ETV Bharat / bharat

12 साल का इंतजार खत्म: नेशनल हाईवे के लिए ली गई जमीन का मुआवजा देगा प्रशासन

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक स्थानीय भूस्वामी के कानूनी वारिसों को ब्याज सहित मुआवजा जारी करने का आदेश दिया है.

JK High Court
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय. (ETV Bharat)
author img

By Muhammad Zulqarnain Zulfi

Published : January 7, 2026 at 6:40 PM IST

5 Min Read
Choose ETV Bharat

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में एक राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण के एक दशक से भी अधिक समय बाद, जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय ने एक स्थानीय भूस्वामी के कानूनी वारिसों को ब्याज सहित मुआवजा जारी करने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी विभागों के बीच की लापरवाही या चूक के कारण नागरिकों को उनके भुगतान से वंचित नहीं किया जा सकता.

तलत कौसर और अन्य द्वारा दायर एक रिट याचिका को स्वीकार करते हुए, जस्टिस राहुल भारती ने याचिकाकर्ताओं को 14.46 लाख रुपये (ब्याज सहित) जारी करने का निर्देश दिया. यह राशि किश्तवाड़ जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग के 'हस्ती से मालीपेठ' खंड को चौड़ा करने के लिए 2014 में अधिग्रहित की गई भूमि के बदले दी जानी है.

5 जनवरी, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में जज ने टिप्पणी की, "याचिकाकर्ताओं को उनके मुआवजे से वंचित रखने के लिए बंधक नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 300-ए के तहत निहित 'संपत्ति के अधिकार' का उल्लंघन है."

यह याचिका मूल रूप से फरवरी 2021 में गुलाम रसूल हमल के चार बेटों द्वारा दायर की गई थी. इसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत वैधानिक ब्याज के साथ 8.97 लाख रुपये के भुगतान की मांग की थी. यह राशि किश्तवाड़ गांव के खसरा नंबर 5339, 5332 और 4214 के अंतर्गत आने वाली 1 कनाल और 4 मरला भूमि के अधिग्रहण से संबंधित थी.

मामले की सुनवाई के दौरान, 1 मई 2021 को याचिकाकर्ता इरशाद अहमद हमल की मृत्यु हो गई. इसके बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों को रिकॉर्ड में शामिल किया गया, जिसका नेतृत्व उनकी विधवा तलत कौसर कर रही हैं, जो अब इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ता हैं.

इस मामले में प्रतिवादियों में लोक निर्माण विभाग (PWD) के आयुक्त सचिव के माध्यम से जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश, भूमि अधिग्रहण कलेक्टर और सहायक आयुक्त राजस्व (किश्तवाड़), सीमा सड़क संगठन (BRO) की 118 रोड कंस्ट्रक्शन कंपनी के कमांडिंग ऑफिसर और किश्तवाड़ में PWD के अधिशासी अभियंता शामिल थे.

फैसले के अनुसार, 8 सितंबर 2014 को जारी एक आदेश के तहत कुल 127.17 कनाल भूमि का अधिग्रहण किया गया था, जिसका कुल मुआवजा 9.78 करोड़ रुपये से अधिक आंका गया था. हालांकि मुआवजे का कुछ हिस्सा जमा कर दिया गया था, लेकिन संबंधित विभाग द्वारा 5.68 करोड़ रुपये से अधिक की शेष राशि जारी नहीं की गई थी. इसके कारण याचिकाकर्ताओं सहित कई भूस्वामियों को भुगतान नहीं हो सका.

जस्टिस भारती ने अपने 9 पन्नों के फैसले में उल्लेख किया कि याचिकाकर्ताओं की पात्रता को लेकर कोई विवाद नहीं था. अदालत ने दर्ज किया, "याचिकाकर्ताओं के 8,97,000 रुपये की मुआवजा राशि के हकदार होने के संबंध में कोई इनकार या विवाद नहीं है."

भुगतान में देरी के कारण इससे पहले मार्च 2021 में हाई कोर्ट की एक खंडपीठ ने तीखी टिप्पणी की थी. अदालत ने सरकार को दोषी ठहराते हुए कहा था कि वह अपने ही द्वारा तय किए गए भूमि अधिग्रहण मुआवजे का सम्मान करने में विफल रही है.

पीठ ने कहा था कि विभागों के बीच तालमेल की कमी के कारण भुगतान न करना सरकार का आंतरिक मामला है और इसका इस्तेमाल भूस्वामियों को उनके हक से वंचित करने के लिए नहीं किया जा सकता. इसके बाद कोर्ट ने भुगतान का निर्देश देते हुए एक अंतरिम आदेश जारी किया और चेतावनी दी कि यदि इसका पालन नहीं हुआ, तो भूमि अधिग्रहण कलेक्टर और यहां तक कि केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होना पड़ेगा.

अदालत के निर्देशों के बाद, संचित ब्याज सहित 14.46 लाख रुपये अंततः नवंबर 2021 में हाई कोर्ट में जमा कराए गए थे. अपने अंतिम फैसले में, जस्टिस भारती ने माना कि याचिकाकर्ता पहले से जारी आदेश के प्रवर्तन के हकदार हैं और उन्होंने जमा की गई राशि को जारी करने का आदेश दिया.

अदालत ने आदेश दिया, "इस प्रकार रिट याचिका स्वीकार की जाती है और जमा की गई मुआवजे की राशि 14,46,259 रुपये, उस पर मिलने वाले ब्याज के साथ याचिकाकर्ताओं को चार समान हिस्सों में जारी की जाए." जम्मू स्थित रजिस्ट्रार ज्यूडिशियल को एक महीने के भीतर यह प्रक्रिया पूरी करने का निर्देश दिया गया है, जिसके तहत राशि सीधे याचिकाकर्ताओं के बैंक खातों में ट्रांसफर की जाएगी.

क्या है अनुच्छेद 300-ए : यह संवैधानिक प्रावधान सुनिश्चित करता है कि किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा.

इसे भी पढ़ेंः