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लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे के 'सरनेम' पर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, क्या है मामला?

अधिकारियों ने बिना कोई वजह बताए बर्थ सर्टिफिकेट में याचिकाकर्ता की बेटी का सरनेम बदलने की उसकी रिक्वेस्ट को खारिज कर दिया था.

Karnataka High Court
कर्नाटक हाई कोर्ट. (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 27, 2026 at 5:19 PM IST

5 Min Read
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बेंगलुरु: कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि बच्चे के उपनाम (surname) में मां का नाम जोड़ने से पिता के अधिकार खत्म नहीं होते हैं. अदालत ने स्पष्ट किया कि बच्चे के उपनाम में मां के वंश को पहचान देना संवैधानिक रूप से मान्य है और इससे पिता की कानूनी स्थिति कम नहीं होती.

यह आदेश जस्टिस सूरज गोविंदराज की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक मां की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया. याचिका में जन्म और मृत्यु पंजीकरण विभाग के अधिकारियों की उस कार्रवाई को चुनौती दी गई थी, जिसमें उन्होंने बिना कोई कारण बताए जन्म प्रमाण पत्र में आठ साल की बेटी का उपनाम बदलने के अनुरोध को खारिज कर दिया था.

यह मामला लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए एक बच्चे से जुड़ा था. अदालत ने विभाग को निर्देश दिया कि बच्चे के उपनाम में पिता के बजाय मां के परिवार का नाम शामिल कर उसे संशोधित किया जाए. साथ ही, पीठ ने स्पष्ट किया कि जन्म प्रमाण पत्र में जैविक पिता का नाम पहले की तरह बना रह सकता है.

मां की पहचान को मान्यता दी जा सकती है

अदालत ने यह टिप्पणी की कि यदि मां बच्चे की एकमात्र देखभाल करने वाली और स्वाभाविक अभिभावक है, तो बच्चे के उपनाम के रूप में उसके वंश को मान्यता देने में कोई संवैधानिक बाधा नहीं है. कोर्ट ने कहा कि उपनाम में मां की पहचान शामिल करने से पिता का दर्जा कम नहीं होता. इसके विपरीत, यह समानता के सिद्धांत को दर्शाता है.

पीठ ने आगे यह भी नोट किया कि यह विचार कि बच्चों को अनिवार्य रूप से पिता का ही उपनाम धारण करना चाहिए, कोई संवैधानिक आदेश नहीं है. यह एक सामाजिक परंपरा हो सकती है, लेकिन यह उस संवैधानिक सिद्धांत से ऊपर नहीं है जिसमें माता-पिता की पहचान से जुड़े मामलों में स्त्री और पुरुष को समान दर्जा दिया गया है.

रिकॉर्ड सुधारने का रजिस्ट्रार का अधिकार

जन्म और मृत्यु पंजीकरण विभाग के इस तर्क को खारिज करते हुए कि उसके पास जन्म प्रमाण पत्र में उपनाम बदलने का अधिकार नहीं है, अदालत ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 का हवाला दिया. इस अधिनियम के तहत, रजिस्ट्रार के पास गलतियों को सुधारने और नाम से संबंधित मामलों सहित प्रविष्टियों में आवश्यक बदलाव करने की शक्ति है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि यह अधिकार न केवल लिपिकीय गलतियों तक सीमित है, बल्कि रिकॉर्ड के मुख्य विवरणों में सुधार तक भी फैला हुआ है. पीठ ने यह भी रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता (मां) ने जन्म प्रमाण पत्र से पिता का नाम हटाने की मांग नहीं की थी. उन्होंने केवल यह अनुरोध किया था कि बच्चे के उपनाम को बदलकर उसमें मां के परिवार का नाम जोड़ा जाए, जबकि संबंधित कॉलम में जैविक पिता का नाम पहले की तरह बना रहे.

बच्चे का सर्वोत्तम हित

अपना फैसला सुनाते समय, अदालत ने संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (UNCRC) के अनुच्छेद 3 और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया, जो बच्चे के सर्वोत्तम हित के सिद्धांत पर जोर देते हैं. पीठ ने टिप्पणी की कि वर्तमान मामले में उपनाम बदलने से बच्चे की पहचान, गरिमा और समग्र कल्याण की रक्षा होगी.

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि उपनाम बदलने से बच्चा उन अधिकारों से वंचित नहीं होगा जो उसे मौजूदा कानूनों के तहत अपने जैविक पिता से प्राप्त हो सकते हैं. इसमें विरासत, उत्तराधिकार और भरण-पोषण से संबंधित अधिकार शामिल हैं. अदालत ने विशेष रूप से कहा कि इस तरह के बदलाव से पिता के खिलाफ बच्चे का कोई भी कानूनी अधिकार खत्म नहीं होता है.

मामले की पृष्ठभूमि

हाई कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, महिला एक नेपाली व्यक्ति के साथ लिव-इन रिलेशनशिप में थी. इस रिश्ते के चलते फरवरी 2017 में बेंगलुरु के केसी जनरल अस्पताल में एक बच्ची का जन्म हुआ. बच्ची के जन्म के बाद, कथित तौर पर पिता ने महिला और बच्ची दोनों से दूरी बना ली. तब से बच्ची का पालन-पोषण मां द्वारा अपने मायके के परिवार के सहयोग से किया जा रहा है.

इन परिस्थितियों को देखते हुए, मां ने जन्म और मृत्यु पंजीकरण विभाग से जन्म प्रमाण पत्र में दर्ज उपनाम बदलने का अनुरोध किया. अधिकारियों ने बिना कोई कारण बताए उनके आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ उन्होंने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया.

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