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झारखंड की पहचान को मिला वैश्विक सम्मान: राज्य के 11 पारंपरिक उत्पादों को मिला GI टैग, देखें पूरी लिस्ट

झारखंड की पारंपरिक शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक सम्मान मिला है. इस वर्ष राज्य के 11 पारंपरिक उत्पादों को GI टैग मिला है.

Jharkhand GI tag products
झारखंड के जीआई टैग उत्पाद. (कोलाज इमेज-ईटीवी भारत)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : June 14, 2026 at 2:29 PM IST

4 Min Read
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रांची: झारखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक शिल्पकला को राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी पहचान मिली है. झारखंड के कुल 11 विशिष्ट उत्पादों को GI टैग मिला है. जिसमें 04 को GI टैग दिलाने में राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) ने उल्लेखनीय भूमिका निभाई है. इस वर्ष (2026) जिन 11 उत्पादों को GI टैग मिला है, उसमें कोडरमा का केसरिया कलाकंद, कुचाई सिल्क, मुंडा सिल्क सहित 11 उत्पाद शामिल है. हालांकि इसके पूर्व वर्ष 2021 में सोहराई कोहबर पेंटिंग-Sohrai Khovar Painting को GI tag मिला था.

नाबार्ड के सहयोग और सतत प्रयास से विकसित राज्य की चार विशिष्ट उत्पादों भगैया सिल्क, कुचाई सिल्क, मुंडा ज्वेलरी और झारखंड बांस शिल्प को भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI टैग) मिला है. यह उपलब्धि न केवल झारखंड की पारंपरिक कला, शिल्प और ज्ञान प्रणाली को संरक्षण प्रदान करेगी, बल्कि हजारों कारीगरों, बुनकरों और ग्रामीण उत्पादकों की आजीविका को भी नई मजबूती देगी. GI टैग किसी उत्पाद की विशिष्ट भौगोलिक पहचान और उसकी प्रामाणिकता का प्रमाण होता है, जिससे बाजार में उसकी अलग पहचान बनती है और बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ जाती है.

Jharkhand GI tag products
भगैया सिल्क और कुचाई सिल्क से तैयार उत्पाद. (फोटो-सौ. नाबार्ड)

झारखंड नाबार्ड के अनुसार, यह सफलता उत्पादक समूहों, स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (FPO), विभिन्न सरकारी विभागों, तकनीकी संस्थानों और अन्य हितधारकों के साथ वर्षों तक किए गए सामूहिक प्रयासों का परिणाम है. नाबार्ड ने इन उत्पादों की विशिष्टताओं की पहचान करने, दस्तावेजीकरण कराने, उत्पादकों को संगठित करने, मूल्य श्रृंखला को मजबूत बनाने और GI पंजीकरण की पूरी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

रेशम परंपरा को मिली नई पहचान

भगैया सिल्क और कुचाई सिल्क को GI टैग मिलने से झारखंड की समृद्ध रेशम परंपरा को राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली है और इसे एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है. स्थानीय ज्ञान, पारंपरिक तकनीकों और पीढ़ियों से हस्तांतरित कौशल पर आधारित ये उत्पाद राज्य की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा हैं. GI पंजीकरण से इनकी विशिष्टता सुरक्षित रहेगी और राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनकी मांग बढ़ने की पूरी संभावना है.

मुंडा समुदाय की संस्कृति का प्रतीक है मुंडा ज्वेलरी

मुंडा ज्वेलरी को GI टैग मिलना झारखंड की जनजातीय संस्कृति के लिए गौरव का विषय है. अपनी विशिष्ट डिजाइन, पारंपरिक शिल्पकला और सांस्कृतिक महत्व के कारण यह आभूषण मुंडा समुदाय की पहचान का प्रतीक माना जाता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस मान्यता से आदिवासी कारीगरों को नए बाजार और बेहतर आय के अवसर प्राप्त होंगे.

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मुंडा ज्वेलरी . (फोटो-सौ. नाबार्ड)

बांस शिल्प को मिलेगा नया बाजार

झारखंड बांस शिल्प को GI टैग मिलने से राज्य के ग्रामीण कारीगरों की रचनात्मकता और कौशल को नई पहचान मिली है. स्थानीय स्तर पर उपलब्ध बांस से तैयार होने वाले उपयोगी और आकर्षक उत्पाद अब व्यापक बाजार तक पहुंच सकेंगे. इससे बांस आधारित उद्यमिता को बढ़ावा मिलने के साथ-साथ सतत रोजगार के अवसर भी सृजित होंगे.ब्रांडिंग, निर्यात और पर्यटन को बढ़ावा मिलने की पूरी संभावना है.

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बांस शिल्प से तैयार उत्पाद. (फोटो-सौ. नाबार्ड)

झारखंड के इन उत्पादों को इस वर्ष मिला है GI टैग

वर्षउत्पाद
March 2026Bhagaiyya Saree and Fabrics
March 2026Kuchai Silk
March 2026Kesaria Kalakand (Koderma)
March 2026Dokra Craft
March 2026Dumka Chadar Badoni Puppets
March 2026Munda Jewellery
March 2026Jharkhand Bamboo Crafts
March 2026Tussar silk and sarees
March 2026Jadupatua painting
March 2026Panchi saree and fabrics
March 2026Jharkhand Benam

राज्य की सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है GI टैग-दीपमाला घोष

नाबार्ड झारखंड की मुख्य महाप्रबंधक दीपलाला घोष ने राज्य के कई उत्पादों को GI टैग मिलने पर खुशी जताते हुए कहा कि यह मान्यता झारखंड की पारंपरिक ज्ञान प्रणाली, शिल्प कौशल और सांस्कृतिक विरासत का सम्मान है.GI टैग केवल उत्पादों को पहचान और व्यावसायिक मूल्य ही नहीं देता, बल्कि नई पीढ़ी को भी पारंपरिक शिल्प से जुड़ने के लिए प्रेरित करता है. उन्होंने बताया कि नाबार्ड प्रदर्शनी, ग्रामीण हाट, खरीदार-विक्रेता बैठक, सरस मेला और अन्य विपणन मंचों के माध्यम से इन उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने की दिशा में लगातार काम कर रहा है.

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प्रतीकात्मक तस्वीर. (ETV BHARAT)

GI पंजीकरण से इन उत्पादों की ब्रांडिंग मजबूत होगी, निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी और पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा.विशेषज्ञों का मानना है कि इस उपलब्धि से यह सुनिश्चित होगा कि इन पारंपरिक उत्पादों से होने वाला आर्थिक लाभ सीधे उन समुदायों तक पहुंचे, जिन्होंने पीढ़ियों से इन कलाओं और परंपराओं को संरक्षित रखा है. यह कदम झारखंड की ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ राज्य की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक मंच पर स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाएगा.