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जो हाथ कभी बीड़ी बनाते थे, अब बना रहे हैं हर्बल गुलाल.. लोगों ने नाम दिया 'नेचर दीदी'

जमुई का सामाजिक संगठन नेचर विलेज. जहां महिलाएं बीड़ी छोड़ अब मसाले के साथ-साथ बना रहीं हर्बल गुलाल.

Jamui beedi making hands are now making herbal gulal
जमुई बीडी बनाने वाले हाथ अब बना रहे है हर्बल गुलाल (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : March 1, 2026 at 2:22 PM IST

6 Min Read
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जमुई: होली का त्योहार बस आने ही वाला है. रंग और गुलाल की डिमांड भी बढ़ने लगी है. ऐसे में मार्केट में मिलने वाले गुलाल में कई तरह के केमिकल्स मिलाएं जाते हैं, ताकि रंग चटक दिख सके. पर इसका खामियाजा आम आदमी को स्कीन एलर्जी के रूप में चुकाना पड़ता है. इससे बचने के लिए ही लोग हर्बल गुलाल को लगाना पसंद करते हैं. देश के कई हिस्सों में इन रंगों को प्रकृतिक तरह से बनाया जाता है. इन्हीं में से एक है बिहार का जमुई जिला.

बीड़ी बनाने वालीं महिलाएं बना रही हैं प्राकृतिक रंग : खास बात यह है कि इसे बनाने का काम वह महिलाएं कर रहीं हैं, जो पहले बीड़ी बनाने का काम किया करती थीं. जमुई के लक्ष्मीपुर प्रखंड में आता है, मटिया गांव. जिसे नेचर्स विलेज के नाम से जाना जाता है. यहां रहने वाली महिलाएं ही इन प्रकृतिक रंगों को बनाती हैं. जिन्हें लोग नेचर दीदी कहकर पुकारते हैं.

देखिए स्पेशल रिपोर्ट (ETV Bharat)

50 क्विंटल प्राक्तिक रंग बनाने का ऑर्डर: गांव की 10 से 15 महिलाएं पिछले 3 साल से होली के रंगों को बनाने का काम कर रही हैं. पहले साल इन सभी ने मिलकर 6 क्विंटल रंगों का उत्पादन किया था. वहीं इस साल की होली से पहले इन्हें 50 क्विंटल प्राक्तिक रंग बनाने का काम मिला है. नेचर दीदी के साथ जुड़ी महिलाएं न केवल गुलाल बल्कि सिलाई कढ़ाई, मसाले बनाने जैसे कई काम करती हैं.

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महिलाओं को 50 क्विंटल प्राक्तिक रंग बनाने का ऑर्डर (ETV Bharat)

घर बैठे महिलाएं कमा रही हैं 6 हजार रुपये: ईटीवी भारत से खास बातचीत में हर्बल गुलाल बना रही महिलाओं ने बताया कि गांव में ही घर बैठे ही काम मिल गया इससे अच्छा क्या हो सकता है. हम इस काम से महीने का 6 हजार रुपए कमा लेते हैं. पहले धरेलू काम के साथ - साथ या तो हम खाली बैठते थे या फिर बीड़ी बनाना, टोकरी, सूप आदि बनाने का काम करते थे. जिससे महज हम 50-100 रुपए प्रति दिन कमा पाते थे. जिसके लिए हमें एक दिन में 1000 बीड़ी बनानी पड़ती थी.

''हर्बल गुलाल नारंगी, बीट, गेंदा फूल, पालक, फल-फूल, साग-सब्जी, औषधिय पौधे आदि से बनाया जाता है. अभी तो होली त्यौहार को लेकर गुलाल की काफी मांग बढ़ गई है इसलिए एक महीने से ज्यादा काम करना पड़ रहा है. काम के हिसाब से नेचर दीदी की संख्या बढ़ती-घटती रहती है. ' नेचर विलेज' से जुड़ने के बाद से हमें आगे बढ़ने का मौका भी मिल रहा है.'' - मालती देवी, ग्रामीण महिला

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GFX (ETV Bharat)

परिवार में महिलाएं कर रही आर्थिक रुप से मदद : महिलाओं ने बताया कि उनमें से किसी के पति दुसरे शहर मे मजदूरी करते हैं तो कोई ऑटो चलाने का काम करता है. इतने पैसे नहीं जुट पाते कि बच्चों की पढ़ाई और घर खर्च निकल सके. पर जब से हम नेचर्स दीदी के साथ जुड़े हैं चीजें आसान हो गई हैं. इतना कमा लेते हैं कि घर परिवार चलाने में आर्थिक मदद हो जाती है.

काम करने की बढ़ने लगी है स्पीड : नेचर विलेज के संस्थापक लक्ष्मीपुर के पूर्व अंचलाधिकारी निर्भय प्रताप सिंह बताते हैं कि नेचर विलेज के तहत इन महिलाओं को पहले प्रशिक्षण दिया गया है. इनमें से कुछ महिलाओं को बाहर भेज कर प्रशिक्षित किया गया है.

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बीड़ी बनाने वालीं महिलाएं बना रही हैं प्राकृतिक रंग (ETV Bharat)

महिलाएं सिखा रही हैं एक-दूसरे को काम : निर्भय की मानें तो यहीं महिलाएं ट्रनिंग से वापस आकर अन्य महिलाओं को काम के तरीके सिखा रही हैं. शुरुआत में इनकी स्पीड काफी कम थी, लेकिन अब वह धीरे-धीरे बढ़ने लगी है. जैसे-जैसे इनकी स्पीड बढ़ेगी, प्रोडक्शन बढ़ेगा और इससे इनकी और अधिक आमदनी हो पाएगी.

''जो महिलाऐं पहले जीतोड मेहनत कर बीड़ी बनाती थी प्रत्येक दिन का मजदूरी (आमदनी) 50 रुपया भी नहीं कमा पाती थी, अब इन्हीं महिलाओं को नया नाम मिल गया है ' नेचर दीदी '. इससे उन सभी ने अपनी आमदनी को चौगुना बढ़ा लिया है. जिले के बाहर से भी आर्डर मिल रहे हैं. जल्द ही नेचर दीदी का प्रोडक्ट देश के अलग - अलग कोने में पहुंचेगा.'' - निर्भय प्रताप सिंह, पूर्व अंचलाधिकारी

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हर्बल गुलाल बनाती हुई महिलाएं (ETV Bharat)

कैसे बनाए जाते हैं प्राकृतिक रंग : महिलाओं ने बताया कि हर्बल रंग बनाने के लिए हम किसी भी प्रकार के केमिकल का प्रयोग नहीं करते हैं. गुलाल को चिकना बनाने के लिए उसमें अरारोट व मुलतानी मिट्टी पाउडर का इस्तेमाल करते हैं. फिर टेसू से संतरा रंग, पालक भाजी से हरा रंग, चुकन्दर से लाल रंग, हलदी से पिला रंग बनाया जाता है. जिसे पाउडर में मिला कर गुलाल तैयार कर लिया जाता है. गुलाल में फ्लेवर स्मेल लाने के लिए फूलों से बने सेंट का इस्तेमाल होता है.

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महिलाओं ने बनाए प्राकृतिक रंग (ETV Bharat)

कब मनाया जाएगा होली का त्योहार : होली की तारीख को लेकर लोगों में असमंजस बना हुआ है. होलिका दहन और धुलंडी की तारीख को लेकर ज्योतिषाचार्यों के अलग-अलग मत हैं. कारण है- 3 मार्च को लगने वाले चंद्रग्रहण और पूर्णिमा पर भद्रा का प्रभाव. अब सवाल है कि होलिका दहन कब होगा और रंगों की होली किस दिन खेली जाएगी? ग्राफिक में जानिए-

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GFX (ETV Bharat)

होली की मौज में सावधानी भी जरूरी : बाजारों में रंग-गुलाल, पिचकारियों और मिठाइयों की धूम मची हुई है. हालांकि होली खेलते समय कुछ सावधानियां बरतना जरूरी है. दरअसल बाजार में मिलने वाले अधिकतर रंगों में केमिकल्स और टॉक्सिक सब्सटेंस होते हैं. ये रंग बच्चों से लेकर बड़ों तक हर उम्र के लोगों के लिए नुकसानदायक हैं. इसलिए सुरक्षित और आनंददायक होली मनाने के केमिकल वाले रंगों से बचना जरूरी है. ग्राफिक में जानिए केमिकल्स से बचने के उपाय-

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