Explainer: क्या है बिहार की 700 साल पुरानी 'पंजी प्रथा', जो सदियों से आनुवंशिक बीमारी से बचा रही
क्या है बिहार के मिथिलांचल की 700 साल पुरानी पंजी व्यवस्था, जिसमें धर्म और विज्ञान का अनूठा संगम देखने को मिलता है, विस्तार से पढ़ें

Published : February 12, 2026 at 7:38 PM IST
रिपोर्ट: वरुण ठाकुर
दरभंगा: हिंदू धर्म में एक ही गोत्र या निकट के संबंधों में विवाह वर्जित है. इसे धर्म और विज्ञान दोनों से जोड़कर देखा जाता है. गोत्र का अर्थ एक ही पूर्वज (ऋषि परंपरा) से होना होता है और एक ही गोत्र के लड़का-लड़की भाई-बहन के समान माने जाते हैं. यह नियम आनुवंशिक बीमारियों से बचने, संतान में स्वास्थ्य दोष को रोकने के लिए अनिवार्य माना जाता है. बिहार के मिथिलांचल में आज से 700 साल पहले से ही इस नियम का बहुत ही कड़ाई से पालन होता था और इस प्रथा का नाम है पंजी प्रथा या व्यवस्था.
क्या है पंजी प्रथा?: मिथिलांचल में वंशावली को संरक्षित करने के लिए सालों से चली आ रही पंजीकार व्यवस्था (परंपरा) है. 700 साल पुरानी पंजी व्यवस्था में परिवारों की वंशावली को मैथिली और संस्कृत में लिखा जाता है, जिसमें परिवारों की वंशावली, गोत्र और विवाह संबंधों का लेखा-जोखा होता है. यह सुनिश्चित करता है कि शादी, सगोत्र यानी एक गोत्र में न हो. इस प्रथा में पंजीकार, जिसे इस वंशावली का संरक्षक माना जाता है, सारे रिकॉर्ड सहेज के रखने का काम करते हैं.
डिजिटलीकरण की आवश्यकता: डिजिटल युग के बावजूद, पंजीकार आज भी मिथिला की पहचान और सांस्कृतिक जड़ों को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे हैं. पंजीकार सारे दस्तावेजों को सहेज कर रखते हैं. पहले वंशावली के सारे रिकॉर्ड ताड़ के पत्तों या पुराने कागजों (बसाहा) पर सहेज कर रखे जाते थे, लेकिन समय के साथ इसपर भी खतरा मंडरा रहा है. आधुनिकता के चलते नई पीढ़ी इस प्रथा से दूर हो रही है. ऐसे में पंजी दस्तावेजों के संरक्षण और डिजिटलीकरण की आवश्यकता है.
वंशावली के आधार पर विवाह: मिथिलांचल की पंजी प्रथा वंशावली के आधार पर विवाह तय करने की एक प्राचीन और वैज्ञानिक व्यवस्था है, जो मुख्य रूप से मैथिल ब्राह्मणों और कर्ण कायस्थों के बीच प्रचलित है जो कई दशकों से चली आ रही है. जानकारी के अनुसार इस प्रथा की औपचारिक शुरुआत 1310 ईस्वी (या 1327 ईस्वी) में कर्नाट वंश के राजा हरिसिंह देव ने करवाई थी. उसके बाद से यह प्रथा चलती आ रही है.

देखा जाता है वर-वधू के बीच रक्त संबंध: वहीं इस संबंध में जानकारी देते हुए पंजीकार अरविन्द मलिक ने बताया कि इस प्रथा का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विवाह करने वाले युवक और युवती के बीच रक्त संबंध न हो. यह आनुवंशिक शुद्धता और स्वास्थ्य के लिए किया जाता है. वहीं शादी तय होने से पहले पंजीकार युवक की सात पीढ़ियों और युवती की पांच पीढ़ियों के पूर्वजों का मिलान करते हैं.
"हम लोगों के पास लगभग 700 वर्षों की वंशावली का लिखित रिकॉर्ड उपलब्ध है, जिसे ताड़ के पत्तों या पुराने कागजों पर रखे हुए हैं, लेकिन परिवारों की नई पीढ़ी अब इस पारंपरिक पेशे में रुचि नहीं ले रही है. प्रथा के अनुसार यदि दोनों पक्षों में कोई रक्त संबंध नहीं मिलता, तो पंजीकार एक प्रमाणपत्र देते हैं जिसे 'सिद्धांत' कहा जाता है. इसके बिना विवाह को सामाजिक मान्यता मिलती है."- अरविन्द मलिक, पंजीकार
पंजीकारों की संख्या में आई भारी कमी: वहीं उन्होंने कहा कि युवा पीढ़ी इस कठिन और कम आय वाले काम को छोड़ कर अन्य आधुनिक नौकरियों और व्यवसायों की ओर रुख कर रही है. लेकिन हमारा एक भतीजा है, उसको यह गुण सिखा रहे हैं. आगे भगवान जाने, लेकिन बीते कुछ वर्षों में पंजीकारों की संख्या में भारी कमी आई है.

कर्ण कायस्थ में 360 मूलक: पंजीकार अरविन्द मलिक कहते हैं कि कर्ण कायस्थ में 360 मूल हैं, जिसमें 150 मूल मालौद हो गया और 200 मूल चल रहा है. कर्ण कायस्थ में वर्तमान स्थिति कि बात करें तो हम लोगों में लेन देन नहीं हैं. वैसे मोबाइल कहें या ग्लोबल युग आने के बाद बहुत लोग मेट्रो सिटी में रहने लगे हैं. अभी स्थिति उतनी अच्छी नहीं है. अभी 20% लोग दूसरे जात में शादी कर ले रहें हैं.
क्यों कमजोर हो रही प्रथा?: वहीं पंजीकार ने बताया कि सरकार द्वारा अंतरजातीय विवाहों को प्रोत्साहन और व्यक्तिगत पसंद के विवाहों को कानूनी सुरक्षा मिलने से भी इस पारंपरिक व्यवस्था की प्रासंगिकता कम हुई है. बड़ी संख्या में मैथिल परिवारों का दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और विदेशों में बस जाना इस प्रथा के कमजोर होने का एक प्रमुख कारण है. दूर रहने वाले लोग अक्सर स्थानीय परंपराओं के बजाय अपनी सुविधा के अनुसार विवाह तय करते हैं.
"ये सिद्धांत की परिपाटी है कि सात पीढ़ी लड़के का और पांच पीढ़ी लड़की का देखा जाता है. दोनों में कहीं भी मिलान होता है तो शादी कैंसिल कर दी जाती है. समाज के बीच बैठकर सब तय होता है. नए जेनेरेशन में कोई बदलाव नहीं हुआ है. नए पंजीकार पूरा रिकॉर्ड संभालते हैं. उनके पास रजिस्टर होता है."- काम्खया कुमार कर्ण, स्थानीय
संबंध में नहीं होती है शादी: पंजीकार बताते हैं कि पंजी प्रथा का मूल उद्देश्य यह है कि संबंध में शादी ना हो. संबंध में शादी होने से बहुत तरह का खून संबंधित बीमारी होती है. पंजी प्रथा के तहत मिथिलांचल में बहुत तरह की बातों को जांचा जाता है. इसलिये हमलोग सात पुस्त तक देखते हैं, जिसमें कोई संबंध नहीं रहेगा तभी शादी मुमकिन हैं.

कोर्ट से मान्यता: पंजीकारों के अनुसार इसको कानूनी मान्यता भी मिलती है. हमलोग सनातन धर्म को मानने वाले लोग हैं तो सनातनी लोग मातृ पक्ष और पितृ पक्ष दोनों देखते हैं. मातृ पक्ष से छह और पितृ पक्ष से सात देखते हैं, लेकिन भारत सरकार का जो हिंदू कानून कहता हैं वो तो दूसरा है, लेकिन कोर्ट ने भी इस पंजी को मान्यता दी हुई है.
वहीं स्थानीय पवन कुमार चौधरी ने बताया कि 700 वर्ष पुरानी पंजी व्यवस्था है. लड़का और लड़की का सात पुस्त ऊपर और सात पुस्त नीचे देखा जाता है. किसी का पहले से कोई संबंध रहा तो शादी नहीं होती है. मेरे घर के कई लोगों की शादी इसी व्यवस्था से की गई है.

"यह सब व्यवस्था पंजीकार के पास उपलब्ध होता है, हमलोग वहीं जाकर उनसे जानकारी लेते हैं. फिर वो अधिकार बताते हैं. हमारे परिवार में तीन चार माह पूर्व भी शादी हुई हैं. इसी व्यवस्था के साथ शादी संपन्न हुई हैं, लेकिन कठिनाई अब विभिन्न तरह के आने लगे हैं."- पवन कुमार चौधरी, स्थानीय
इस प्रथा का प्रमुख केंद्र मधुबनी का सौराठ गांव: पंजीकारों के पास लगभग 700 वर्षों के हस्तलिखित रिकॉर्ड उपलब्ध हैं, जो अब प्राकृतिक रूप से नष्ट होने के खतरे में हैं. इस पेशे में आय का कोई निश्चित स्रोत न होना भी पंजीकारों को अन्य पेशों की ओर धकेल रहा है. वैसे अभी भी मधुबनी जिले का सौराठ गांव इस प्रथा का प्रमुख केंद्र है, जहां हर साल वैवाहिक सभा लगती है और पंजीकार वंशावली का मिलान करते हैं.

"यह हमारी बहुत प्राचीन परंपरा है. समलैंगिक शादी न हो इसका उद्देश्य है. मिथिला की प्राचीन परंपरा आने वाली पीढ़ी को बेहतर करने वाली परंपरा है."- अनिल कुमार, स्थानीय
विलुप्त होने की कगार पर प्रथा: मिथिलांचल में शादी विवाह में उपयोग होने वाली ऐतिहासिक पंजी प्रथा वर्तमान में अस्तित्व के संकट से जूझ रही है. सदियों पुरानी यह वंशावली परंपरा, जो कभी मिथिला के सामाजिक और वैवाहिक ढांचे का आधार थी, अब आधुनिकता, युवाओं की घटती रुचि और पंजीकारों की कमी के कारण विलुप्त होने की कगार पर है.
कौन होते हैं पंजीकार?: मिथिलांचल की पंजी प्रथा में पंजीकार वह विद्वान और विशेषज्ञ होते हैं जो सदियों से मैथिल ब्रह्माण और कर्ण कायस्थों की वंशावलियों का लिखित रिकॉर्ड रखते हैं. इन्हें एक तरह से पांरपरिक रजिस्ट्रार भी कहा जा सकता है. यह परिवारों के वंशवृक्ष, गोत्र और मूल ग्राम की जानकारी ताड़ के पत्तों या पुरानी कागजों में सुरक्षित रखते थे. वंशावली के मिलान के बाद पंजीकार सिद्धांत यानि की विवाह की अनुमति देते हैं. इसके लिए अस्वजन प्रमाण पत्र जारी करते हैं.

पंजी व्यवस्था की वर्तमान स्थिति: वर्तमान में इस वंशावली प्रथा में पलायन बड़ा खतरा बना हुआ है. मैथिल ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ रोजगार के लिए बड़े शहरों और विदेशों का रुख कर रहे हैं. ऐसे में प्रवासियों के लिए पारंपरिक पंजी मिलान की प्रक्रिया में शामिल होना मुश्किल होता है. साथ ही आज के दौर में मैट्रिमोनी साइट्स ने इस प्रथा को पीछे छोड़ दिया है. नई पीढ़ी जीवन साथी चुनने के लिए शादी.कॉम या फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल ज्यादा करती है. मूल गोत्र की जगह व्यक्तिगत गुणों को प्राथमिकता दी जाती है.
पंजी प्रथा का वैज्ञानिक महत्व: एक गोत्र या नजदीकी रक्त संबंध में शादी न करने का मुख्य वैज्ञानिक कारण इनब्रीडिंग होता है. इससे आनुवंशिक विकार, शारीरिक/मानसिक विकलांगता और कमजोर प्रतिरक्षा प्रणाली वाली संतान जन्म लेने का खतरा काफी बढ़ जाता है. आनुवंशिक दोष का खतरा भी यह प्रथा कम करती है. एक ही पूर्वज के दो लोगों में समान हानिकारण अवगुए या दोषपूर्ण जीन होने की प्रबल संभावना होती है. अलग-अलग गोत्रों में शादी करने से संतानों में नए जीन का मिश्रण होता है, जिससे बच्चे अधिक स्वस्थ, बुद्धिमान और प्रतिरोधी होते हैं.

कैसे तय होती है पंजी प्रथा के तहत शादी : पंजी प्रथा के तहत शादी की मान्यता को 'सिद्धांत' कहा जाता है. सिद्धांत के तहत वर-वधू के लोग सौराठ सभा गाछी, किसी धार्मिक स्थान या पंजीकार के आवास पर इकट्ठा होते हैं. दोनों पक्षों के बीच पान-सुपारी, मसाला आदि रखा जाता है. पंजीकार लाल कलम से ताल के पत्र पर वर-वधू पक्ष का मूल और वंशावली लिखते हैं.
दोनों पक्षों के पुस्तों के मिलान के बाद दूसरे तालपत्र पर वर-वधू के विवाह की सहमति लिखी जाती है. इसके बाद पंजीकार मंगलाचरण मंत्र पढ़ते हुए विवाह के अधिकार की स्वीकृति देते हैं. विवाह का सिद्धांत पत्र लड़की के पिता को दिया जाता है. वंशावली वाला तालपत्र रिकॉर्ड के तौर पर पंजीकार अपने पास रख लेते हैं.
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