आखिर क्यों कुपोषण की गंभीर चुनौती से जूझ रहा झारखंड, 34 हजार से अधिक बच्चों की स्थिति गंभीर
झारखंड को बच्चों में कुपोषण की गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ रहा है. 34 हजार से अधिक बच्चे भयंकर कुपोषित हैं.

Published : January 3, 2026 at 2:23 PM IST
रिपोर्ट: उपेंद्र कुमार
रांची: झारखंड राज्य की स्थापना को 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं. 15 नवंबर 2000 को बिहार से अलग होकर झारखंड एक स्वतंत्र राज्य के रूप में अस्तित्व में आया. प्राकृतिक संसाधनों जैसे कोयला, लोहा, अभ्रक और बॉक्साइट से भरपूर यह राज्य देश की आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देता है. फिर भी, 25 वर्षों बाद भी यहां कुपोषण, विशेषकर बच्चों में कुपोषण, एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बना हुआ है. राज्य में गरीबी, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्त पहुंच जैसी चुनौतियां कुपोषण को बढ़ावा दे रही हैं.
NFHS-5 के आंकड़े बताते हैं चिंताजनक स्थिति
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS-5, 2019-21) के अनुसार, झारखंड में बच्चों में कुपोषण की स्थिति बेहद चिंताजनक है. पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में से लगभग 39.6 प्रतिशत स्टंटेड (आयु के अनुसार कम ऊंचाई, यानी बौनेपन के शिकार) हैं. वहीं, 22 प्रतिशत बच्चे वेस्टेड (ऊंचाई के अनुसार कम वजन) हैं. राज्य में पांच वर्ष से कम आयु के लगभग 9.1 प्रतिशत बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले हैं. इसके अलावा, 6 महीने से 59 महीने की आयु के 67.5 प्रतिशत बच्चे एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित हैं.
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि हालांकि पिछले सर्वे (NFHS-4) की तुलना में कुछ सुधार हुआ है, लेकिन कुपोषण, एनीमिया, बौनेपन और कम वजन की समस्या राज्य में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनी हुई है. NFHS-5 के अनुसार, झारखंड उन राज्यों में शामिल है जहां स्टंटिंग की दर राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है. विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण बच्चों के शारीरिक और मानसिक विकास को स्थायी रूप से प्रभावित करता है, जिससे राज्य की भावी पीढ़ी कमजोर हो रही है.
राज्य में 34 हजार से अधिक बच्चे अति गंभीर कुपोषित
झारखंड में अति गंभीर रूप से कुपोषित (सिवियर एक्यूट माल्न्यूट्रिशन - SAM) बच्चों की संख्या 34,698 है. राज्य के 24 जिलों में से 17 जिले ऐसे हैं जहां कुपोषण, विशेषकर अति गंभीर कुपोषण, की स्थिति अत्यंत गंभीर है. इन बच्चों को गुणवत्तापूर्ण और मानक इलाज उपलब्ध कराने के लिए रांची के राजेंद्र इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (रिम्स) में "अपर रेफरल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर SAM चाइल्ड" की स्थापना अक्टूबर 2023 में की गई थी.

यह 10 बेड वाला सेंटर ऑफ एक्सीलेंस राज्य भर से आने वाले अति गंभीर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए बनाया गया था. लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि सेंटर खुलने के 26-27 महीनों में यहां केवल 168 बच्चों का ही इलाज हो पाया है. इसका मतलब है कि औसतन हर महीने मात्र 6-7 बच्चों का इलाज इस विशेष केंद्र में हुआ. जबकि राज्य में हजारों SAM बच्चे इलाज की प्रतीक्षा में हैं.
माता-पिता की गंभीरता की कमी और जागरूकता का अभाव
रिम्स स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर माल्न्यूट्रिशन में शुरुआती दिनों से सेवा दे रही सिस्टर सुगंधा बताती हैं कि अन्य जिलों से अति गंभीर कुपोषित बच्चों को रेफर करने की संख्या बहुत कम है. इसका मुख्य कारण दूरदराज के जिलों और प्रखंडों के गांवों में माता-पिता का रांची आकर इलाज कराने से कतराना है. वजह है जागरूकता की भारी कमी. सिस्टर सुगंधा कहती हैं कि कुपोषण का दंश बच्चे पूरे जीवन भर झेलते हैं, फिर भी माता-पिता में इसको लेकर गंभीरता नहीं है. कई अभिभावक कुपोषण को एक गंभीर बीमारी ही नहीं मानते.

यह स्थिति न केवल ग्रामीण आदिवासी बहुल क्षेत्रों में बल्कि शहरी गरीब बस्तियों में भी देखी जा रही है. जागरूकता अभियान और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की सक्रियता के बावजूद, अभिभावक अक्सर पारंपरिक मान्यताओं या आर्थिक तंगी के कारण बच्चों को अस्पताल नहीं लाते.

रिम्स की जिम्मेदारी और जमीनी हकीकत
रिम्स के शिशु रोग विभाग के प्रमुख और सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर माल्न्यूट्रिशन के प्रभारी डॉ. राजीव मिश्रा कहते हैं कि रिम्स स्थित सेंटर की मुख्य जिम्मेदारी उन अति गंभीर कुपोषित बच्चों का इलाज करना है जो यहां पहुंचते हैं. डॉ. मिश्रा बताते हैं कि आने वाले बच्चों में ज्यादातर ऐसे होते हैं जिन्हें पोषण युक्त आहार के साथ-साथ दवाएं और थेरेप्यूटिक ट्रीटमेंट की जरूरत पड़ती है. ऐसे बच्चों को रिम्स के शिशु रोग विभाग के इंडोर वार्ड में भर्ती कर इलाज किया जाता है. ठीक होने के बाद वे दोबारा सेंटर में नहीं आते.

हालांकि, डॉ. मिश्रा जोर देते हैं कि राज्य भर के 100 से अधिक माल्न्यूट्रिशन ट्रीटमेंट सेंटर्स (MTC) और आंगनबाड़ी केंद्रों की जिम्मेदारी है कि वे अति गंभीर कुपोषित बच्चों की पहचान कर उन्हें रिम्स रेफर करें. लेकिन ऐसा बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा है. जमीनी स्तर पर पहचान और रेफरल सिस्टम में कमियां स्पष्ट दिख रही हैं.

आर्थिक प्रोत्साहन की व्यवस्था ठप होने से बढ़ी मुश्किल
अति गंभीर कुपोषित बच्चों के नहीं पहुंचने की एक बड़ी वजह आर्थिक भी है. रिम्स के अपर रेफरल सेंटर में इलाज कराने आने वाले बच्चों की मां को प्रतिदिन 130 रुपये की सहायता राशि दी जानी थी. यह व्यवस्था इसलिए की गई थी ताकि इलाज के दौरान माता-पिता को आर्थिक नुकसान न हो और वे लंबे समय तक रांची में रुक सकें. लेकिन शुरुआती दिनों को छोड़कर लंबे समय से यह भुगतान बंद है.

डॉ. राजीव मिश्रा इसकी वजह मानव संसाधन की कमी बताते हैं. वे कहते हैं कि वित्तीय प्रबंधन देखने के लिए एक समर्पित व्यक्ति की जरूरत है, लेकिन यहां ऐसा कोई नहीं है. इस कारण कई गरीब परिवार इलाज से वंचित रह जाते हैं.
टेक होम राशन बंद, SAM बच्चे इलाज से वंचित
राज्य में कुपोषित बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्रों से मिलने वाला टेक होम राशन (THR) लंबे समय से टेंडर प्रक्रिया के अभाव में बंद है. इससे हल्के और मध्यम कुपोषित बच्चों को घर पर पोषण सहायता नहीं मिल पा रही है. वहीं, अति गंभीर कुपोषित बच्चों की संख्या 34,698 होने के बावजूद रिम्स के अपर रेफरल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में बहुत कम बच्चे पहुंच रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि जागरूकता की कमी, रेफरल सिस्टम की कमजोरी और आर्थिक प्रोत्साहन में देरी जैसी समस्याएं कुपोषण उन्मूलन के प्रयासों को कमजोर कर रही हैं.

कुपोषण पर राजनीति, समस्या जस की तस
झारखंड के राज्य निर्माण से अब तक लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दल सत्ता में रहे हैं. भाजपा, झामुमो, कांग्रेस और अन्य दलों की सरकारें आईं-गईं, लेकिन बच्चों में कुपोषण की समस्या मामूली सुधार के साथ पहले जैसी ही बनी रही. जाहिर है कि कुपोषण मुक्त झारखंड बनाने की जिम्मेदारी सभी दलों पर थी, लेकिन यह लक्ष्य हासिल नहीं हो सका. इसके बजाय राजनीतिक बयानबाजी और एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का सिलसिला आज भी जारी है.
भाजपा के वरिष्ठ नेता और विधायक सीपी सिंह वर्तमान महागठबंधन सरकार की स्वास्थ्य व्यवस्था और कुपोषण की स्थिति को 'जंगलराज' का उदाहरण बताते हैं. वे कहते हैं कि तुलनात्मक रूप से भाजपा शासन में स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर थीं. जवाब में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश का कहना है कि स्वास्थ्य क्षेत्र में राज्य लगातार तरक्की कर रहा है और कई योजनाएं सफलतापूर्वक चल रही हैं. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण जैसी गंभीर समस्या पर राजनीतिक दलों को एकजुट होकर काम करना चाहिए, न कि इसे चुनावी मुद्दा बनाना चाहिए.

राज्य में 100 MTC और एक अपर रेफरल सेंटर
झारखंड के 24 जिलों में कुल 100 माल्न्यूट्रिशन ट्रीटमेंट सेंटर्स (MTC) संचालित हो रहे हैं. इनके अलावा रांची के रिम्स में राज्य का इकलौता अपर रेफरल सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर SAM चाइल्ड चल रहा है. सरकार ने इन केंद्रों पर इलाज कराने आने वाले कुपोषित बच्चों के लिए पौष्टिक आहार पर प्रतिदिन 50 रुपये, दवा पर प्रतिदिन 50 रुपये और माता-पिता को मजदूरी क्षतिपूर्ति (वेज कंपेंसेशन) के रूप में प्रतिदिन 130 रुपये देने की व्यवस्था की है. बावजूद इसके कुपोषण राज्य से समाप्त होने का नाम नहीं ले रहा.

जागरूकता और समन्वय की कमी मुख्य बाधा
रिम्स के अधिकारियों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कुपोषण उन्मूलन के लिए केवल केंद्र और योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं. माता-पिता में जागरूकता, जमीनी स्तर पर स्क्रीनिंग और समय पर रेफरल की मजबूत व्यवस्था जरूरी है. टेक होम राशन की बंदी और MTC में संसाधनों की कमी जैसी समस्याएं भी प्रयासों को कमजोर कर रही हैं.
राज्य सरकार पोषण अभियान और सक्षम आंगनबाड़ी जैसी केंद्रीय योजनाओं के माध्यम से प्रयास कर रही है, लेकिन राजनीतिक इच्छाशक्ति और अंतर-विभागीय समन्वय की कमी स्पष्ट दिखाई दे रही है.
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