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जनगणना 2027: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में 16 साल का इंतजार खत्म, डिजिटल होगी पूरी प्रक्रिया

श्रीनगर और जम्मू के आसपास तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा से सटे गांवों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

Jammu and Kashmir
शुक्रवार, 9 जनवरी को जम्मू और कश्मीर के अनंतनाग जिले में घाटी में शीत लहर के दौरान भारी पाले और बर्फ की चादर के बीच एक आदमी एक इमारत से लटके बर्फ के टुकड़ों के पास से गुज़रता हुआ. (PTI)
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By Muhammad Zulqarnain Zulfi

Published : January 9, 2026 at 6:39 PM IST

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श्रीनगर: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख लंबे समय से प्रतीक्षित 'राष्ट्रीय जनगणना' के लिए तैयार हो रहे हैं. केंद्र सरकार जनगणना 2027 की प्रक्रिया को आगे बढ़ा रही है. अधिकारियों का कहना है कि यह प्रक्रिया दोनों केंद्र शासित प्रदेशों में शासन, योजना और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए बेहद महत्वपूर्ण होगी.

जम्मू-कश्मीर में जिला प्रशासनों के समन्वय के साथ प्रारंभिक कार्य जल्द ही शुरू होने की उम्मीद है. इसमें नक्शों को अपडेट करना, गणना ब्लॉकों को फिर से परिभाषित करना और फील्ड स्टाफ को प्रशिक्षण देना शामिल होगा. अधिकारियों ने कहा कि श्रीनगर और जम्मू के आसपास तेजी से बढ़ते शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा (IB) से सटे गांवों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा.

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जनगणना का विशेष महत्व

आखिरी देशव्यापी जनगणना 2011 में हुई थी. 2021 की जनगणना को कोविड-19 महामारी के कारण स्थगित कर दिया गया था और इसे कभी दोबारा शुरू नहीं किया गया, जिससे दोनों क्षेत्रों के पास पिछले लगभग डेढ़ दशक से कोई अपडेटेड जनसांख्यिकीय डेटा नहीं है.

अधिकारियों का कहना है कि जनसंख्या के नए आंकड़ों के अभाव में कल्याणकारी योजनाओं की प्लानिंग, बुनियादी ढांचे के विकास (इंफ्रास्ट्रक्चर), शहरी नियोजन और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी नीतियों को लागू करना काफी जटिल हो गया है.

नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया, "जम्मू-कश्मीर के लिए अपडेटेड जनगणना बहुत जरूरी है, खासकर हाल के वर्षों में हुए बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक बदलावों के बाद। इससे नीति-निर्माताओं को जमीनी स्तर पर जनसांख्यिकीय और सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं की एक स्पष्ट तस्वीर मिल सकेगी."

जम्मू और कश्मीर को 2019 में एक केंद्र शासित प्रदेश के रूप में पुनर्गठित किया गया था, जबकि लद्दाख को एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था. तब से, दोनों क्षेत्रों में शासन, प्रवासन (माइग्रेशन) पैटर्न, पर्यटन गतिविधियों और आर्थिक गतिशीलता में बदलाव के साथ-साथ बड़े प्रशासनिक बदलाव हुए हैं.

राजनीतिक दलों ने किया स्वागत

नेशनल कॉन्फ्रेंस के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने कहा कि जनगणना से लंबे समय से बनी हुई अस्पष्टता को दूर करने में मदद मिलेगी. उन्होंने कहा, "यह महत्वपूर्ण है और इससे कई भ्रम दूर होंगे. इससे सभी क्षेत्रों की जनसंख्या का अनुपात पता चलेगा और सरकार को उसी के अनुसार नीतियां बनाने में मदद मिलेगी."

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद चौधरी लाल सिंह ने कहा कि यह अभ्यास काफी समय से लंबित था. उन्होंने कहा, "यह प्रक्रिया बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे जनसंख्या वृद्धि, जाति, धर्म और क्षेत्रीय बनावट के बारे में स्पष्ट जानकारी मिलेगी. इससे फंड का आवंटन और यहां तक कि संसदीय व विधानसभा सीटों की जरूरत भी स्पष्ट हो जाएगी. देरी से ही सही, लेकिन यह एक स्वागत योग्य कदम है, बशर्ते यह पारदर्शी और निष्पक्ष हो."

पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के विधायक वहीद उर रहमान पारा ने भी इस प्रक्रिया की आवश्यकता पर जोर दिया. उन्होंने कहा, "जनगणना लंबित है और इसकी बहुत जरूरत है. हमें उम्मीद है कि इसे वैज्ञानिक तरीके से और लोगों के हित में किया जाएगा."

भाजपा विधायक रणबीर सिंह पठानिया ने कहा, "जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में जनगणना का कार्यक्रम राष्ट्रीय जनगणना चक्र के साथ पूरी तरह तालमेल में होना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि यह क्षेत्र अब पूरी तरह से राष्ट्रीय मुख्यधारा में एकीकृत हो चुका है." उन्होंने आगे कहा, "अलग, देरी से होने वाले और राजनीति से प्रेरित डेटा संग्रह के दिन अब खत्म हो गए हैं. यह 'एक राष्ट्र, एक कानून, एक डेटा' का नया सामान्य दौर है."

भाजपा प्रवक्ता मंजूर भट ने कहा कि जनगणना भविष्य के शासन को आकार देने में मदद करेगी. उन्होंने कहा, "इतने वर्षों के बाद यह पहली बार हो रहा है. इससे जाति-आधारित जनसंख्या का अनुपात पता चलेगा और प्रत्येक समूह के लिए उसी के अनुसार नीतियां बनाई जा सकेंगी. बजट भी जनसंख्या के आधार पर तय किया जा सकेगा.

लद्दाख में प्रशासनिक तैयारियां शुरू

लद्दाख की कड़ाके की ठंड और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण, यहां और अन्य बर्फबारी वाले क्षेत्रों में गणना (enumeration) का कार्य देश के बाकी हिस्सों की तुलना में जल्दी शुरू होने की उम्मीद है. ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि दूरदराज के गांवों और खानाबदोश समुदायों की सटीक गिनती सुनिश्चित की जा सके.

अधिकारियों ने बताया कि उपराज्यपाल ने हाल ही में भारत के महापंजीयक और जनगणना आयुक्त (Registrar General and Census Commissioner of India) के साथ इस ऊंचाई वाले क्षेत्र की अनूठी लॉजिस्टिक चुनौतियों के समाधान के लिए चर्चा की. यह बातचीत विशेष रूप से दूरदराज और बर्फ से ढके क्षेत्रों के लिए कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और परिचालन योजना पर केंद्रित रही.

डिजिटल जनगणना भी होगी

जनगणना 2027 भारत की पहली पूरी तरह से डिजिटल जनगणना भी होगी. अधिकारियों की योजना डेटा इकट्ठा करने के लिए मोबाइल एप्लिकेशन और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग करने की है. इसके साथ ही, प्रगणकों (गणनकर्ताओं) के फील्ड दौरे से पहले परिवारों को एक सीमित समय सीमा के भीतर स्वयं गणना (self-enumeration) करने का विकल्प भी दिया जाएगा.

अधिकारियों का मानना है कि इस डिजिटल बदलाव से जम्मू-कश्मीर के शहरी क्षेत्रों में कार्यकुशलता और सटीकता में सुधार होगा, साथ ही दूरदराज के इलाकों में आने वाली व्यावहारिक चुनौतियों को कम करने में भी मदद मिलेगी.

जनगणना 2027 के बारे में जानें

गृह मंत्रालय ने घोषणा की है कि जनगणना 2027 के पहले चरण के रूप में 'मकानों की सूची बनाने' (हाउस-लिस्टिंग) और 'आवासीय जनगणना' का कार्य 1 अप्रैल से 30 सितंबर, 2026 के बीच किया जाएगा. सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस निर्धारित समय सीमा के भीतर 30 दिनों की अवधि तक यह अभ्यास (एक्सरसाइज) करेंगे.

शुरुआती चरण में परिवारों, रहने की स्थितियों, सुविधाओं और संपत्तियों के बारे में विस्तृत जानकारी जुटाई जाएगी. यह डेटा 2027 के लिए निर्धारित पूरी जनसंख्या गणना का आधार बनेगा.

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