Explained : विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने अरावली में माइनिंग पर लगाई रोक, समझें पूरा विवाद
जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को अरावली में किसी भी नई माइनिंग लीज देने पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्देश दिया है.

Published : December 24, 2025 at 8:30 PM IST
|Updated : December 24, 2025 at 8:53 PM IST
नई दिल्ली : अरावली रेंज को बचाने के लिए एक बड़े कदम के तहत, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने राज्यों को अरावली में किसी भी नई माइनिंग लीज देने पर पूरी तरह रोक लगाने का निर्देश दिया है. यह रोक पूरे अरावली इलाके में एक जैसी लागू होगी और इसका मकसद इस रेंज में एकरूपता बनाए रखना है. मगर यह पूरा विवाद क्या है, और ऐसी क्या स्थिति आ गई कि केंद्र सरकार को नया निर्देश जारी करना पड़ गया. आइए इसे समझते हैं.
विवाद की शुरुआत अरावली को लेकर दी गई एक परिभाषा में है. दरअसल, केंद्र सरकार ने अरावली पहाड़ियों को लेकर एक नई परिभाषा दी. इसके अनुसार 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली घोषित किया गया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर अपनी मुहर लगा दी.
Centre will protect entire Aravallis, No Mining Leases
— PIB India (@PIB_India) December 24, 2025
💠Protected Zone to be Expanded
💠This prohibition applies uniformly across the entire Aravalli landscape and is intended to preserve the integrity of the range. The directions are aimed at safeguarding the Aravallis as a…
पर्यावरणविद मानते हैं कि अगर इस परिभाषा को स्वीकार कर लिया जाएगा, तो अरावली के 90 फीसदी इलाके माइनिंग (खनन) के लिए खुल जाएंगे. पूरा विवाद इससे ही संबंधित है. हालांकि विवाद बढ़ते ही केंद्र सरकार ने नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया.
केंद्र सरकार ने कहा कि उन्होंने जो परिभाषा निर्धारित की है, वह राजस्थान में साल 2006 से मान्य है. सरकार के अनुसार अरावली के लिए अब यही पैमाने हरियाणा, गुजरात और दिल्ली के लिए भी लागू होंगे. इससे पहले अलग-अलग राज्यों में पहाड़ियों को लेकर अलग-अलग परिभाषाएं थीं.
परिभाषा में यह भी बताया गया है कि 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली दो पहाड़ियों के बीच 500 मीटर तक का क्षेत्र संरक्षित होगा. यानी उस दायरे तक खनन की अनुमति नहीं मिल सकती है. लेकिन इस दायरे के बाहर के क्षेत्र का क्या होगा, इस पर विवाद है. इसका मतलब है कि उसके बाद का जो इलाका आएगा, वहां पर खनन हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन क्षेत्रों में सस्टेनेबल माइनिंग हो सकती है. सस्टेनेबल माइनिंग का मतलब - आप खनन के दौरान वहां के पर्यावरण, जंगल, पानी और अन्य चीजों को नुकसान नहीं पहुंचाएंगे.
क्या कहना है पर्यावरणविद का
पर्यावरणविद नई परिभाषा का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि एक बार माइनिंग की इजाजत मिल जाती है, तो यह निर्धारण करना कठिन हो जाता है, कि आपने कितने क्षेत्रों का अतिक्रमण किया है. हालांकि, केंद्र सरकार पर्यावरणविद के दावे या आपत्ति को सही नहीं मानती है. सरकार का कहना है कि अरावली रेंज के 90 फीसदी से अधिक इलाके संरक्षित हैं, इसलिए चिंता की बात नहीं है.
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन की अपर्णा रॉय कहती हैं, "इकोलॉजिकल सच्चाई यह है कि अरावली सिस्टम लाखों सालों की जियोलॉजिकल प्रोसेस से बना एक कंटिन्यूटी है, जो अब पहाड़ियों, टीलों, चट्टानों और पठारों के मोजेक में बदल गया है. ये खूबियां मिलकर टूटी हुई चट्टानों के एक्वीफर में बारिश के पानी के रिसने को कंट्रोल करती हैं, जो बदले में राजस्थान और हरियाणा के ग्रामीण समुदायों के लिए कुओं, झरनों और बेसफ्लो को बनाए रखता है. यह सूखे मौसम में पीने, सिंचाई और जानवरों के लिए ग्राउंडवाटर पर निर्भर रहते हैं. जब छोटे लैंडफॉर्म को कानूनी तौर पर मान्यता नहीं दी जाती है, तो प्लानिंग और प्रोटेक्शन फ्रेमवर्क में उनके हाइड्रोलॉजिकल योगदान को नजरअंदाज किए जाने का खतरा होता है, भले ही वे जमीन पर फिजिकली मौजूद हों."
अरावली का महत्व क्यों
अरावली पहाड़ियां गुजरात के पालनपुर से राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैला है. यह देश की सबसे पुरानी भूवैज्ञानिक संरचनाओं में से एक है. ऐतिहासिक रूप से, इन्हें राज्य सरकारों द्वारा 37 जिलों में मान्यता दी गई है और इनकी पारिस्थितिक भूमिका को उत्तरी रेगिस्तानीकरण के खिलाफ एक प्राकृतिक बाधा और जैव विविधता और जल पुनर्भरण के रक्षक के रूप में देखा गया है. अरावली रेंज की लंबाई लगभग 700 से 800 किलोमीटर है. इसका अस्सी फीसदी एरिया राजस्थान में आता है. अरावली रेंज पर खनिजों का भंडार है. इनमें लेड, सिल्वर, कैडमियम, जिंक, ग्रेनाइट आदि शामिल हैं. राजस्थान सरकार ने 2018 में सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि उसे राज्य भर में सभी माइनिंग एक्टिविटी से सालाना कुल लगभग ₹5,000 करोड़ की रॉयल्टी मिलती है और इसका अधिकांश हिस्सा अरावली से आता है.

अवैध खनन पर लगी रोक
साल 2002 में सेंट्रल एम्पावर्ड कमेटी ने अरावली में अवैध खनन पर रोक लगा दी थी. 2003 में राजस्थान (तब गहलोत सरकार) ने इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की. कोर्ट ने पहले से चले आ रहे माइनिंग लीज को जारी रखने की अनुमति प्रदान कर दी.
इसके बाद केंद्र सरकार ने एक कमेटी बनाई. इस कमेटी ने ही अरावली रेंज के लिए 100 मीटर का फॉर्मूला तय किया. यह माना गया कि इस इलाके में 100 मीटर से छो़टी पहाड़ियों को अरावली न माना जाए, और वहां पर माइनिंग को जारी रखा जा सकता है.
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने किया अलर्ट, पर सरकार अपने फैसले पर अड़ी रही
फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने 2010 में एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी. इसमें बताया गया कि अवैध खनन की वजह से अरावली एरिया को नुकसान पहुंच रहा है. फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने 2024 में भी एक रिपोर्ट प्रकाशित की. इसमें बताया गया कि राज्सथान के 15 जिलों में अरावली का एरिया है. इसमें 12081 पहाड़ियां हैं. इनमें से 1048 पहाड़ी ऐसी हैं, जिनकी ऊंचाई 100 मीटर से अधिक हैं. इसलिए बेहतर होगा कि परिभाषा को 100 मीटर के बजाए 30 मीटर निर्धारित किया जाए, ताकि इन पहाड़ियों को अवैध माइनिंग से बचाया जा सके. पर मोदी सरकार ने भी 2010 के फैसले को ही स्वीकार किया. यानी 100 मीटर का फॉर्मूला. और अब सुप्रीम कोर्ट ने इसी परिभाषा पर अपनी मुहर लगा दी है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मोदी सरकार की दलील
सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर मोदी सरकार ने अपनी दलील दी है. उनके अनुसार यह फैसला पारदर्शी, निष्पक्ष और वैज्ञानिक है. सरकार ने अपने बयान में कहा, "अरावली पहाड़ियों को स्थानीय राहत से 100 मीटर या उससे ज्यादा ऊंची भू-आकृतियों के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसमें उनकी सहायक ढलानें भी शामिल हैं. 500 मीटर के दायरे में पहाड़ियों को अरावली पर्वतमाला में बांटा गया है, इसलिए बीच की घाटियां, ढलानें और छोटी पहाड़ियां भी सुरक्षित हैं. संरक्षित क्षेत्रों, पर्यावरण-संवेदनशील क्षेत्रों, टाइगर रिजर्व, वेटलैंड्स और सीएएमपीए प्लांटेशन साइट्स में खनन पूरी तरह से प्रतिबंधित है. सुप्रीम कोर्ट ने एक विस्तृत स्थायी खनन योजना (एमपीएसएण) तैयार होने तक नई खनन लीज पर रोक लगाने का आदेश दिया है. मौजूदा संचालन को पर्यावरण मंजूरी, वन मंजूरी और लगातार निगरानी का पालन करना होगा. उल्लंघन करने पर निलंबन हो सकता है. ड्रोन, सीसीटीवी, वेइंगब्रिज और जिला टास्क फोर्स से निगरानी यह सुनिश्चित करती है कि अनधिकृत गतिविधि के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो. आईसीएफआरई द्वारा तैयार की जाने वाली आगामी एमपीएसएम में अनुमेय और निषिद्ध क्षेत्रों की पहचान की जाएगी, पारिस्थितिक वहन क्षमता का आकलन किया जाएगा और खनन के बाद बहाली अनिवार्य होगी."
ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट से बचेगा अरावली एरिया
सरकार ने ग्रीन वॉल प्रोजेक्ट का भी जिक्र किया है. इसके तहत चार राज्यों में फैली 6.45 मिलियन हेक्टेयर अरावली में बड़े स्तर पर पौधारोपण चल रहा है. इसके जरिए पांच किलोमीटर चौड़ी हरित पट्टी का निर्माण किया जा रहा है. सरकार ने कहा कि यह पर्यावरण संरक्षण, जैव विविधता को बचाने और रेगिस्तान के बढ़ते प्रभाव को रोकने की दिशा में एक बेहद महत्वाकांक्षी योजना है. इसे लंग्स ऑफ नॉर्थ इंडिया भी कहा जाता है. इसका लक्ष्य 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर क्षतिग्रस्त भूमि का पुनर्स्थापन करना है.
मोदी सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
सरकार के फैसले के खिलाफ हरियाणा के रिटायर्ड वन अधिकारी आरपी बलवान ने 100 मीटर के फॉर्मूले वाले विवाद के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है. उनका कहना है कि जिन पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है, उसकी सुरक्षा खतरे में है. उन्होंने अपनी याचिका में कहा है कि अगर यहां पर माइनिंग को इजाजत दी जाती है, तो इस एरिया में रेगिस्तान फैलेगा, जंगल कम होंगे, पानी की कमी होगी और कुल मिलाकर पर्यावरण को बड़ा नुकसान होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने 1996 में टीएन गोदावरमन थिरुमलपाद बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में वन की परिभाषा तय की थी. इसी में 100 मीटर को लेकर एक पैमाना तय किया गया था. इसमें कोर्ट ने कहा था कि लोकल लेवल से 100 मीटर या उससे अधिक ऊंची पहाड़ियों को ही अरावली माना जाएगा. अपने फैसले में कोर्ट ने यह भी साफ किया था कि पहाड़ी के आसपास की जमीन भी इसके दायरे में ही आएगी. कोर्ट पहले भी गुरुग्राम, फरीदाबाद और नूंह के इलाकों में खनन करने पर पाबंदी लगाई है. ये सभी अरावली के ही क्षेत्र हैं.
विवाद बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने अरावली में माइनिंग पर लगाई रोक
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने बुधवार को कहा कि उसने अरावली रेंज में किसी भी प्रकार के नए खनन पट्टे देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के लिए राज्यों को निर्देश जारी किए हैं. यह प्रतिबंध पूरे अरावली क्षेत्र में समान रूप से लागू होता है और इसका उद्देश्य पर्वत श्रृंखला की अखंडता को संरक्षित करना है. इन निर्देशों का उद्देश्य गुजरात से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) तक फैली एक सतत भूवैज्ञानिक श्रृंखला के रूप में अरावली की रक्षा करना और सभी अनियमित खनन गतिविधियों को रोकना है.
मंत्रालय ने कहा कि उसने भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) को पूरे अरावली क्षेत्र में उन अतिरिक्त क्षेत्रों/क्षेत्रों की पहचान करने का निर्देश दिया है, जहां केंद्र द्वारा पहले से ही खनन के लिए प्रतिबंधित क्षेत्रों के अतिरिक्त खनन निषिद्ध किया जाना चाहिए. यह पहचान पारिस्थितिक, भूवैज्ञानिक और भूदृश्य स्तर के विचारों पर आधारित होनी चाहिए.
मंत्रालय ने कहा, "आईसीएफआरई को पूरे अरावली क्षेत्र के लिए एक व्यापक, विज्ञान-आधारित सतत खनन प्रबंधन योजना (एमपीएसएम) तैयार करते समय यह कार्य करने का निर्देश दिया गया है. यह योजना, जिसे व्यापक हितधारकों के परामर्श के लिए सार्वजनिक डोमेन में रखा जाएगा, संचयी पर्यावरणीय प्रभाव और पारिस्थितिक वहन क्षमता का आकलन करेगी, पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील और संरक्षण-महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान करेगी और बहाली एवं पुनर्वास के उपाय निर्धारित करेगी."
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