ETV Bharat / bharat

सेना और ठेकेदार के बीच बंकर निर्माण का भुगतान विवाद: जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने नियुक्त किया आर्बिट्रेटर

यह विवाद अखनूर की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी और रक्षा मंत्रालय के बीच है. करीब 17 साल पहले बनाये गये बंकर से जुड़ा मामला है.

Jammu Kashmir High Court
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट. (ETV bharat)
author img

By Muhammad Zulqarnain Zulfi

Published : February 28, 2026 at 3:17 PM IST

6 Min Read
Choose ETV Bharat

श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाई कोर्ट ने एक पुरानी कानूनी लड़ाई को सुलझाने के लिए एक 'आर्बिट्रेटर' (मध्यस्थ) नियुक्त किया है. यह विवाद अखनूर की एक कंस्ट्रक्शन कंपनी और रक्षा मंत्रालय के बीच है. मामला करीब 17 साल पहले बनाये गये बंकर के एक प्रोजेक्ट के बकाया भुगतान और दावों से जुड़ा है. जस्टिस रजनेश ओसवाल ने कहा कि जब सरकारी अधिकारियों ने ठेकेदार की बात नहीं सुनी, तो मध्यस्थ नियुक्त करना जरूरी हो गया.

यह पूरा विवाद साल 2006 में 'मेसर्स शर्मा कंस्ट्रक्शन कंपनी' को मिले एक कॉन्ट्रैक्ट से शुरू हुआ था. इस कंपनी के पार्टनर 76 वर्षीय मांगू राम शर्मा हैं. इस मामले में केंद्र सरकार, रक्षा मंत्रालय और सेना के इंजीनियरिंग विभाग के बड़े अधिकारियों को पक्ष बनाया गया है.

याचिका के अनुसार, उधमपुर जोन के इंजीनियरिंग अधिकारियों ने 30 अक्टूबर 2006 को एक पत्र के जरिए इस ठेकेदार को सुंदरबनी में 10 बंकर, एक गोला-बारूद शेड और अन्य निर्माण कार्य सौंपे थे. कंपनी का दावा है कि उसने 23 मई 2009 को तय समय के भीतर काम पूरा कर लिया था. 29 मई 2009 को अखनूर के गैरिसन इंजीनियर से काम पूरा होने का सर्टिफिकेट भी प्राप्त कर लिया था.

ठेकेदार का आरोप है कि बार-बार अनुरोध करने के बावजूद विभाग ने फाइनल बिल तैयार करने के लिए जरूरी दस्तावेज और माप उपलब्ध नहीं कराए. मामला 2010 में तब उलझ गया जब प्रोजेक्ट के दौरान बनाई गई एक सुरक्षा दीवार गिर गई. इस घटना की जांच के लिए विभाग द्वारा एक 'कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी' (जांच समिति) बिठाई गई थी.

ठेकेदार का पक्ष था कि दीवार विभाग द्वारा दिए गए गलत डिजाइन की वजह से गिरी थी. उन्होंने यह भी कहा कि निर्माण के हर चरण की जांच इंचार्ज इंजीनियर द्वारा की गई थी और उन्होंने ही इसे मंजूरी दी थी. जब जांच चल रही थी, तब भी कंपनी बार-बार अपना फाइनल बिल पास करने और भुगतान व फिक्स्ड डिपॉजिट रसीदें वापस करने की मांग करती रही.

याचिका में कहा गया है कि जांच में अंततः ठेकेदार के खिलाफ कोई भी गलत बात नहीं पाई गई. इसके बाद, कंपनी ने जुलाई 2019 में एक नोटिस जारी कर अपने पैसे मांगे और चेतावनी दी कि यदि बकाया भुगतान नहीं किया गया, तो वे 'आर्बिट्रेशन' (मध्यस्थता) का सहारा लेंगे. जब कोई जवाब नहीं मिला, तो फरवरी 2020 में उन्होंने अनुबंध की शर्तों के तहत औपचारिक रूप से मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करने की मांग की.

इसके बावजूद, अधिकारियों ने कोई मध्यस्थ नियुक्त नहीं किया. इसके उलट, मई 2021 में अधिकारियों का एक बोर्ड बनाया गया ताकि खराब काम के आधार पर नुकसान का आकलन किया जा सके. ठेकेदार ने इस कदम का विरोध किया और इसे 'उत्पीड़न' बताया. जून 2022 में विभाग ने मध्यस्थ की नियुक्ति की मांग को खारिज कर दिया. तर्क दिया कि यह दावा समय सीमा से बाहर हो चुका है और ठेकेदार ने बिना किसी विरोध के फाइनल बिल पर हस्ताक्षर किए थे.

कोर्ट में रक्षा अधिकारियों ने तर्क दिया कि अप्रैल 2023 में दायर की गई यह याचिका कानूनी समय सीमा के खिलाफ है, क्योंकि विवाद की वजह तो 2009 में काम पूरा होने और 2010 में बिल भुगतान के समय ही पैदा हो गई थी. उन्होंने यह भी कहा कि ठेकेदार ने 2019 में एक "नो क्लेम सर्टिफिकेट" और एक शपथ पत्र दिया था कि वह देरी से होने वाले भुगतान पर कोई ब्याज नहीं मांगेगा.

सरकार ने आगे आरोप लगाया कि दीवार घटिया काम और खराब सामग्री की वजह से गिरी थी. उन्होंने बताया कि बोर्ड ऑफ ऑफिसर्स की जांच के आधार पर ठेकेदार से 41.51 लाख रुपये की वसूली का प्रस्ताव रखा गया है.

जस्टिस ओसवाल ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि मध्यस्थता की प्रक्रिया जुलाई 2019 में शुरू हुई थी. उन्होंने स्पष्ट किया कि उस समय की गई बातचीत केवल भुगतान की मांग थी. कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "महत्वपूर्ण बात यह है कि 26 जुलाई 2019 के पत्र में दावों को मध्यस्थ के पास भेजने का कोई वास्तविक अनुरोध नहीं किया गया था; याचिकाकर्ता ने औपचारिक रूप से मध्यस्थता की शर्त का उपयोग 19 फरवरी 2020 को भेजे गए पत्र के माध्यम से ही किया."

समय सीमा के मुद्दे पर कोर्ट ने गौर किया कि सरकारी अधिकारियों ने यह साफ नहीं किया था कि उन्हें मध्यस्थता का नोटिस असल में किस तारीख को मिला. फैसले में आगे कहा गया, "यह जानकारी न देना अहम है, क्योंकि 'आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996' की धारा 11(6) के तहत याचिका दायर करने की समय सीमा, नोटिस मिलने के 30 दिन बीत जाने के बाद ही शुरू होती है."

अदालत ने यह भी कहा कि अगर समय की गणना फरवरी 2020 से भी की जाए, तो वह दौर कोविड-19 महामारी का था. उस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी समय सीमा की गिनती में कुछ समय की छूट दी थी.

जस्टिस ओसवाल ने कहा, "उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए, इस न्यायालय का यह मानना है कि एक वैध मध्यस्थता समझौते की मौजूदगी और उचित नोटिस के बावजूद अधिकारियों द्वारा मध्यस्थ नियुक्त न किए जाने के कारण, 'आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996' की धारा 11(6) के तहत सभी कानूनी आवश्यकताएं पूरी होती हैं."

अदालत ने आगे कहा कि दोनों पक्षों के बीच का विवाद सीधे तौर पर कॉन्ट्रैक्ट को लागू करने से जुड़ा है और इसे मध्यस्थता के जरिए सुलझाया जा सकता है. कोर्ट ने जम्मू के ग्रेटर कैलाश में रहने वाले सतीश चंद्र (रिटायर्ड एडिशनल डायरेक्टर जनरल, मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज) को दोनों पक्षों के दावों और जवाबी दावों के निपटारे के लिए एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया है.

इसे भी पढ़ेंः