केरल के मलयालम बिल का विरोध करने के लिए सब कुछ करेंगे: कर्नाटक CM सिद्धारमैया
सीएम सिद्धारमैया ने अपने एक बयान में कहा है कि प्रस्तावित मलयालम भाषा बिल कासरगोड की भाषाई आजादी और असलियत पर चोट करता है.

Published : January 9, 2026 at 3:05 PM IST
बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार ने शुक्रवार को केरल सरकार के उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई जिसमें केरल के कन्नड़ स्कूलों में मलयालम को पहली भाषा के तौर पर पढ़ाना जरूरी कर दिया गया है. इसको लेकर कर्नाटक ने पड़ोसी राज्य सरकार से अपना जबरदस्ती वाला तरीका वापस लेने को कहा है.
बता दें कि केरल विधानसभा ने अक्टूबर में मलयालम भाषा बिल 2025 पास किया, जिससे कन्नड़ मीडियम स्कूलों में मलयालम को पहली भाषा बनाना जरूरी हो गया. बिल को अब सरकार की मंजूरी का इंतजार है. कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले से सटे बॉर्डर जिले कासरगोड में लगभग 202 कन्नड़ मीडियम स्कूल हैं.
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक्स प्लेटफॉर्म पर कहा, "कन्नड़ मीडियम स्कूलों में भी मलयालम को पहली भाषा के तौर पर जरूरी बनाने वाला प्रपोज़्ड बिल, भाषा की आजादी और केरल के बॉर्डर वाले जिलों, खासकर कासरगोड की असलियत पर चोट करता है."
मलयालम को प्रमोट करने के केरल के अधिकार को मानते हुए, सिद्धारमैया ने कहा कि इस तरह का प्रमोशन थोपा हुआ नहीं होना चाहिए. इसलिए, मैं केरल सरकार से आग्रह करता हूं कि वह इस दबाव वाले तरीके को वापस ले और भारत की संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखे.
सिद्धारमैया ने कहा, "अगर यह बिल एक्ट बन जाता है, तो कर्नाटक हमारे संविधान से मिले सभी अधिकारों का इस्तेमाल करके इसका विरोध करने के लिए सब कुछ करेगा." उन्होंने कासरगोड में रहने वाले हर कन्नड़ के साथ खड़े होने का भरोसा दिलाया.
इसके अलावा उन्होंने कहा कि संविधान के अनुसार, कोई भी सरकार भाषाई अल्पसंख्यकों के अधिकारों को कुचल नहीं सकती. आर्टिकल 29 और 30 भाषा को बचाने और अपनी पसंद के एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन को चलाने के अधिकार की रक्षा करते हैं; आर्टिकल 350ए प्राइमरी स्तर पर मातृभाषा में पढ़ाई की सुविधा देने की जिम्मेदारी तय करता है और आर्टिकल 350बी भाषाई अल्पसंख्यक सुरक्षा उपायों की निगरानी का आदेश देता है.
उन्होंने कहा, "भाषा पॉलिसी में जबरदस्ती इन सुरक्षाओं की भावना और शब्द दोनों के खिलाफ है." इसके अलावा उन्होंने कहा कि भाषाई अल्पसंख्यकों के बच्चों के लिए भाषा सिर्फ एक विषय नहीं है, यह पहचान, सम्मान, पहुंच और अवसर है.
उन्होंने कहा, "जब सरकार सिर्फ एक ही पहली भाषा चुनने के लिए मजबूर करती है, तो इससे उन स्टूडेंट्स पर बोझ पड़ता है जो अपनी मातृभाषा में पढ़ते हैं, पढ़ाई में तरक्की और आत्मविश्वास में रुकावट आती है, दूसरी भाषा चुनने की आजादी कम होती है, और अल्पसंख्यक द्वारा चलाए जा रहे इंस्टीट्यूशन और अल्पसंख्यक-माध्यम शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र कमजोर होते हैं."
कासरगोड के सीमावर्ती क्षेत्र में पीढ़ियों से कन्नड़ माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई की है और दैनिक जीवन तथा शिक्षा में कन्नड़ पर निर्भर रहे हैं. स्थानीय प्रतिनिधियों ने लंबे समय से बताया है कि ज्यादातर लोग, यहां तक कि जिले के कुछ हिस्सों में तो लगभग 70 प्रतिशत लोग, कन्नड़ सीखना और कन्नड़ लिखना पसंद करते हैं.
मुख्यमंत्री ने कहा, "यह मलयालम के लिए कोई खतरा नहीं है, यह भारत की बहुवचन संस्कृति का सबूत है, जहां भाषाएं बिना किसी डर के साथ रहती हैं." कन्नड़ और संस्कृति मंत्री शिवराज तंगदागी ने केरल में कन्नड़ मीडियम के छात्रों के हितों की रक्षा के लिए केंद्र से इस मामले में दखल देने की अपील की.
उन्होंने कहा, "केंद्र को तुरंत भाषा डायरेक्टर को केरल भेजना चाहिए ताकि यह पक्का हो सके कि केरल सरकार इस मामले में आगे न बढ़े." इसके अलावा उन्होंने कहा कि कर्नाटक सरकार का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही केरल के गवर्नर के पास भेजा जाएगा ताकि उनसे अनुरोध किया जा सके कि वे मुख्यमंत्री से बातचीत के बाद मलयालम भाषा बिल को मंजूरी न दें. कन्नड़ समर्थक संगठनों ने राज्य सरकार से वहां के कन्नड़ लोगों के साथ एकजुटता व्यक्त करने के लिए मंत्रियों का एक प्रतिनिधिमंडल कासरगोड भेजने का भी आग्रह किया.
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