रांची के झिरी डंपिंग यार्ड में गंदगी, प्रदूषण और बीमारियां बनी लोगों के लिए चुनौती, क्या वाकई बदल रही तस्वीर ?
रांची के झिरी डंपिंग यार्ड के आसपास की बस्तियों में रह रहे लोग बदबू और प्रदूषण की मार झेल रहे हैं. चंदन भट्टाचार्य की रिपोर्ट.

Published : August 25, 2026 at 6:10 PM IST
रांची: शहर से करीब 15 किलोमीटर दूर झिरी. एक तरफ 33 एकड़ में फैला कचरे का विशाल पहाड़ और दूसरी तरफ उसी कचरे के बीच जिंदगी जीने को मजबूर बस्तियां. पिछले करीब 25 वर्षों से रांची शहर का कचरा यहां पहुंचता रहा है. करीब 2.40 लाख घरों से निकलने वाले कचरे ने इस जगह को एक बड़े लैंडफिल में बदल दिया. निगम के आंकड़ों में यहां जमा पुराने कचरे की मात्रा 18 से 22 लाख टन के बीच बताई गई है.
कैसा है पहाड़ के आसपास परिवारों का हाल
लेकिन झिरी की कहानी सिर्फ कचरे के पहाड़ की नहीं है. इस पहाड़ के ठीक आसपास ऐसे परिवार रहते हैं, जिनके लिए यह कचरा रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है. बदबू, मच्छर, मक्खियां और प्रदूषण के बीच बच्चों की पढ़ाई से लेकर परिवार की नींद तक प्रभावित होने की शिकायतें सामने आती हैं.
ईटीवी भारत की टीम ने झिरी डंपिंग यार्ड से लेकर आसपास की बस्तियों तक जाकर इस पूरी तस्वीर को समझने की कोशिश की. टीम ने कचरे के पहाड़ पर चल रहे बायो-माइनिंग और बायोरेमेडिएशन के काम को देखा और इसके बाद उन परिवारों के बीच पहुंची, जो सालों से इस डंपिंग यार्ड के आसपास रह रहे हैं. यहीं से झिरी की कहानी का सबसे मानवीय चेहरा सामने आता है.
कचरे के पहाड़ के साए में जिंदगी
झिरी की बस्ती में रहने वाले लोगों के लिए कचरे का पहाड़ सिर्फ कुछ मीटर दूर मौजूद कचरा नहीं है. यह उनके रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है. स्थानीय लोगों का कहना है कि गर्मी हो या बारिश, दुर्गंध की समस्या बनी रहती है. बारिश के दिनों में जब कचरे का पहाड़ भीगता है, तो बदबू और तेज हो जाती है. आसपास मक्खी और मच्छरों का प्रकोप भी बढ़ जाता है.
लोगों की जिंदगी पर डंपिंग यार्ड का असर
कई परिवारों का कहना है कि रात में सोते समय तो मच्छरदानी लगानी ही पड़ती है, दिन में भी बच्चों को पढ़ाने के दौरान मच्छरों से बचाने के लिए मच्छरदानी का सहारा लेना पड़ता है. एक घर का नजारा इस समस्या की गंभीरता बताता है बच्चा किताब लेकर बैठा है, लेकिन खुले कमरे में नहीं. वह मच्छरदानी के भीतर बैठकर पढ़ाई कर रहा है. यह तस्वीर सिर्फ मच्छरों की समस्या नहीं दिखाती, बल्कि यह बताती है कि डंपिंग यार्ड का असर घर की सामान्य जिंदगी तक पहुंच चुका है.

बच्चों की पढ़ाई पर भी असर
बस्ती के लोगों के मुताबिक, शाम होते ही मच्छरों की संख्या बढ़ जाती है. ऐसे में बच्चों के लिए पढ़ाई करना मुश्किल हो जाता है. कई परिवारों को बच्चों को मच्छरदानी के अंदर बैठाकर पढ़ाना पड़ता है. स्थानीय अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को बार-बार मच्छर काटने और मौसम बदलने के दौरान स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों का सामना करना पड़ता है. कई परिवार बच्चों के बीमार पड़ने की शिकायत भी करते हैं. स्थानीय लोगों की चिंता यह है कि कचरे के इतने बड़े ढेर के आसपास रहना उनके बच्चों के स्वास्थ्य और भविष्य के लिए कितना सुरक्षित है ?
यही सवाल झिरी की इस कहानी को सिर्फ वेस्ट मैनेजमेंट की खबर नहीं रहने देता. यह सवाल बन जाता है, क्या विकास और कचरा प्रबंधन की कीमत आसपास रहने वाले परिवारों को अपनी सेहत और सामान्य जीवन से चुकानी पड़ रही है ?
5 किलोमीटर के दायरे में मच्छरों का संकट
स्थानीय लोगों के मुताबिक, डंपिंग यार्ड के आसपास कई किलोमीटर के इलाके में मच्छरों की समस्या गंभीर है. घरों में दरवाजों और खिड़कियों पर मच्छरदानी लगाने के साथ-साथ रात में सोने के लिए भी मच्छरदानी का इस्तेमाल करना पड़ता है.

बस्ती में ETV भारत की टीम की मौजूदगी के दौरान लोगों ने अपनी समस्याएं साझा की. किसी ने बदबू की शिकायत की, किसी ने मच्छरों की, तो किसी ने बच्चों के बार-बार बीमार पड़ने की चिंता जताई. लोगों की सबसे बड़ी मांग यही है कि कचरे का पहाड़ जल्द से जल्द हटे और उनके इलाके को इस समस्या से स्थायी राहत मिले.
25 साल का कचरा, अब निस्तारण की चुनौती
झिरी में लगातार कचरा डंप किए जाने के कारण यह सामान्य डंपिंग साइट नहीं रही, बल्कि कचरे के पहाड़ में बदल गई. अब इस पुराने कचरे को हटाने के लिए वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जा रही है. बायो-माइनिंग के तहत पुराने कचरे को मशीनों से निकालकर अलग-अलग हिस्सों में प्रोसेस किया जा रहा है. उपयोगी सामग्री, मिट्टी और अन्य अवशेषों को अलग किया जा रहा है, जबकि RDF यानी Refuse Derived Fuel जैसी सामग्री को अलग उपयोग के लिए तैयार किया जा रहा है.

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद तेज हुआ काम
झिरी डंपिंग यार्ड में वर्षों से जमा कचरे के निस्तारण को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने भी सख्त रुख अपनाया है. अगस्त 2026 की सुनवाई में रांची नगर निगम को शेष कचरे का निष्पादन 15 सितंबर 2026 तक पूरा करने और 17 सितंबर तक अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया गया है.
काम की गति बढ़ाने के लिए बढ़ाई गई मशीनों की संख्या
वहीं कचरा प्रबंधन का काम कर रही कंस्ट्रक्शन कंपनी की ओर से अदालत को बताया गया है कि करीब 96 प्रतिशत कचरे का काम पूरा हो चुका है, शेष करीब 4 % काम भी निर्धारित समय में पूरा करने का प्रयास किया जा रहा है. काम की गति बढ़ाने के लिए मशीनों की संख्या भी बढ़ाई गई है. पहले करीब चार मशीनों से काम हो रहा था, जबकि अब मशीनों की संख्या 13 से अधिक कर दी गई है. प्रतिदिन करीब 800 से 900 मीट्रिक टन पुराने कचरे के वैज्ञानिक निस्तारण का दावा किया जा रहा है.
कचरे के पहाड़ के नीचे दबा भविष्य
बायो-माइनिंग के बाद निकलने वाले बायो-सॉइल और सुरक्षित इनर्ट सामग्री का इस्तेमाल साइट के निचले हिस्सों और खाली जगहों को भरने और जमीन को समतल करने में किया जा रहा है. झिरी क्षेत्र में करीब 2 करोड़ 96 लाख रुपये की लागत से एप्रोच रोड, गार्ड वॉल और रोड साइड ड्रेन जैसी बुनियादी सुविधाओं के विकास का काम भी शुरू हुआ है लेकिन स्थानीय लोगों के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि यह काम जमीन पर कब दिखाई देगा और उन्हें बदबू और मच्छरों से वास्तविक राहत कब मिलेगी.
झिरी में कचरे से बन रही ऊर्जा
झिरी की कहानी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू GAIL का बायोगैस प्लांट है. पीएम नरेंद्र मोदी ने अक्टूबर 2024 में इस प्लांट का उद्घाटन किया था. प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 150 मीट्रिक टन गीले कचरे को प्रोसेस करने की है. वर्तमान में रांची नगर निगम की ओर से करीब 75 से 80 मीट्रिक टन गीला कचरा प्रतिदिन यहां पहुंचाया जा रहा है. निगम ने इसे बढ़ाकर करीब 100 टन प्रतिदिन करने का लक्ष्य रखा है लेकिन प्लांट के सामने सबसे बड़ी चुनौती गीले कचरे की शुद्धता है. GAIL को मुख्य रूप से रसोई का कचरा, फल-सब्जियों के छिलके और अन्य जैविक कचरा चाहिए, अगर गीले कचरे में प्लास्टिक या सूखा कचरा मिल जाता है तो प्रोसेसिंग प्रभावित होती है.

MRF सेंटर से बदल सकता है कचरा प्रबंधन
इसी समस्या को दूर करने के लिए रांची नगर निगम की ओर से MRF यानी Material Recovery Facility केंद्रों को मजबूत किया जा रहा है, ताकि गीले और सूखे कचरे को अलग किया जा सके. यह व्यवस्था सिर्फ GAIL प्लांट के लिए जरूरी नहीं है. यह झिरी को दोबारा कचरे के पहाड़ में बदलने से रोकने के लिए भी जरूरी है.
150 टन कचरे से 5 टन बायो-CNG
GAIL प्लांट अपनी पूरी क्षमता पर चले तो प्रतिदिन 150 टन गीले कचरे से करीब 5,000 किलोग्राम यानी पांच टन बायो-CNG और करीब 25 टन Fermented Bio Manure तैयार किया जा सकता है. यहां तैयार बायो-CNG को CNG स्टेशनों तक भेजा जा रहा है. रांची के सरवल और नगड़ी समेत GAIL के CNG स्टेशनों पर यह गैस उपलब्ध कराई जा रही है. वर्तमान में शहर के सीएनजी वाहन इस गैस का इस्तेमाल कर रहे हैं. पाइपलाइन के जरिए घरों तक PNG यानी पाइप्ड नेचुरल गैस पहुंचाने की दिशा में भी तैयारी चल रही है.
नया कचरा फिर पहाड़ न बने, यही सबसे बड़ी चुनौती
पुराने कचरे को हटाना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है कि दोबारा उसी जगह नया कचरा जमा न हो. अगर घरों से निकलने वाला गीला और सूखा कचरा अलग नहीं किया गया और मिश्रित कचरा लगातार डंप होता रहा, तो झिरी की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी, इसलिए घर से ही कचरे की छटाई, MRF सेंटर की व्यवस्था और गीले कचरे को GAIL प्लांट तक पहुंचाना इस पूरी योजना की सफलता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है.

कचरे के पहाड़ की जगह बनेगा Eco-Park
झिरी के भविष्य को लेकर Eco-Park विकसित करने की योजना भी है. पुराने कचरे का वैज्ञानिक निष्पादन पूरा होने और जमीन के उपचार के बाद यहां हरित क्षेत्र विकसित करने की तैयारी है. बड़े पैमाने पर पौधारोपण और जमीन के समतलीकरण के बाद इस क्षेत्र को हरित एवं सार्वजनिक उपयोग के क्षेत्र में बदलने की योजना है लेकिन इस भविष्य की तस्वीर तक पहुंचने से पहले जमीन का वैज्ञानिक उपचार और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करना सबसे जरूरी होगा.
एक बड़ी आबादी को कैसे मिले राहत..?
सवाल सिर्फ कचरा हटाने का नहीं, लोगों को राहत देने का है. झिरी में एक ही जगह दो तस्वीरें दिखाई देती हैं. एक तरफ मशीनें कचरे के पहाड़ को खत्म करने में लगी हैं, दूसरी तरफ इसी पहाड़ के साए में परिवार अपनी जिंदगी जी रहे हैं. कहीं बदबू की शिकायत है, कहीं मच्छरों की परेशानी, तो कहीं बच्चों की पढ़ाई पर असर की चिंता.
ऐसे बदलेगी झिरी की किस्मत?
एक तरफ पुराना कचरा हटाकर जमीन को भविष्य के लिए तैयार किया जा रहा है, तो दूसरी तरफ उसी इलाके में गीले कचरे से बायो-CNG और जैविक खाद बनाने की कोशिश हो रही है. अगर पुराने कचरे का निस्तारण तय समय सीमा में पूरा होता है, जमीन का वैज्ञानिक उपचार किया जाता है, नया कचरा अलग-अलग करके प्रोसेसिंग यूनिट तक पहुंचता है और GAIL प्लांट को पर्याप्त गीला कचरा मिलता है, तो झिरी की पहचान बदल सकती है.
लेकिन इस बदलाव की असली सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होगी कि कचरे का पहाड़ कितना जल्दी खत्म हुआ. सफलता तब मानी जाएगी, जब कचरे के पहाड़ के ठीक बगल में रहने वाला बच्चा मच्छरदानी के अंदर नहीं, खुले और सुरक्षित माहौल में बैठकर पढ़ सके.
स्वास्थ्य को चिंतित है लोग
जब परिवार रात में बदबू और मच्छरों से परेशान होकर खिड़की-दरवाजे बंद करने को मजबूर न हो. जब लोगों को अपने बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर हर दिन चिंता न करनी पड़े और जब 33 एकड़ की यह जमीन सिर्फ कचरे का इतिहास नहीं, बल्कि स्वच्छ हवा, हरियाली और ऊर्जा के नए भविष्य की पहचान बने. झिरी में बदलाव की मशीनें चल रही हैं.
अब देखना यह है कि इस बदलाव का असर कचरे के पहाड़ से निकलकर उन घरों तक कब पहुंचता है, जहां लोग वर्षों से इस पहाड़ का बोझ अपनी जिंदगी में उठा रहे है.
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