जम्मू-कश्मीर के हजारों शिक्षकों पर TET की तलवार! क्या 'अनुच्छेद 370' का हटना है असली वजह?
जम्मू-कश्मीर की शिक्षा मंत्री का मानना है कि कैबिनेट की मंजूरी के बाद सुप्रीम कोर्ट में समीक्षा याचिका दायर की जा सकती है.


Published : February 27, 2026 at 8:20 PM IST
श्रीनगरः जम्मू-कश्मीर में तीन महीने की लंबी सर्दियों की छुट्टियों के बाद, प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल 2 मार्च से खुलने वाले हैं. लेकिन, कक्षाओं में रौनक लौटने से कुछ दिन पहले ही स्कूल परिसरों में सन्नाटा और बेचैनी पसरी हुई है. अधिकारियों द्वारा शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) अनिवार्य करने पर विचार किए जाने के बाद से शिक्षकों के बीच चिंता और तनाव का माहौल है. जिससे स्कूलों के दोबारा खुलने पर अनिश्चितता के बादल छा गए हैं.
जम्मू-कश्मीर टीचर्स फोरम के वरिष्ठ शिक्षक और मुख्य प्रवक्ता अरलान हबीब ने कहा, "इस समय हमें छात्रों के स्वागत की तैयारी और लेसन प्लान तैयार करने में जुटे होना चाहिए था. लेकिन दुर्भाग्य से, हम भविष्य को लेकर अनिश्चितता के बीच फंसे हुए हैं. नौकरी खत्म होने के आसन्न खतरे ने शिक्षकों को मानसिक सदमा पहुंचाया है, क्योंकि उन्हें डर है कि एक ही परीक्षा में अयोग्य घोषित होने पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है. यह उनकी वर्षों की सेवा पर सवाल खड़े करेगा और समाज में उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाएगा."
यह घटनाक्रम जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा 23 फरवरी को जारी उस आदेश के बाद आया, जिसमें नए और पुराने दोनों तरह के शिक्षकों के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) आयोजित करने हेतु एक नोडल एजेंसी नामित की गई थी. जम्मू-कश्मीर स्कूल शिक्षा बोर्ड (JKBOSE) इस परीक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने के लिए 'राष्ट्रीय शिक्षक शिक्षा परिषद' (NCTE) के दिशा-निर्देशों का पालन कर रहा था. सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार इस परीक्षा की प्रक्रिया को दो साल के भीतर पूरा किया जाना तय था.
सितंबर 2025 में, सुप्रीम कोर्ट ने कक्षा 1 से 8 तक के सभी शिक्षकों के लिए दो साल के भीतर TET पास करना अनिवार्य कर दिया था. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला उन शिक्षकों पर भी लागू होता है जिनकी नियुक्ति 2011 में TET अनिवार्य होने से पहले हुई थी. इसका सीधा मतलब यह है कि देश भर के प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में कार्यरत लाखों शिक्षकों को अपनी नौकरी बचाने के लिए यह परीक्षा पास करनी होगी.
आदेश के अनुसार, इसका पालन न करने पर शिक्षकों को सेवा लाभ के साथ अनिवार्य सेवानिवृत्ति दे दी जाएगी. केवल वे शिक्षक, जिनकी सेवानिवृत्ति में पांच साल से कम का समय बचा है, उन्हें यह परीक्षा देने से छूट दी गई है. हालांकि, बिना TET पास किए वे पदोन्नति के पात्र नहीं होंगे. सभी नए उम्मीदवारों के लिए भी TET एक अनिवार्य शर्त होगी.
देश के अन्य हिस्सों की तरह, जम्मू-कश्मीर में भी इस फैसले से खलबली मच गई. शिक्षकों और राजनीतिक विपक्ष द्वारा इसे रद्द करने की मांग के कारण सरकार को बीच में ही अपना रुख बदलना पड़ा. शिक्षा मंत्री सकीना इटू ने कहा, "जब इसे पूरे भारत में लागू किया जाएगा, तो जम्मू-कश्मीर इसे लागू करने वाला आखिरी राज्य होगा."
यह जानकारी सामने आई है कि शिक्षा विभाग ने JKBOSE के साथ मिलकर संबंधित मंत्री की 'मंजूरी' लिए बिना ही नोडल एजेंसी नामित करने का काम अपने स्तर पर कर लिया था.
लेकिन पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और विधायक सज्जाद लोन इसे हल्के में नहीं ले रहे हैं. उन्होंने सरकार से TET पर स्थिति साफ करने को कहा और सरकार पर जनता को गुमराह करने का आरोप लगाया. उन्होंने सरकार के विरोधाभासी रुख पर निशाना साधते हुए पूछा- "क्या सरकार ने कल झूठ बोला था? या उन्हें पता ही नहीं है कि किस फाइल पर हस्ताक्षर किए जा रहे हैं?"
जम्मू-कश्मीर में शिक्षक सबसे बड़ा कार्यबल हैं, जहां कुल 77,000 से अधिक शिक्षक (60,000 से अधिक रहबर-ए-तालीम शिक्षकों को छोड़कर) 14 लाख से ज्यादा छात्रों को पढ़ा रहे हैं. हालांकि, आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, शिक्षकों के करीब 13,000 पद खाली हैं, जिनमें जम्मू में 7,985 और कश्मीर में 4,992 रिक्तियां शामिल हैं.
शिक्षक इस TET (शिक्षक पात्रता परीक्षा) को अपने खिलाफ एक अनुचित कदम मान रहे हैं, क्योंकि उनकी नियुक्ति के समय उन्होंने सभी जरूरी योग्यताएं पूरी की थीं. कानूनी नजरिए से, जावेद अहमद नामक एक शिक्षक का तर्क है कि 'शिक्षा का अधिकार' (RTE), जो 2010 में पूरे भारत में लागू हुआ था, जम्मू-कश्मीर में अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 हटने और केंद्रीय कानूनों के विस्तार के बाद ही लागू हुआ है.
इससे पहले, जम्मू-कश्मीर में शिक्षकों और रहबर-ए-तालीम (ReT) की भर्ती 'जम्मू-कश्मीर शिक्षा अधीनस्थ सेवा भर्ती नियमों' और अन्य राज्य-विशिष्ट सेवा नियमों द्वारा संचालित होती थी, जिनमें TET को अनिवार्य योग्यता नहीं माना गया था.
जम्मू-कश्मीर जनरल लाइन टीचर्स फोरम के अध्यक्ष अनवर हुसैन वानी ने कहा, "जम्मू-कश्मीर के विशिष्ट भर्ती ढांचे और प्रशिक्षण पहलों पर विचार किए बिना एक समान आवश्यकता लागू करना, केंद्र शासित प्रदेश की वास्तविक और प्रशासनिक स्थिति को पूरी तरह से नहीं दर्शाता." उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि वह क्षेत्र में अपनाई गई अलग भर्ती प्रक्रिया और प्रशिक्षण ढांचे का हवाला देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक पुनर्विचार याचिका दायर करने की संभावना तलाशे.
जेएंडके रहबर-ए-तालीम टीचर्स फोरम के चेयरमैन फारूक टांत्रे ने कहा, "नौकरी से निकाला जाना हमारी सबसे बड़ी चिंता है. इसके गंभीर सामाजिक परिणाम होंगे, क्योंकि 50 साल की उम्र तक पहुंच चुके व्यक्ति को नौकरी से बाहर फेंकना गलत होगा."
शिक्षा मंत्री सकीना इटू भी शिक्षकों की बात से सहमत हैं. उनका मानना है कि दशकों तक पढ़ाने के बाद शिक्षकों को अपनी योग्यता साबित करने के लिए मजबूर करना उनके लिए एक 'अपमान' जैसा है.
उन्होंने ETV भारत से कहा, "जो लोग दशकों से परीक्षाएं आयोजित करवा रहे हैं, अब उनसे परीक्षा में बैठने को कहा जा रहा है. यह बहुत अपमानजनक है. हम इस मुद्दे को कैबिनेट में रखेंगे और आगे की कार्रवाई तय करेंगे. इसमें इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दायर करना भी शामिल हो सकता है. साथ ही, हम यह भी देखेंगे कि अन्य राज्य इस मुद्दे को कैसे सुलझाते हैं."
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