मॉडलिंग छोड़ करनाल के पवन बने बेजुबानों के मसीहा, 10 हजार से अधिक बंदरों को दी नई जिंदगी, हर माह करते हैं लाखों खर्च
करनाल के पवन शर्मा ने मॉडलिंग छोड़ हजारों घायल बंदर और डॉग्स का रेस्क्यू कर उन्हें नई जिंदगी दी.

Published : February 26, 2026 at 5:52 PM IST
करनाल: हरियाणा के करनाल के रहने वाले पवन शर्मा जिन्हें लोग ‘करनाल रॉकस्टार्स’ के नाम से भी जानते हैं, आज बेजुबान जानवरों के लिए किसी मसीहा से कम नहीं हैं. कभी मॉडलिंग की दुनिया में पहचान बनाने का सपना देखने वाले पवन ने अपनी जिंदगी की दिशा ही बदल दी है. आज पवन का नाम घायल, बीमार और लाचार बंदरों और डॉग्स को नई जिंदगी देने के लिए जाना जाता है. पिछले छह सालों में वे करीब 10 हजार से अधिक बेजुबानों का रेस्क्यू कर, उनका इलाज कर उन्हें सुरक्षित जीवन दे चुके हैं. उनका ये सफर सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि मानवता की एक जीवंत मिसाल है.
एक हादसा, जिसने बदल दी जिंदगी: करनाल के पवन शर्मा से ईटीवी भारत ने बातचीत की. पवन ने कहा कि, " मेरी सेवा यात्रा की शुरुआत एक बेहद भावुक घटना से हुई. एक सड़क हादसे में एक बंदरिया की मौत हो गई थी. उसका छोटा बच्चा घंटों अपनी मां के पास बैठा दूध के लिए रोता रहा. यह दृश्य मेरे दिल को झकझोर गया. मैं उस मासूम बंदर को उठाकर अस्पताल ले गया. पूरी रात उसकी देखभाल की. उसी समय मैंने ये तय कर लिया कि अब मेरी जिंदगी बेजुबानों की सेवा के लिए समर्पित होगी. यह घटना मेरे जीवन के लिए टर्निंग पॉइंट साबित हुई. बस यहीं से शुरू हुआ मेरा रेस्क्यू मिशन."
एनजीओ बनाने से मिला मिशन को विस्तार: पवन बताते हैं कि अपने इस काम को संगठित रूप देने के लिए पवन ने "अंजनी एनिमल फाउंडेशन" और "करनाल रॉकस्टार्स" नाम से एक संस्था की स्थापना की. इस संस्था के माध्यम से वे घायल और बीमार बंदरों को रेस्क्यू कर अपने शेल्टर होम लाते हैं, जहां उनका इलाज और देखभाल की जाती है. कई बंदरों का महीनों तक उपचार किया जाता है. स्वस्थ होने के बाद उन्हें सुरक्षित स्थानों पर छोड़ दिया जाता है. पवन के अनुसार अब तक करीब 10 हजार बंदरों को नया जीवन दिया जा चुका है.

हर राज्य से आता है बुलावा: पवन कहते हैं कि, "मेरी सेवा सिर्फ करनाल या हरियाणा तक सीमित नहीं है. यदि देश के किसी भी राज्य से घायल या लाचार बंदर की सूचना मिलती है, तो हम अपनी टीम के साथ वहां पहुंच जाते हैं. हमारी पांच सदस्यीय टीम लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी रहती है. कई बार दूर-दराज के इलाकों में जाना पड़ता है, हालांकि मैं इसे अपना कर्तव्य मानता हूं. जब तक किसी बेजुबान की जान बचाई जा सकती है, तब तक मैं पीछे नहीं हटूंगा."

हर महीने ढाई से तीन लाख रुपये का खर्च: बंदरों और डॉग्स की देखभाल आसान काम नहीं है. पवन बताते हैं कि हर महीने करीब ढाई से तीन लाख रुपये का खर्च आता है. रोजाना 8 से 10 हजार रुपये भोजन, दवाइयों, एंबुलेंस, ईंधन और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं पर खर्च होते हैं. यह राशि वे अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स से होने वाली कमाई और कुछ सहयोगियों की मदद से जुटाते हैं. वे अपनी कमाई का आधे से अधिक हिस्सा बेजुबानों की सेवा में लगा देते हैं. पवन का मानना है कि यदि संसाधन सही दिशा में लगे तो कई जिंदगियां बचाई जा सकती हैं.

एंबुलेंस की सुविधा से आसान हुआ रेस्क्यू: पवन शर्मा ने आगे बताया कि, "शुरुआती दिनों में हमारी टीम को काफी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा. घायल बंदरों को लाने-ले जाने में दिक्कत होती थी, पिंजरे और मेडिकल सामान ले जाना मुश्किल होता था. इसके बाद हमने एक विशेष एंबुलेंस खरीदी, जिसमें पिंजरा रखने, मेडिकल सुविधा और टीम के सदस्यों के बैठने की व्यवस्था है. इमरजेंसी स्थिति में प्राथमिक उपचार भी इसी एंबुलेंस में दिया जाता है. इससे रेस्क्यू अभियान अधिक प्रभावी और तेज हो गया है."

स्थायी शेल्टर होम का सपना: पवन अब घायल और लावारिस बंदरों के लिए एक स्थायी और बड़े शेल्टर होम का निर्माण कर रहे हैं. पहले उन्होंने करनाल की एक कॉलोनी में छोटा सेंटर बनाया था, लेकिन बंदरों और डॉग्स की आवाज से पड़ोसियों को परेशानी होती थी. शिकायतों के चलते उन्हें नई जगह तलाशनी पड़ी. अब वे शहर से दूर एक बड़े परिसर में शेल्टर बना रहे हैं, जहां जानवरों को बेहतर माहौल और समय पर चिकित्सा सुविधा मिल सकेगी. उनका सपना है कि यह शेल्टर उत्तर भारत का एक आदर्श रेस्क्यू सेंटर बने.

बंदरों को पकड़ना आसान नहीं, हर कदम पर जोखिम: पवन बताते हैं कि बंदरों का स्वभाव काफी आक्रामक होता है, खासकर जब वे घायल या डरे हुए हों. उन्हें पकड़ना और सुरक्षित तरीके से पिंजरे में डालना बेहद जोखिम भरा होता है. कई बार बंदर काट भी लेते हैं, जिससे संक्रमण का खतरा रहता है. इसके बावजूद पवन और उनकी टीम बिना डरे ये काम करते हैं. उनका कहना है कि दर्द सहकर भी अगर किसी बेजुबान को नया जीवन मिलता है, तो यह सौदा बुरा नहीं है.
डॉग्स के लिए भी बना रहे छोटे-छोटे घर: पवन केवल बंदरों तक सीमित नहीं हैं. वे डॉग्स के लिए भी छोटे-छोटे लकड़ी के घर बनवाते हैं. खासकर उन फीमेल डॉग्स के लिए, जिन्होंने हाल ही में बच्चों को जन्म दिया हो. ये घर मुफ्त में लोगों को भी दिए जाते हैं ताकि वे सुरक्षित रह सकें. एक घर तैयार करने में करीब 2000 रुपये की लागत आती है. कई लोग अपने जन्मदिन या विशेष अवसर पर इन घरों को प्रायोजित करते हैं, जिससे और अधिक बेजुबानों को आश्रय मिल पाता है.
समाज से मिल रहा सहयोग: शुरुआत में पवन ने यह काम कुछ साथियों के साथ मिलकर किया था, लेकिन अब धीरे-धीरे समाज का सहयोग भी मिलने लगा है. कई लोग आर्थिक मदद करते हैं तो कुछ लोग घायल बंदरों को गोद लेने के लिए आगे आते हैं. इससे न केवल संस्था को सहारा मिलता है, बल्कि जानवरों को भी स्थायी देखभाल का अवसर मिलता है. पवन का मानना है कि यदि हर व्यक्ति थोड़ा-थोड़ा सहयोग करे तो किसी भी बेजुबान को सड़क पर तड़पना नहीं पड़ेगा.
मानवता की मिसाल बन चुके हैं पवन: आज करनाल के पवन शर्मा की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि संवेदनशील समाज की उम्मीद है. उन्होंने मॉडलिंग की चकाचौंध छोड़कर सेवा की राह चुनी और हजारों बेजुबानों को नई जिंदगी दी. पवन लोगों से अपील करते हैं कि वे जानवरों के प्रति दया और करुणा रखें, क्योंकि वे अपनी पीड़ा कह नहीं सकते. पवन का जीवन यह संदेश देता है कि असली सफलता दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने में है. उनकी यह यात्रा मानवता की एक ऐसी मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी.

