जलता था. यह लालटेन इंग्लैंड में बनता था. वहां से यह भारत लाया गया था.
वनकर्मियों के लालटेनः जंगल में वनकर्मी लालटेन का इस्तेमाल करते थे. उस समय, लालटेन के अलावा कोई और विकल्प नहीं था. इसलिए, वन अधिकारियों से लेकर रेंजरों तक, इन लालटेनों का इस्तेमाल किया जाता था. ये लालटेन भी इस तरह से बनाए जाते थे कि तूफ़ान और बारिश की स्थिति में भी ये बुझते नहीं थे. ये भी विदेशों से बनाकर यहां लाए जाते थे.

घोड़ागाड़ी वाला लैंपः तापस बसु के पास एक घोड़ागाड़ी वाला लैंप भी है. ब्रिटिश काल में, बड़ी और छोटी घोड़ागाड़ियों में पीतल के फ्रेम वाला यह बड़ा बेल्जियन कांच का लैंप लगा होता था.
स्टीमर और ट्रैफिक सिग्नल लैंपः संग्रहालय में एक स्टीमर लैंप भी है. स्टीमर के पीछे यह लैंप लगाया जाता था. बिजली या स्वचालित सिग्नल आने से पहले, पुलिस यातायात नियंत्रित करने के लिए रंगीन लैंप का इस्तेमाल करती थी. वह लैंप भी तापस बसु के संग्रहालय में है.

रेलवे सिग्नल लैंपः भारतीय रेलवे का एक सिग्नल लैंप भी है. इनमें से एक लैंप स्टेशन मास्टर और दूसरा गार्ड के पास रहता था. उस समय, स्टेशन मास्टर गार्ड को लैंप का रंग घुमाकर दिखाता था. गार्ड उसे देखकर ट्रेन ड्राइवर को वही रंग दिखाता था. यह भी रंगीन कांच वाला केरोसिन आधारित लैंप था. लाल, पीला और हरा रंग का लैंप था.
घरों के लैंपः जब बिजली हर घर तक नहीं पहुंची थी, तब घरों को रोशन करने के लिए तरह-तरह के लैंप का इस्तेमाल किया जाता था. इनका इस्तेमाल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी होता था. जर्मनी, फ्रांस, जापान, इंग्लैंड समेत कई देशों में इनका इस्तेमाल होता था. तापस के संग्रह में भी ऐसे कई रंगीन लैंप हैं. जब महानगरों में बिजली उपलब्ध होने लगी. तब घर में टेबल लैंप से रोशनी कैसी होती थी, यह आप 'हॉबी गैलरी' में आकर देख सकते हैं.

खदान के लैंपः यहां खदान के अंदर काम करते समय इस्तेमाल होने वाले लैंप भी हैं. बैटरी से चलने वाले टेबल लैंप, विभिन्न प्रकार के गुंबद, आपातकालीन लाइटें, एलईडी से लेकर आधुनिक प्रकाश लैंप तक मौजूद हैं.
क्या कहते हैं तापस बसुः "मेरे संग्रहालय में कई तरह की चीजें हैं. प्राचीन से लेकर आधुनिक तक. मैंने मिट्टी के तेल से चलने वाले लैंप से लेकर बिजली के लैंप तक सब कुछ रखा है. अलग-अलग समय में विज्ञान और तकनीक की प्रगति और उसका प्रभाव यहाँ साफ दिखाई देता है. दो सौ साल पहले के लोगों की तकनीकी सोच भी साफ़ दिखाई देती ह. मेरे संग्रह में ऐसी कई चीज़ें हैं."

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