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बिहार के इस गांव में नदी सहारा थी, वो भी सूख गई, बूंद-बूंद ऐसे पानी बटोरते हैं लोग

जमुई में पीने के पानी के लिऐ सूखे नदियों में ग्रामीण चूआं खोद रहे हैं. यहां चापाकल, बोरिंग और नल-जल योजना गर्मी में फेल हैं.

JAMUI WATER CRICIS
जमुई में गहराया जल संकट (ETVBharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : March 12, 2026 at 6:55 PM IST

8 Min Read
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रिपोर्ट : राजेश कुमार

जमुई : ''नदी से हमको चुआं खोदकर पानी लेना पड़ रहा है. सरकार ने पानी के लिए कनेक्शन दिया है पर उसमें पानी नहीं आ रहा, अगर हमें पानी नहीं मिला तो हम अगले चुनाव में वोट नहीं डालेंगे. देख लिजिएगा.''- सरिता देवी, ग्रामीण महिला

''हमारा खाना-पीना सब नदी से ही होता है. पर यह भी सूख चुकी है. हर घर जल योजना के तहत हमारे घर में नल तो है पर वो भी किसी काम का नहीं हैं. जेठ-बैसाख का महीना अभी बचले है, पता नहीं हमारा क्या होगा.'' - सुनीता देवी, ग्रामीण महिला

देखें यह स्पेशल रिपोर्ट (ETVBharat)

यह सिर्फ इन दो महिलाओं का दर्द नहीं है. बल्कि बिहार के जमुई जिले के कई गांव की यही स्थिति है. जहां हर साल गर्मी के मौसम से पहले ही पानी की समस्या दस्तक दे देती है. 'पानी बिन सब सून' यह कहावत इन दिनों जमुई जिले के कई गांवों में सच होती दिखाई दे रही है. ग्रामीण इलाकों में पेयजल संकट भयावह रूप लेने लगा है.

हालात इतने खराब हो चुके हैं कि ग्रामीणों को सूखी नदियों के बीच बालू खोदकर चूआं (गड्ढा) बनाना पड़ रहा है, तब कहीं जाकर पीने लायक थोड़ा पानी निकल पाता है. सरकार की नल-जल योजना, चापाकल और बोरिंग से लोगों को राहत मिलने की उम्मीद थी, पर वह भी गर्मी की पहली परीक्षा में ही फेल होती नजर आ रही हैं. ऐसे में गांव के लोग मजबूर होकर नदी के सहारे अपनी प्यास बुझा रहे हैं.

ईटीवी भारत GFX
ईटीवी भारत GFX (ETVBharat)

नदी घाट पर पानी के लिए जद्दोजहद : जमुई के इस गांव में सुबह और शाम का नजारा किसी मेले से कम नहीं होता, लेकिन यह मेला खुशियों का नहीं बल्कि पानी के लिए संघर्ष का है. महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग हाथ में बाल्टी, डिब्बा, कठौत और बर्तन लेकर नदी घाट की ओर निकल पड़ते हैं. नदी के सूखे बालू में लोग गड्ढा खोदते हैं. कुछ देर बाद उस गड्ढे में धीरे-धीरे पानी रिसकर भरता है. फिर कटोरी या छोटे बर्तन से उसे निकालकर बाल्टी में भरा जाता है. यानी हर दिन नई खुदाई, तब जाकर थोड़ी सी तृप्ति.

जहां मवेशी पीते हैं पानी, वहीं इंसान भी बुझा रहे प्यास : गांव के लोगों की बेबसी का आलम यह है कि जिस जगह नदी में मवेशी पानी पीते हैं, उसी जगह से इंसान भी पानी लेने को मजबूर हैं. 21वीं सदी के 'अमृतकाल' में यह तस्वीर कई सवाल खड़े करती है. ग्रामीणों का कहना है कि पीने का पानी, नहाना, कपड़े धोना, खाना बनाना जैसे हर काम के लिए इसी नदी का पानी सहारा बना हुआ है.

Jamui villagers digging pits for drinking water
ग्रामीण महिलाएं गढ्ढा खोदकर निकाल रही हैं पीने का पानी (ETV Bharat)

बालू खनन संकट की बड़ी वजह : ग्रामीणों का आरोप है कि नदियों से बड़े पैमाने पर हो रहे बालू का दोहन इस समस्या की बड़ी वजह है. भारी मशीनों- पोकलेन, जेसीबी और अन्य उपकरणों से मानकों के विपरीत बालू निकाले जाने से नदियों की प्राकृतिक संरचना बिगड़ गई है. इससे नदी में बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं. गर्मियों में ये गड्ढे सूख जाते हैं, लेकिन बरसात में पानी से भर जाते हैं. कई बार इन गहरे गड्ढों में डूबकर लोगों की जान भी जा चुकी है. ग्रामीणों का कहना है कि अगर इसी तरह बालू का दोहन चलता रहा तो आने वाले समय में हालात और भी भयावह हो सकते हैं.

'वोट के समय आते हैं नेता, फिर पांच साल गायब' : ग्रामीणों का दर्द साफ झलकता है. उनका कहना है कि चुनाव के समय नेता गांव में आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं और समाधान का भरोसा दिलाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सब कुछ भुला दिया जाता है. मौरा गांव के ही उदित मिश्रा ने बताया कि हम 5-6 फीट गढ्ढा खोदकर पानी पी रहे हैं. कहीं कोई सुविधा नहीं . हर साल गर्मी में चापाकल बोरिंग सब फेल कर जाता है.

Jamui villagers digging pits for drinking water
ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

''नेता जन प्रतिनिधि जब चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं. हम ग्रामीण अपनी समस्या बताते हैं, तो कहकर चले जाते हैं होगा काम, मिलेगा पानी, फिर जीतने के बाद पांच साल गांव की तरफ नहीं आते. दूसरी तरफ बेतरतीब ढंग से नदियों से बालू उठाया जा रहा है, अगर इसी तरह से बालू का उठाव होता रहा तो फिर बालू के जगह नदी में मिट्टी और घास फूस हो जाएगा पानी पिऐ बिना हमलोग मर जाऐंगे.''- उदित मिश्रा, ग्रामीण

चापाकल बोरिंग की मरम्मत का काम जल्द ही होगा : ग्रामीणों की इस समस्या को देखते हुए हमने जिलाधिकारी नवीन से बात की तो वह कहते हैं कि जैसा कि आपको भी जानकारी होगा की तीन-चार दिन पहले ही पीएचडी विभाग के द्वारा दस टीम बनाकर जमुई जिले के दसो प्रखंड में काम शुरू करवाया है. जो चापाकल बोरिंग आदि की मरम्मत का काम देख रहे हैं. साथ ही कंट्रोल रूम भी पूरी तरह से एक्टिव है.

Jamui villagers digging pits for drinking water
बच्चों के कंधों पर भी पानी की जिम्मेदारी (ETV Bharat)

''अभी आप जिस तरह की समस्या बता रहे है हमारे संज्ञान में नहीं आया है. किसी व्यक्ति के द्वारा भी इस तरह का कोई मामला नहीं लाया गया है. आपके माध्यम से जानकारी मिली है हम जांच करवा लेंगे जो भी जरूरी उपाय होंगे तत्काल किया जाऐगा.'' - नवीन कुमार, जिलाधिकारी, जमुई

गंदा पानी पीने से हो सकती है कई तरह की बीमारी : लोगों के बालू से पानी निकालकर पीने की बात जानकर चिकित्सक डॉक्टर सूर्यनन्दन ने कहा अभी भी इस तरह से लोग पानी पी रहे हैं तो ये बहुत दुखद है. चूंकि हम अगर दूषित पानी गढढे से निकालकर पीते हैं तो गंभीर बीमारियों का शिकार हो सकते हैं. क्योंकि अब नदियों का भी पहले जैसा स्तर नहीं रह गया है. दुषित पानी पीने से कई गंभीर बीमारी जैसे कोलरा (उलटी, दस्त, शरीर में पानी की कमी), टाइफाइड, फीवर, हेपिटाइटिस ए, लीवर में सूजन आदि हो सकता है.

''स्वच्छ पानी नहीं मिल पा रहा है तो, नदियों से पानी लेने पर उसे 10-15 मिनट तक गर्म कर जरूर उबाल ले फिर ढक कर रखे. पानी निकालते समय हाथ अवश्य धो ले आदि सावधानियां सतर्कता सुरक्षा का उपाय करेंगे तो गंभीर बीमारियों के शिकार होने से बचा जा सकता है.''- डॉक्टर सूर्यनन्दन, चिकित्सक

Jamui villagers digging pits for drinking water
ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

मौरा गांव में 15 हजार आबादी नदी पर निर्भर : ग्रामीणों के अनुसार इस गांव में करीब 9 हजार मतदाता हैं और कुल आबादी 15 हजार से अधिक है. इतनी बड़ी आबादी के बावजूद गांव में स्थायी पेयजल व्यवस्था नहीं है और लोग नदी के भरोसे जी रहे हैं. ग्रामीणों का कहना है कि वे वर्षों से प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से गुहार लगा रहे हैं. कई बार धरना-प्रदर्शन और आंदोलन भी किए गए, लेकिन समस्या का समाधान आज तक नहीं हो सका.

'पहले 200 फीट में मिलता था पानी, अब 600 फीट में भी नहीं' : ग्रामीण बताते हैं कि पहले गांव में 100 से 200 फीट की खुदाई में ही चापाकल से पानी निकल आता था और गर्मी में भी ज्यादा परेशानी नहीं होती थी, लेकिन अब हालात इतने खराब हो गए हैं कि 600 से 650 फीट तक बोरिंग कराने के बाद भी गर्मियों में पानी नहीं मिल पाता. गर्मी बढ़ते ही जलस्तर तेजी से नीचे चला जाता है और पूरे इलाके में पानी के लिए हाहाकार मच जाता है.

Jamui villagers digging pits for drinking water
हर दिन महिलाएं नया चुआं खोदती हैं (ETV Bharat)

बच्चों के कंधों पर भी पानी की जिम्मेदारी : गांवों में पानी लाने की जिम्मेदारी केवल बड़ों तक सीमित नहीं है. कई परिवारों में बच्चे भी सुबह-सुबह उठकर नदी से पानी लाने जाते हैं. स्कूल जाने से पहले उन्हें घंटों तक गड्ढा खोदना, पानी भरना और सिर पर बर्तन रखकर गांव तक लाना पड़ता है. इस कारण उनकी पढ़ाई और दिनचर्या भी प्रभावित हो रही है.

ग्रामीणों ने प्रशासन से नदियों से हो रहे अवैध बालू उठाव पर तत्काल रोक लगाने और गांवों में स्थायी पेयजल व्यवस्था करने की मांग की है। उनका कहना है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले दिनों में हालात इतने बिगड़ सकते हैं कि लोगों को पीने के पानी के लिए भी तरसना पड़ेगा.

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