पाकिस्तान में खूब बिकती है बिहार की 220 वाली 'खीरमोहन' मिठाई, जानें खासियत
बिहार की खीरमोहन मिठाई देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी काफी प्रसिद्ध है. सऊदी, कतर, पाकिस्तान और श्रीलंका तक से ऑर्डर मिलते हैं.

Published : December 31, 2025 at 7:09 PM IST
रिपोर्ट: महमूद आलम
नालंदा: सिलाव का खाजा और हरनौत की बालूशाही के बाद अब नालंदा के देशना और डुमरांव गांव की 'खीर मोहन' मिठाई अपनी अलग पहचान बना रही है. गांव के हलवाई परिवार की चौथी पीढ़ी इस विरासत को संजोए हुए हैं.
'खीरमोहन' मिठाई, में खीर नहीं: खीरमोहन मिठाई की खासियत इसका नाम है, क्योंकि इसमें खीर नहीं होती है. खीर मोहन मिठाई देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है. कोलकाता, मुंबई, दिल्ली, बंगलौर के अलावा विदेशों से भी ऑर्डर आथे हैं.
पाकिस्तान तक पहुंचा खीरमोहन: सऊदी, कतर, पाकिस्तान, श्रीलंका जैसे देशों में भी खीरमोहन का स्वाद पहुंच चुका है. डुमरांव में आज भी पारंपरिक तरीके से बन रही इस मिठाई का स्वाद चखने के लिए दूर-दूर से लोग ऑर्डर देकर बनवा कर मंगवाते हैं.
चौथी पीढ़ी बना रही मिठाई: डुमरांव निवासी 55 वर्षीय मुन्ना प्रसाद (स्व. दयानंद प्रसाद के पुत्र) ने ईटीवी से बात कर बताते हैं, कि वे अपने परिवार की चौथी पीढ़ी हैं, जो इस व्यवसाय से जुड़े हैं. उन्होंने यह हुनर अपने पूर्वजों से सीखा है.

"इस गांव में एक ही परिवार की करीब 5 दुकानें हैं, जो इसी व्यवसाय से जुड़े हैं. यह मिठाई बारहों मास बनती है और इसकी मांग कभी कम नहीं होती है."- मुन्ना प्रसाद, मिठाई दुकान के मालिक
शुद्धता है खासियत: इस मिठाई की खासियत इसकी शुद्धता और बनाने का तरीका है. दुकानदार कुंदन प्रसाद गुप्ता बताते हैं कि इसे बनाने में कम से कम एक घंटा लगता है.

"दो घंटे तक सबसे पहले दूध को खौलाया जाता है. फिर इसे एक घंटे तक धीमी आंच पर ठंडा करने के बाद फाड़ा जाता है. छेना बनाया जाता है. इसके बाद इसे चीनी के घोल (सीरा) में पकाया जाता है."- कुंदन प्रसाद गुप्ता, दुकानदार

खीरमोहन की कीमत: बाजार में इस मिठाई की कीमत 10 रुपए प्रति पीस या 220 रुपए प्रति किलो है. दुकानदार बताते हैं कि सामान्य दिनों में प्रतिदिन 4 से 5 किलो या 5 से 8 किलो मिठाई बिक जाती है, जबकि लगन और त्योहारों में ऑर्डर पर भारी मात्रा में मिठाई तैयार की जाती है. लागत काटकर कारीगरों को प्रति किलो लगभग 25 से 50 रुपए की बचत प्रतिकिलो फायदा होता है.

स्थानीय ग्राहक पिंकू राउत बताते हैं, कि खीर मोहन का स्वाद बाकी मिठाइयों से बिल्कुल अलग और लजीज है. इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह सुपाच्य है. अगर कोई 10 पीस भी खा ले, तो उसका पेट खराब नहीं हो सकता है. यही कारण है कि देश-विदेश से आने वाले लोग या महानगरों में रहने वाले स्थानीय निवासी जाते वक्त इसे साथ ले जाना नहीं भूलते हैं.

"हम अपने पूर्वजों की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. ऑर्डर मिलने पर हम 10 से 20 किलो तक मिठाई तैयार करके देते हैं. दिल्ली, कोलकाता से लेकर देश के कोने-कोने तक हमारे गांव की मिठाई जाती है. ठंडी के मौसम में एक सप्ताह तक यह मिठाई डब्बा में पैक होने के बाद भी खराब नहीं होता है और गर्मी में दो से तीन दिन तक ठीक रहता है."- पिंकू राउत,स्थानीय ग्राहक

सबसे पहले किसने बनायी थी खीरमोहन: देशना गांव के जानकार मुर्शिद देशनवी बताते हैं कि अंग्रेजी शासनकाल में यह गांव जमींदारों का हुआ करता था और यहां सभी जाति समुदाय के लोग मिलकर एक साथ रहते थे. गांव के मोहन नामक एक हलवाई ने गाय-भैंस का दूध खाने-पीने के बाद जब बचता था, तो उसका कुछ नया करने की सोच में मिठाई बनाया.

"मिठायी, गांव के लोगों को खिलाया गया तो उन्हें पसंद आया और उसके बाद से इसकी बिक्री शुरू हुई.आज तक यह "खीर मोहन" मिठाई बिक रही है. जो भी लोग प्रदेश जाने आने लगे, डिमांड करने लगे. भी जिले व सूबे के अलग-अलग हिस्सों में बनता है."- मुर्शिद देशनवी,जानकार

देशना गांव में बिहार की सबसे पुरानी उर्दू लाइब्रेरी भी है, जिसका नाम अल-इस्लाह लाइब्रेरी के नाम से पहचाना जाता है. यह लाइब्रेरी आज खंडहर की शक्ल में तब्दील हो चुकी है. कुछ महत्वपूर्ण किताबें पटना के ख़ुदा बख़्श लाइब्रेरी में रखी है. कुछ यहीं बर्बाद हो रही है. इस गांव में देश के नामचीन शख्सियत पहुंचे हैं. सैय्यद सुलेमान नदवी जैसे महान स्कॉलर का यह गांव है.
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