जम्मू-कश्मीर के ग्रैंड मुफ्ती ने सरकार से हिमालयी क्षेत्र में पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने की अपील की
ग्रैंड मुफ्ती फारूकी ने कहा कि हिमालय पर निर्माण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन मानवीय तबाही में बदल सकती है.

Published : August 30, 2026 at 2:24 PM IST
श्रीनगर: नेपाल में आई भयानक बाढ़ के बाद जम्मू-कश्मीर के ग्रैंड मुफ़्ती ने भारत सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार से अपील की है कि वे इस आपदा को एक गंभीर चेतावनी के तौर पर लें . साथ ही हिमालय के लिए एक व्यापक इकोलॉजिकल पॉलिसी (पारिस्थितिक नीति) शुरू करें.
जम्मू-कश्मीर के ग्रैंड मुफ़्ती नासिर-उल-इस्लाम फारूकी ने कहा कि यह नीति वैज्ञानिक आकलन, वहन-क्षमता (कैरीइंग-कैपेसिटी) के अध्ययन, जिम्मेदार विकास और जंगलों, नदियों व पहाड़ी आवासों के संरक्षण पर आधारित होनी चाहिए.
फारूक़ी ने कहा, 'नेपाल में हो रही तबाही को सिर्फ एक अलग-थलग प्राकृतिक आपदा के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. इसे सरकारों और समाज को हिमालयी क्षेत्र की पारिस्थितिक सीमाओं पर सोचने के लिए मजबूर करना चाहिए. हिमालय एक नाज़ुक जीवित तंत्र है. अवैज्ञानिक निर्माण, वनों की कटाई, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन और क्षेत्र की क्षमता (कैरिंग कैपेसिटी) की अनदेखी पारिस्थितिक तनाव को मानवीय तबाही में बदल सकती है.'
उन्होंने भारत सरकार और जम्मू-कश्मीर सरकार से आग्रह किया कि वे इसे एक गंभीर चेतावनी के तौर पर लें और हिमालय के लिए एक व्यापक इकोलॉजिकल पॉलिसी (पर्यावरण नीति) शुरू करें. उन्होंने कहा, 'हिमालय में जो कुछ भी होता है, कश्मीर उससे बेपरवाह नहीं रह सकता. हमारा पर्यावरण, जल-प्रणाली और आजीविका इन पहाड़ों की सेहत से गहराई से जुड़े हुए हैं.'
उन्होंने कहा कि विकास जरूरी है, लेकिन ऐसा विकास जो पर्यावरण के आधार को ही नष्ट कर दे, वह अंततः तबाही का कारण बनता है. उन्होंने कहा, 'प्रकृति हमेशा समझौता नहीं करती. जब चेतावनियों को नजरअंदाज किया जाता है, तो प्रकृति नतीजों के जरिए जवाब देती है.'
नेपाल के रसुवा में भोटे कोशी नदी में आई जानलेवा अचानक बाढ़ के कुछ दिनों बाद, रविवार को नेपाल की ओर से जारी ताज़ा जानकारी के अनुसार नेपाल और तिब्बत में मरने वालों की कुल संख्या 750 हो गई है और 3,000 से ज़्यादा लोग लापता हैं.
फारूकी से पहले जम्मू-कश्मीर के मुख्य धर्मगुरु मीरवाइज उमर फारूक ने श्रीनगर की जामिया मस्जिद में शुक्रवार के साप्ताहिक उपदेश के दौरान नेपाल में आई बाढ़ का ज़िक्र करते हुए कहा कि यह पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए एक चेतावनी है, जिसका एक हिस्सा जम्मू-कश्मीर भी है.
मीरवाइज ने राजौरी, पुंछ, किश्तवाड़ और जम्मू-कश्मीर के अन्य हिस्सों में हाल ही में हुए बादल फटने, जमीन खिसकने और अचानक आई बाढ़ का जिक्र करते हुए कहा कि ये आपदाएं जलवायु परिवर्तन की वजह से हो रही हैं.
जुलाई में कई दिनों तक हुई भारी बारिश के बाद राजौरी और पुंछ में अचानक आई बाढ़ और जमीन खिसकने की घटनाओं में 30 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई. जुलाई के दौरान जम्मू-कश्मीर के अन्य ज़िलों में भी अचानक बाढ़ और जमीन खिसकने की घटनाएं हुई, जिनसे संपत्ति, फसलों और सेब के बागों को भारी नुकसान पहुंचा और करोड़ों रुपये का नुकसान हुआ.
उन्होंने कहा, 'कश्मीर खूबसूरत पहाड़ों, जंगलों, झीलों और जलाशयों से समृद्ध है. पर्यटन हमारी अर्थव्यवस्था में योगदान देता है. लेकिन पर्यावरण विनाश के कगार पर है. विशेषज्ञ टिकाऊ विकास और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने का सुझाव देते हैं.
पहाड़ों के भीतर तक सड़कें बनाई जा रही हैं, निर्माण कार्य के लिए जंगल काटे जा रहे हैं, और पहलगाम जैसी जगहों पर होटलों का अंधाधुंध निर्माण और अवैध निर्माण हमें विनाश की ओर ले जा रहे हैं.' मीरवाइज ने नीति-निर्माताओं से आग्रह किया कि वे पारिस्थितिक और आर्थिक संतुलन बनाए रखें और केवल पर्यटन के लिए कश्मीर का 'शोषण न करें'.
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