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उत्तराखंड में विवाद से फिर सुर्खियों में 'गुरु की लाडली फौजी', जानिए क्या है निगंहों का इतिहास

उत्तराखंड में विवाद के बाद सुर्खियों में आए निहंग सिख के इतिहास के बारे में आपको विस्तार से बताते हैं. रिपोर्ट- किरणकांत शर्मा.

NIHANGS SIKH CONTROVERSY
कौन होते हैं निहंग सिख (फाइल फोटो- ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : June 26, 2026 at 9:46 PM IST

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देहरादून: उत्तराखंड में बीते कुछ दिनों से विवादों के कारण निहंग सिख चर्चाओं में हैं. 16 जून को स्थानीय लोगों के साथ कर्णप्रयाग में निहंग सिखों का झगड़ा हो या फिर रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू गुरुद्वारे पर निहंग सिखों के कब्जे का मामला. वहीं अब देहरादून जिले में हिमाचल और उत्तराखंड बॉर्डर पर हुआ ताजा विवाद. इन तमाम मामलों ने एक बार फिर से निहंग सिख की तरफ सबका ध्यान खींचा है.

जिन निहंग सिखों की वजह से उत्तराखंड में सरकार से लेकर शासन-प्रशासन और पुलिस के हाथ-पांव फूले हुए हैं, उनकी सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हो रही है. सोशल मीडिया से लेकर आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि आखिर निहंग कौन होते हैं. उनका इतिहास क्या है. और उनकी पहचान किन आधारों पर बनी है.

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निहंग सिखों का जत्था (फाइल फोटो- ETV Bharat)

दरअसल, मामला धार्मिक भावनाओं से भी जुड़ा हुआ है. इसलिए किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले इतिहास परंपरा और वर्तमान स्थिति को समझना आवश्यक है. हम आपको बताते हैं कि सिख इतिहास में निहंगों की भूमिका क्या रही है और उनकी परंपरा आज भी क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है.

युद्ध और धर्म रक्षा से जुड़ी है निहंगों की पहचान: निहंग सिख धर्म के उस योद्धा वर्ग का हिस्सा माने जाते हैं, जिसकी स्थापना धर्म, समाज और कमजोरों की रक्षा के उद्देश्य से हुई थी. इतिहास के अनुसार, जब भारत में धार्मिक स्वतंत्रता पर संकट गहराने लगा और अत्याचार बढ़ने लगे तब सिख गुरुओं ने आध्यात्मिक शक्ति के साथ सैन्य शक्ति को भी आवश्यक माना.

खालसा पंथ की स्थापना: इसी सोच के तहत गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की और ऐसे अनुशासित योद्धाओं की परंपरा विकसित हुई, जो अन्याय के खिलाफ हथियार उठाने के साथ-साथ सेवा, त्याग और मानवता की रक्षा को भी अपना धर्म मानते थे. समय के साथ यही योद्धा परंपरा निहंगों के रूप में प्रसिद्ध हुई. सिख इतिहास में उन्हें अकाल सेना या गुरू की फौज के नाम से भी जाना जाता है.

आखिर क्यों पड़ी थी निहंगों की जरूरत: सिख धर्म के जानकार पविंदर सिंह बताते हैं कि सत्रहवीं शताब्दी का भारत राजनीतिक और धार्मिक संघर्षों का दौरे से गुजर रहा था. उस समय मुगल शासन के दौरान कई स्थानों पर धार्मिक उत्पीड़न और जबरन धर्म परिवर्तन जैसी घटनाओं का उल्लेख इतिहास में मिलता है. ऐसे हालातों में केवल उपदेश और आध्यात्मिक शिक्षा पर्याप्त नहीं थी. समाज और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए प्रशिक्षित योद्धाओं की आवश्यकत महसूस हुई, तभी गुरु गोबिंद सिंह जी ने इसी उद्देश्य से संत और सिपाही दोनों गुणों वाले सिख तैयार किए.

इन योद्धाओं को आध्यात्मिक अनुशासन के साथ युद्ध कौशल भी सिखाया गया. यही कारण है कि निहंगों को केवल धार्मिक साधक नहीं बल्कि धर्म और न्याय की रक्षा करने वाले योद्धा के रूप में भी देखा जाता है.
- पविंदर सिंह, सिख धर्म के जानकार -

निहंग शब्द का अर्थ क्या है: पविंदर सिंह कहते हैं कि निहंग शब्द की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों और शोधकर्ताओं के बीच अलग-अलग मत मिलते हैं.

एक मत के अनुसार यह शब्द फारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ मगरमच्छ या ऐसा निर्भीक योद्धा बताया जाता है, जो किसी भी परिस्थिति में विचलित न हो. वहीं सिख परंपरा में निहंग उस खालसा योद्धा को कहा जाता है, जिसने अपना जीवन गुरू की मर्यादा धर्म की रक्षा और मानवता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया हो.
- पविंदर सिंह, सिख धर्म के जानकार -

यही कारण है कि निहंगों को केवल एक धार्मिक समुदाय नहीं बल्कि साहस त्याग अनुशासन और निर्भयता का प्रतीक भी माना जाता है.

क्या कोई भी बन सकता है निहंग:

  • केवल नीले वस्त्र पहन लेने या फिर पारंपरिक हथियार धारण करने से ही कोई निहंग नहीं बना जाता है.
  • इसके लिए व्यक्ति को पहले खालसा परंपरा में दीक्षित होना पड़ता है.
  • अमृत छकना (सिख धर्म में एक दीक्षा समारोह), पांच ककारों (बिना कटे बाल, एक छोटी लकड़ी की कंघी, लोहे या स्टील का कंगन, एक विशेष सूती अंतर्वस्त्र और एक छोटी तलवार) का पालन करना.
  • इसके अलावा गुरु ग्रंथ साहिब के प्रति पूर्ण आस्था रखना.
  • नियमित रूप से बाणी का पाठ करना और कठोर धार्मिक अनुशासन का पालन करना आवश्यक माना जाता है.
  • इसके अलावा वरिष्ठ निहंगों के मार्ग दर्शन में लंबे समय तक प्रशिक्षण लिया जाता है.
  • इस दौरान शस्त्र संचालन, गतका (सिखों की एक पारंपरिक और प्राचीन युद्ध-कला), घुड़सवारी, सेवा संयम और धार्मिक मर्यादा का अभ्यास कराया जाता है.
  • इसलिए निहंग बनना एक जीवनशैली और आजीवन अनुशासन का विषय माना जाता है.

क्या होती है निहंगों की सबसे बड़ी खासियत: नाम न छापने की शर्त पर एक निहंग ने ईटीवी भारत से बात की. उन्होंने बताया कि,

हमारी सबसे अलग पहचान हमारा साहस, अनुशासन और युद्ध कौशल है. निहंग पारंपरिक सिख मार्शल आर्ट गतका में कुशल होते हैं. तलवार, भाला, कृपाण और चक्र सहित अनेक पारंपरिक शस्त्रों के संचालन में प्रशिक्षित रहते हैं. वेशभूषा भी अलग पहचान देती है. गहरे नीले रंग का चोला, ऊंची पगड़ी, पगड़ी पर लोहे के चक्र और कमर में शस्त्र धारण करना पारंपरिक पहचान मानी जाती है.

निहंग का कहना है कि आज इन शस्त्रों का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व अधिक है, लेकिन इतिहास में यही हथियार धर्म और समाज की रक्षा का माध्यम रहे हैं.

निहंग कहां रहते हैं और क्या करते हैं: निहंगों का कोई एक स्थायी निवास क्षेत्र नहीं होता. पंजाब के आनंदपुर साहिब, अमृतसर, पटियाला और तलवंडी साबो जैसे धार्मिक केंद्रों में निहंगों के प्रमुख जत्थे मौजूद हैं. इसके अलावा देशभर में होने वाले धार्मिक आयोजनों, नगर कीर्तन, होला मोहल्ला और बड़े गुरुद्वारों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रहती है.

कई निहंग डेरों में रहकर धार्मिक जीवन व्यतीत करते हैं, जबकि कई जत्थे लगातार यात्रा करते हुए सेवा और धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते रहते हैं. लंगर सेवा श्रद्धालुओं की सहायता और पारंपरिक युद्ध कला का प्रशिक्षण भी उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है.

इतिहास में निहंगों का योगदान क्यों माना जाता है महत्वपूर्ण: पविंदर सिंह कहते कि सिख इतिहास में निहंगों ने अनेक महत्वपूर्ण युद्धों और संघर्षों में भूमिका निभाई है. अहमद शाह अब्दाली के आक्रमणों के दौरान गुरुद्वारों की रक्षा, श्रद्धालुओं की सुरक्षा और सिख परंपराओं को जीवित रखने में उनके योगदान का उल्लेख कई ऐतिहासिक स्रोतों में मिलता है. बाबा दीप सिंह, बाबा बिनोद सिंह और अकाली फूला सिंह जैसे वीर योद्धाओं को निहंग परंपरा की प्रेरणादायक विरासत का हिस्सा माना जाता है.

NIHANGS SIKH CONTROVERSY
निहंग सिख (फाइल फोटो- ETV Bharat)

इतिहास को समझना भी उतना ही जरूरी जितना वर्तमान को: पविंदर सिंह कहते हैं कि देहरादून में चल रहा विवाद अपने कानूनी और प्रशासनिक पहलुओं के साथ आगे बढ़ेगा, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर निहंग परंपरा को समझने का अवसर भी दिया है.

निहंग केवल एक वेशभूषा या हथियारों से पहचाने जाने वाला समुदाय नहीं हैं, बल्कि वो सिख इतिहास की उस गौरवशाली सैन्य परंपरा का हिस्सा हैं, जिसने धर्म, मानवता और न्याय की रक्षा के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. इसलिए देहरादून या चमोली जैसे विवाद के बाद किसी भी तरह की बात या टिप्पणी बहुत सोच समझ कर करनी होगी. ये सभी धर्म के लोगों के लिए बहुत जरूरी है. फिलहाल पुलिस इस मामले मे निहंगों के दलों से बात कर रही है, आगे जो भी होगा वो कानून के अनुसार होगा, ऐसी उम्मीद है.
- पविदंर सिंह, सिख धर्म के जानकार -

एक बार पूरा मामला भी समझ लीजिए: दरअसल, उत्तराखंड के चमोली जिले में सिखों का पवित्र धर्म स्थल हेमकुंड साहिब स्थित है. हेमकुंड साहिब के बारे में कहा जाता है कि सिख धर्म के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी आत्मकथा 'विचित्र नाटक' (दसम ग्रंथ का हिस्सा) में बताया था कि इस जन्म में आने से पहले, उन्होंने हिमालय के 'हेमकुंट पर्वत' पर सात चोटियों के बीच स्थित एक झील के किनारे गहन तपस्या की थी. इसलिए हेमकुंड साहिब से सिखों की काफी आस्था जुड़ी हुई है.

कर्णप्रयाग में निहंग सिखों को गिरफ्तार किया गया था: बीती 16 जून को निहंग सिखों को एक दल हेमकुंड साहिब की यात्रा कर वापस लौट रहा था. तभी बीच रास्ते में कर्णप्रयाग में किसी छोटी सी बात पर उनका स्थानीय व्यापारियों से झगड़ा हो जाता है. ये विवाद मारपीट तक पहुंच जाता है. आरोप है कि इस दौरान निहंग सिखों ने तलवार से हमला किया, जिससे कई लोग घायल भी हो गए. इस मामले में पुलिस ने चार निहंग सिखों को गिरफ्तार भी किया था, जो फिलहाल जेल में है.

रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू गुरुद्वारे पर कब्जा किया: इस घटना के चार दिन यानी 20 जून की शाम को ही कुछ निहंग रुद्रप्रयाग जिले के नगरासू गुरुद्वारे में पहुंचे थे. वहां उनका गुरद्वार से सेवादारों से झगड़ा होता है. मामले की जानकारी मिलते ही पुलिस भी मौके पर पहुंचती है, लेकिन निहंग गुरुद्वारे की छत पर चढ़कर काफी हंगामा करते थे. इस दौरान निगंहों ने दो सेवादारों को बंधक बना लिया था. हालांकि बाद में उन्हें छोड़ दिया था. करीब चार दिनों तक कई निहंगों ने गुरुद्वारे की ऊपरी मंजिल पर कब्जा करके रखा था. पंजाब से आए निहंगों के एक दल ने गुरुद्वारे में मौजूद निहंगों के बात की और उन्हें समझाकर नीचे उतारा.

400 निहंग उत्तराखंड बॉर्डर पर पहुंचे: गुरुद्वारे पर कब्जा करने वाले निहंगों की मांग थी कि कर्णप्रयाग विवाद के बाद गिरफ्तार किए गए निहंगों को छोड़ा जाए. इसी बीच पंजाब के कुछ निहंगों ने कर्णप्रयाग की घटना के विरोध में 25 जून को उत्तराखंड कूच का ऐलान किया था. 25 जून को बड़ी संख्या में पंजाब से करीब 400 निहंग गाड़ियों में सवार होकर उत्तराखंड पहुंचे भी थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें हिमाचल बॉर्डर पर ही रोक लिया था.

इस दौरान निहंगों ने हिमाचल-उत्तराखंड बॉर्डर पर काफी हंगामा भी किया था. वहां बैरिकेडिंग तोड़कर कुछ निहंग देहरादून भी पहुंच गए थे, जिन्हें पुलिस ने समझाकर वापस पांवटा साहिब भेज दिया था. फिलहाल पुलिस-प्रशासन की पांवटा साहिब गुरुद्वारे में निहंगों से वार्ता हुई है. निहंगों ने सरकार और पुलिस-प्रशासन को दो दिन का अल्टीमेटम दिया है. दो दिनों के अंदर यदि कर्णप्रयाग घटना में गिरफ्तार निहंगों को नहीं छोड़ा गया तो कर्णप्रयाग के लिए कूच करेंगे.

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