शादियों का बचा खाना फेंकने के बजाय लोग इन्हें करते हैं याद, एक साल में मिटाई 57 हजार लोगों की भूख
केरल के कन्नूर निवासी मुहम्मद रियास मानवता की एक अनूठी मिसाल बन गए हैं, जो गरीबों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.


Published : January 7, 2026 at 5:38 PM IST
कन्नूर(केरल): एक ऐसे समाज में जहां भव्य समारोहों का बचा हुआ खाना अक्सर फेंक दिया जाता है या मिट्टी में दबा दिया जाता है, वहां एक युवक इस मिशन में जुटा है कि कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए. कन्नूर के पिलाथरा निवासी 35 वर्षीय मुहम्मद रियास मानवता की एक अनूठी मिसाल बन गए हैं, जो अनाथों और बेघर लोगों की मदद के लिए हमेशा तैयार रहते हैं.
पिता से मिली सीख
रियास की दयालुता की जड़ें उनके पिता, मुहम्मद कुन्ही द्वारा पेश किए गए उदाहरणों में छिपी हैं. उनका परिवार कोई अमीर परिवार नहीं था, लेकिन उनके पिता ने उन्हें भोजन की कीमत और भूख का दर्द सिखाया. बचपन में रियास ने देखा था कि उनके पिता पारिवारिक समारोहों के बचे हुए खाने को जरूरतमंदों में बांटते थे.
रियास की यह सेवा 2007 में शुरू हुई थी, जब वे स्कूल के छात्र थे. वे अलग-अलग जगहों से आने वाले शिक्षकों के लिए खाना पहुंचाया करते थे. अपनी जरूरत का भोजन लेने के बाद, वे बचा हुआ खाना रियास को लौटा देते थे. रियास अपनी जरूरत का हिस्सा रखकर बाकी बचा हुआ खाना सड़क पर रहने वाले लोगों में बांट देते थे. इस तरह, एक छात्र के रूप में उन्होंने भोजन वितरण का जो काम शुरू किया था, उसे रियास आज 35 वर्ष की आयु में भी जारी रखे हुए हैं.

भूख के खिलाफ जंग
रियास अपने इस अकेले संघर्ष को 'सहायी पिलाथरा' कहते हैं. चाहे आपके पास देने के लिए भोजन हो या आपको खुद इसकी जरूरत हो, आप 'सहायी' को कॉल कर सकते हैं. अब कई लोग दावतों के बचे हुए खाने को फेंकने या जमीन में दबाने के बजाय रियास का नंबर घुमाना याद रखते हैं. वह तुरंत मौके पर पहुंचते हैं, खाना इकट्ठा करते हैं और उसे अनाथालयों, यतीमखानों, वृद्धाश्रमों, बाल गृहों और सड़कों पर रहने वाले लोगों तक पहुंचाते हैं.
उनकी सेवा के आंकड़े हैरान करने वाले हैं. 1 जनवरी से 31 दिसंबर 2025 के बीच, रियास ने अकेले ही 57,229 लोगों को भोजन वितरित किया. इसमें 28,734 बिरयानी और 28,495 सामान्य भोजन के पैकेट शामिल थे. इस साल 2026 के शुरुआती दिनों में ही वे 300 लोगों को भोजन परोस चुके हैं.
शादी समारोहों में मददगार हाथ
शादियों और उत्सवों में रियास एक जाना-पहचाना चेहरा हैं. जहां वे किसी भी तरह का काम करने के लिए तैयार रहते हैं. हालांकि यह उनकी आय का मुख्य स्रोत है, लेकिन वे कभी भी किसी निश्चित मजदूरी की मांग नहीं करते. जैसे ही मेहमान विदा होते हैं, वे बचे हुए खाने को करीने से पैक करते हैं और अपने एक दोस्त के दुपहिया वाहन या ऑटो-रिक्शा के जरिए उसे जरूरतमंदों तक पहुंचाते हैं.
अब दूर-दराज के लोग भी उनकी मदद मांगते हैं. वे खाना बर्बाद होने की आयोजकों की चिंता को भूखों को खाना खिलाने की खुशी में बदल देते हैं. इतना ही नहीं, वे शादियों के पुराने कपड़े (परिधान) इकट्ठा करने और उन्हें वंचित लोगों के बीच वितरित करने की पहल भी करते हैं.
आधी रात को भी मदद के लिए तैयार
पिछले 10 वर्षों से रियास पिलाथरा की 'होप' (Hope) चैरिटेबल सोसाइटी के एक अभिन्न अंग रहे हैं. होप की जनरल सेक्रेटरी जैकलीन बिन्ना स्टेनली उन्हें एक ऐसे भाई के रूप में बताती हैं, जो समय देखे बिना महज एक फोन कॉल पर हाजिर हो जाता है.
रियास अक्सर बेसहारा लोगों के लिए इकलौते परिजन की भूमिका में नजर आते हैं. वह अंतिम संस्कार के कामों में मदद करते हैं, मृतकों को स्नान कराते हैं और यहाँ तक कि अस्थि विसर्जन की रस्म भी निभाते हैं. चाहे बिस्तर पर पड़े बीमारों की सेवा करनी हो या किसी की अचानक मौत होने पर मौके पर पहुंचना, रियास हर स्थिति में वहां मौजूद रहते हैं.

चुनौतियों के बीच अडिग
रियास की यह राह बाधाओं से मुक्त नहीं है. वे थोड़े दुख के साथ बताते हैं कि कई लोग खाना इकट्ठा करने और उसे पहुंचाने में लगने वाली शारीरिक मेहनत और ईंधन के खर्च को नहीं समझते. कुछ लोग अपनी जिम्मेदारी से बचने के लिए उन्हें सिर्फ "खाना ठिकाने लगाने" के लिए बुलाते हैं, बिना उनके संघर्ष और प्रयास पर विचार किए. इसके बावजूद, अपनी पत्नी बदरुन्निसा के सहयोग से, रियास अपने घर 'कुलंगारा पुरायिल' से अपना यह मिशन जारी रखे हुए हैं.
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