एक युग का अंत: पिनाराई विजयन के 10 साल के शासन का अंत, UDF की प्रचंड लहर में ढहा LDF का गढ़
अंदरूनी कलह के बावजूद, सीपीएम को सत्ता में बने रहने का भरोसा था. हालांकि, मतगणना के शुरुआती रुझानों ने तस्वीर बदल दी.


Published : May 4, 2026 at 4:10 PM IST
तिरुवनंतपुरमः केरल में एलडीएफ (LDF) का लगातार तीसरी बार सरकार बनाने का सपना टूट गया है, क्योंकि यूडीएफ (UDF) की लहर के सामने उसके मजबूत गढ़ ढह गए हैं. देश की इकलौती कम्युनिस्ट सरकार अब गिरती नजर आ रही है. इसके साथ ही, पिनाराई विजयन का एक दशक लंबा दौर अब समाप्ति की ओर है.
एलडीएफ के बार-बार इस दावे के बावजूद कि सरकार के खिलाफ कोई नाराजगी (anti-incumbency) नहीं है, चुनाव नतीजों ने कुछ और ही कहानी बयां की है. अंदरूनी कलह के बावजूद, सीपीएम (CPM) को सत्ता में बने रहने का भरोसा था. हालांकि, मतगणना के शुरुआती रुझानों ने तस्वीर बदल दी.

कमजोर होता गढ़
यूडीएफ की निर्णायक जीत केरल की राजनीति में एक बड़ा मोड़ है, जिसने प्रभावी रूप से पिनाराई विजयन के दबदबे वाले युग का अंत कर दिया है. पिछले लगभग एक दशक से, वे सरकार और सीपीएम दोनों का निर्विवाद चेहरा थे. पूरे राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान उनकी छवि छाई रहती थी. यह हार, पार्टी के भीतर उनके प्रभाव को काफी कमजोर कर सकती है.
पिनाराई विजयन अक्सर अपनी विवादास्पद टिप्पणियों के कारण चर्चा में रहे. उनके उन बयानों की व्यापक आलोचना हुई जिन्हें रूखा या दूसरों को नीचा दिखाने वाला माना गया, जिससे उनकी छवि एक 'तानाशाह' नेता की बनती गई. भले ही उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान पार्टी के भीतर के विरोध को काफी हद तक दबाए रखा, लेकिन अब जनता का मिजाज बदला हुआ नजर आ रहा है.
विपक्ष का नेतृत्व कौन करेगा?
अब इस सवाल पर अनिश्चितता बनी हुई है कि विपक्ष का नेता कौन होगा. यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि पिनाराई विजयन स्वयं यह भूमिका निभाएंगे या नहीं. यदि वे इससे बाहर रहने का विकल्प चुनते हैं, तो सीपीएम (CPM) के वरिष्ठ नेता के.एन. बालगाोपाल को एक मजबूत दावेदार माना जा रहा है. मंत्री पी.ए. मोहम्मद रियास भी एक संभावित विकल्प के रूप में उभरे हैं, विशेष रूप से तब जब युवा नेतृत्व को प्राथमिकता दी जाती है. यह निर्णय काफी हद तक पार्टी के आंतरिक समीकरणों और उभरते हुए गुटों के प्रभाव पर निर्भर करेगा.

विजयन की राजनीतिक यात्रा
पिनाराई विजयन, जो 1964 में सीपीएम (CPM) के गठन के समय ही इसमें शामिल हो गए थे. 1970 में महज 26 साल की उम्र में कूथुपारंबा से केरल विधानसभा पहुंचे. 1990 के दशक में, उन्हें दिग्गज नेता वी.एस. अच्युतानंदन का करीबी सहयोगी माना जाता था, जबकि पार्टी में दूसरा शक्तिशाली गुट ई.एम.एस. नंबूदरीपाद और ई.के. नयनार जैसे नेताओं के नेतृत्व में था.
जैसे-जैसे पार्टी में पीढ़ीगत बदलाव की मांग बढ़ी, आंतरिक सत्ता संघर्ष और तेज हो गया. 1998 में चदयन गोविंदन के निधन के बाद, अच्युतानंदन ने पिनाराई विजयन को प्रदेश सचिव बनाए जाने का समर्थन किया था. इसके बावजूद, जल्द ही दोनों नेताओं के बीच तनाव पैदा हो गया, जिसने आगे चलकर एक लंबी और सार्वजनिक प्रतिद्वंद्विता का रूप ले लिया.
जहां अच्युतानंदन ने जमीनी आंदोलनों के जरिए जनता के बीच एक मज़बूत छवि बनाई, वहीं पिनाराई ने पार्टी के भीतर संगठनात्मक नियंत्रण को मज़बूत किया. 'लवलिन मामले' जैसे विवादों के दौरान उनके मतभेद चरम पर पहुंच गए और दोनों नेताओं ने खुलकर एक-दूसरे को चुनौती दी.
समय के साथ, पार्टी के फैसले तेज़ी से पिनाराई के नेतृत्व के पक्ष में होते गए. 2000 के दशक के अंत तक, उन्होंने सीपीएम (CPM) पर अपनी पकड़ मज़बूत कर ली थी, जबकि उस दौरान (2006 से 2011 तक) अच्युतानंदन मुख्यमंत्री के रूप में कार्यरत थे.
2016 के चुनावों से पहले, पिनाराई ने पार्टी सचिव का पद छोड़ दिया और सरकार में नेतृत्व की भूमिका के लिए खुद को तैयार किया. जब उस साल एलडीएफ (LDF) सत्ता में लौटी, तो उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला, जो उनके एक दशक लंबे कार्यकाल की शुरुआत थी. धीरे-धीरे विपक्षी गुट कमज़ोर पड़ते गए और पिनाराई केरल के राजनीतिक परिदृश्य में सबसे प्रमुख चेहरा बनकर उभरे.
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