कर्नाटक में प्रशासन ने दलितों के लिए खोला सैलून, आखिर क्यों उठाना पड़ा यह कदम?
गांव के लोग इस सकारात्मक बदलाव से बेहद खुश हैं. उम्मीद जताई कि छुआछूत की यह प्रथा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी.


Published : March 1, 2026 at 3:03 PM IST
बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार ने गदग जिले के सिंगाटलुर गांव में एक सरकारी सैलून खोला है. यह कदम तब उठाया गया जब गांव की स्थानीय नाई की दुकान ने दलित समुदाय के लोगों का बाल काटने से इनकार कर दिया था. माना जा रहा है कि यह राज्य की पहली ऐसी सरकारी सुविधा है जिसे सरकार द्वारा वित्तपोषित किया गया है.
इस सैलून को बस स्टैंड के पास सरकारी जमीन पर समाज कल्याण विभाग और ग्राम पंचायत के अधिकारियों की मौजूदगी में स्थापित किया गया है. समाज कल्याण विभाग ने टीन शेड वाली दुकान और सैलून के लिए जरूरी सभी उपकरण उपलब्ध कराए हैं, वहीं नाई को मुंदरागी कस्बे से बुलाया गया है.
सरकार को यह सैलून खोलने के लिए इसलिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि गांव के 'हडपद' परिवारों (नाई समुदाय) ने एक धार्मिक परंपरा का हवाला देते हुए वर्षों से दलितों के बाल काटने से इनकार कर दिया था. अधिकारियों के अनुसार, "ये परिवार गांव के देवता वीरभद्रेश्वर के उपासक हैं. हर साल एक विशेष समय पर देवता उनके घर आते हैं, और नाइयों का दावा था कि उस अवधि के दौरान वे दलितों को सेवा नहीं दे सकते."
गांव की इकलौती नाई की दुकान हाल ही में तब बंद हो गई जब दलित युवाओं ने सैलून में सेवा पाने के अपने अधिकार पर जोर देना शुरू कर दिया. उन्होंने जिला प्रशासन के सामने यह तर्क दिया कि किसी खास समुदाय के लोगों को सेवा देने से मना करना पूरी तरह गैरकानूनी है.
जैसे-जैसे मामला बढ़ा, जिला प्रशासन ने ग्रामीणों से संपर्क किया और नाइयों को दुकान खोलने और सभी समुदायों को सेवा देने के लिए मनाने हेतु कई दौर की बैठकें कीं. जब वे नहीं माने, तो कानूनी कार्रवाई की चेतावनी देते हुए नोटिस जारी किए गए. लेकिन नोटिस का भी उन पर कोई असर नहीं हुआ.
कोई विकल्प न बचता देख, अधिकारियों ने समाज कल्याण विभाग से 1.2 लाख रुपये खर्च करके एक नाई की दुकान खोलने और बाहर से एक नाई नियुक्त करने का निर्णय लिया. प्रशासन के अनुरोध पर, 'हडपद अन्नप्पा समाज' के प्रदेश अध्यक्ष देवु हडपद ने अपने भाई (जो स्वयं एक नाई हैं) को दुकान चलाने के लिए भेजने पर सहमति व्यक्त की, जिसके बाद दुकान स्थापित की गई.
देवु हडपद ने कहा, "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि समाज में पिछड़े समुदायों को नीचा दिखाने वाली ऐसी बीमार मानसिकता आज भी मौजूद है. लेकिन हमने ऐसी प्रथाओं को खत्म करने के लिए सरकार को पूरा सहयोग दिया है. अब यह दुकान सभी समुदायों के लिए खुली है."
मुंदरागी तालुक पंचायत के कार्यकारी अधिकारी, विश्वनाथ होसमनी ने बताया कि नाई की सेवाओं से जुड़ा यह विवाद गांव में पिछले दो वर्षों से चल रहा था. उन्होंने आगे कहा, "अब सभी संबंधित विभागों के समन्वित प्रयासों से हम इसका एक शांतिपूर्ण समाधान निकालने में सफल रहे हैं."
गांव के लोग भी इस सकारात्मक बदलाव से बेहद खुश हैं. ग्रामीण मरियाज्जा ने कहा, "इस पहल ने हमारे भीतर एक नई उम्मीद जगाई है कि अब छुआछूत की यह प्रथा हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी."
इसे भी पढ़ेंः

