करनाल की अनु बनीं बुजुर्गों की मसीहा, 600 बेसहारा लोगों को दिया नया जीवन, 250 बुजुर्गों को परिवार से मिलवाया
करनाल की अनु मदान सालों से बुजुर्गों और बेसहारा लोगों की मदद करती आ रही है.

Published : February 27, 2026 at 3:58 PM IST
करनाल: "सेवा परमो धर्मः" यानी कि "सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है." लेकिन आज के इस भागदौड़ वाली जिन्दगी में किसी की सेवा करना लोगों के लिए इतना आसान नहीं होता. आज के समय में सभी लोग वर्किंग हैं. ऐसे में किसी और की मदद तो कर देते हैं, लेकिन उनकी सेवा में अपना बचा हुआ समय समर्पित करना काफी मुश्किल होता है. हालांकि करनाल की रहने वाली प्राइवेट स्कूल की अध्यापिका अनु मदान ये काम सालों से करती आ रही हैं.
जी हां, करनाल में जब कई सारे बुजुर्गों की सेवा करने की बात आती है, तो पंक्ति में सबसे आगे खड़ी हुई अनु मदान मिलती है. समाजसेवी अनु मदान स्कूल में बच्चों को शिक्षा देकर उनका भविष्य सुधार रही है. इसके साथ ही वो सालों से निस्वार्थ भाव से बुजुर्गों की सेवा कर रही हैं. स्कूल से अपनी ड्यूटी खत्म करने के बाद वह रात तक "अपना आशियाना वृद्ध आश्रम" में बुजुर्गों की सेवा करती है. ईटीवी भारत ने समाजसेविका व शिक्षिका अनु मदान से खास बातचीत की. बातचीत के दौरान अनु ने अपनी शुरुआत से लेकर अब तक की सारी बातें बताई.
प्राइवेट स्कूल की टीचर हैं अनु: अनु ने ईटीवी भारत को बताया कि, मैं एक प्राइवेट स्कूल की शिक्षिका हूं. मैंने अपना जीवन बेसहारा लोगों की खास कर बुजुर्गों की सेवा में समर्पित कर दिया है. मेरे नजर में शिक्षा का अर्थ केवल किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना भी है. दिन में मैं बच्चों को पढ़ाती हूं. स्कूल की घंटी बजते ही मैं अपने अलग मिशन में जुट जाती है. स्कूल के बाद मेरा पूरा समय इन बुजुर्गों और बेसहारों को समर्पित है."

15 साल पहले लिया संकल्प: अनु अपने इन नेक काम की शुरुआत के बारे में बताती है कि वह पिछले 15 वर्षों से अपना आशियाना' वृद्ध आश्रम से जुड़ी हुई हैं. उनके लिए यह केवल एक समाज सेवा नहीं, बल्कि उनके जीवन का उद्देश्य बन चुका है. स्कूल की छुट्टी के बाद लोग आराम की तलाश करते हैं. हालांकि अनु सीधा आश्रम पहुंचती हैं और देर रात तक बुजुर्गों की सेवा में जुटी रहती हैं.

600 बुजुर्गों को कर चुकी रेस्क्यू: अनु मदान ने बताया कि, " मैंने सैकड़ों जिंदगियों को बदला है.15-16 साल के अंदर 600 बेसरा लोगों का मैं रेस्क्यू कर चुकी हूं. कईयों को उनके परिवार ने भुला दिया था. अब तक करीब 250 बिछड़े हुए बुजुर्गों को उनके परिवार से मिलवा चुकी हूं. वहीं, लावारिस और चलने-फिरने में असमर्थ करीब 600 बुजुर्गों को मैं रेस्क्यू कर आश्रम लेकर आई हूं. यहां ऐसे लोगों की सेवा की जाती है."
पिछले 40 वर्षों से समाज को समर्पित "अपना आशियाना आश्रम": अनु ने बताया कि, "अपना आशियाना आश्रम सिर्फ एक संस्था नहीं बल्कि एक वह घर है, जहां ऐसे लोगों को रेस्क्यू करके लाया जाता है, जिनको उनके परिवार के द्वारा छोड़ दिया जाता है. आश्रम में रहने वाले बुजुर्गों के खाने-पीने से लेकर उनकी व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वास्थ्य का वे खुद ध्यान रखती हैं."

एक हादसे से हुई सेवा समर्पण की शुरुआत: अनु मदान आगे कहती हैं कि, "जब हमने इसकी शुरुआत की, तब कुछ ऐसा हुआ कि एक बुजुर्ग जिसके शरीर पर चोट लगने के बाद गहरे घाव को गए थे, उनके शरीर में घाव में कीड़े चल रहे थे और मवाद भी काफी हो रखा था. जब हमने उसकी हालत को देखा तो उसे वहां से उठाकर अपना आशियाना आश्रम में लेकर आए. वहीं से अपना आशियाना आश्रम से मेरा जुड़ाव शुरू हुआ. उस बुजुर्ग ने मुझे बताया कि उनको उनके परिवार के द्वारा छोड़ दिया गया है. वह मंदिर के आगे भीख मांग कर ही अपने दो व्यक्ति रोटी का जुगाड़ करते हैं. तब से मेरे मन में करुणा का भाव जाग गया और मैंने बुजुर्गों की सेवा करना ही अपना प्रथम कर्तव्य समझा."

पिता ने बेटों की तरह पाला: अनु कहती हैं कि, "मुझे ये संस्कार मेरे परिवार से मिले हैं. पहले संगठित परिवार होते थे, तो संस्कार भी ज्यादा होते थे. आजकल के बच्चों में संस्कार बहुत कम रह गए हैं, जिसके चलते बुजुर्ग अब बेसहारा होते जा रहे हैं. मेरी परवरिश काफी अच्छी हुई है. मेरे पिता ने मुझे एक लड़की की तरह नहीं बल्कि एक लड़के की तरह यानी बेटे की तरह पाला है. जब मैं पंजाबी विश्वविद्यालय की विद्यार्थी थी, तब मैं खेलों में और पढ़ाई में दोनों में काफी अच्छी थी. ये सब संस्कार मुझे मेरे पिता और परिवार से मिले हैं.

"शिक्षा के साथ संस्कार भी जरूरी": अनु मदान ने ईटीवी भारत को बताया कि, "जो मां-बाप अपने पांच-पांच बच्चों को पालकर काबिल बनाते हैं, उन पांच बच्चों से अपने दो माता-पिता की भी देखभाल नहीं हो रही. अक्सर समाज में बुजुर्गों को बोझ समझकर सड़कों पर छोड़ दिया जाता है.ऐसे में अब लोगों को शिक्षा के साथ संस्कार की भी जरूरत है."
लोगों से की अपील: अनु ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि, "माता-पिता एक बार मिलते हैं. अपने माता-पिता का सम्मान करें. उनकी देखभाल करें. अगर वह हमारे पास से चले गए तो वह कभी दोबारा लौटकर नहीं आएंगे. इसलिए सभी से अपील करती हूं कि अपने बुजुर्गों की देखभाल करें. उनके प्रेम करें ताकि वह बुढ़ापे में अपने आप को अकेला महसूस ना करें."

समाज के लिए प्रेरणा बनीं अनु मदान: असहाय बुजुर्गों के लिए अनु मदान फरिश्ते से कम नहीं हैं. वे उन्हें केवल छत और भोजन ही नहीं, बल्कि सम्मान और स्नेह भी देती हैं. एक शिक्षिका के रूप में बच्चों को शिक्षा देती हैं, वहीं सेविका बनकर मानवता का पाठ पढ़ाती हैं. उनका जीवन सिखाता है कि सच्ची सेवा के लिए व्यस्तता नहीं, बल्कि समर्पित मन जरूरी होता है.

