देहरादून में 70 सालों से यूपी का जायसवाल परिवार होली में घोल रहा खुशियों के रंग, डिमांड में भगवा गुलाल
उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ का रहने वाला जायसवाल परिवार, दून में पिछले 70 सालों से तैयार कर रहा है गुलाल, भगवा गुलाल की ज्यादा डिमांड.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 26, 2026 at 10:39 PM IST
रोहित कुमार सोनी
देहरादून: होली पर्व में अब महज एक हफ्ते का ही वक्त बचा है. ऐसे में गुलाल और रंगों से जुड़े व्यापारियों ने अपनी तैयारियां तेज कर दी है. मुख्य रूप से देहरादून के झंडेवाला मार्केट के पास मौजूद ग्राउंड में उत्तर प्रदेश का एक परिवार पिछले 70 सालों से गुलाल तैयार कर रहा है. खास बात यह है कि ये गुलाल पूरी तरह से ऑर्गेनिक है. क्योंकि इसको अरारोट और मिठाई बनाने वाले रंग का इस्तेमाल कर बनाया जा रहा है. हालांकि, वर्तमान समय में भगवा रंग के गुलाल की डिमांड काफी अधिक देखी जा रही है और व्यापारियों का भी मानना है कि भाजपा सरकार के आने के बाद भगवा गुलाल की डिमांड काफी अधिक बढ़ गई है.
रंगों का पर्व होली त्योहार के नजदीक आते ही बाजारों में रंगों की रौनक छा गई है. दुकानों में तरह-तरह के चमचमाते रंग सजे हैं, लेकिन इनमें से कई रासायनिक रंग, होली में खलल डाल सकते हैं. साथ ही स्किन संबंधित बीमारियों को पैदा कर सकते हैं, लेकिन ये होली का पर्व सभी के लिए सुरक्षित हो, इसके लिए उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ का रहने वाला जायसवाल परिवार देहरादून के झंडे जी दरबार साहिब के पास पिछले 70 सालों से हर्बल गुलाल बना रहा है.
यह परिवार खाद्य पदार्थों में मिलाने वाले रंगों और अरारोट को मिलाकर, कुल 8 रंगों में गुलाल तैयार कर रहा है. जिससे न तो चर्म रोग होता है और न ही पेट में चले जाने से भी कोई बीमारी या दिक्कत होती है. प्रतापगढ़ के रहने वाले इस जयसवाल परिवार के दादाजी ने इस व्यवसाय की शुरू की थी, जिसके बाद से ही परिवार ये व्यवसाय पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ा रहा है.

वर्तमान समय में तीसरी पीढ़ी इस काम को कर रही है. हर साल शिवरात्रि के पांचवें दिन, ये परिवार देहरादून आ जाता है और झंडे जी मेला संपन्न होने के बाद वापस लौट जाता है. इस दौरान वो होली पर्व के लिए न सिर्फ रंग बिरंगे गुलाल बनाते हैं बल्कि ऑर्गेनिक सिंदूर भी बनाते हैं. ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए पवन जायसवाल ने कहा कि, उनके पिता पिछले 60-65 सालों से गुलाल और सिंदूर बनाने का काम कर हैं.

गुलाल बनाने के लिए शुद्ध अरारोट और खाने वाले रंग का इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि इसका इस्तेमाल खाद्य पदार्थों को बनाने में भी किया जाता है. वो हर साल 8 रंग का गुलाल बनाते हैं. शुद्ध अरारोट में खाने वाला रंग मिलाकर उसमें थोड़ा सा पानी मिलाया जाता है, उसके बाद फिर इसको छानना जाता है. इसके बाद उसे सुखाया जाता है और फिर बोरे में भर दिया जाता है.

"साल दर साल उनकी ओर से बनाए जा रहे गुलाल की डिमांड बढ़ती जा रही है. खास बात यह की हर साल दो से चार बोरी अधिक गुलाल की बिक्री होती है. वो 8 रंग का गुलाल तैयार करते हैं, हर रंग के गुलाल की बिक्री होती है. लेकिन जब से भाजपा की सरकार आई है उसके बाद से ही भगवा रंग के गुलाल की डिमांड काफी अधिक बढ़ गई है."- पवन जायसवाल, गुलाल बनाने वाले व्यापारी
"गुलाल बनाने में काफी अधिक मेहनत करनी पड़ती है. क्योंकि गुलाल बनाने के लिए सबसे मेहनत का काम छानने का होता है. क्योंकि एक बोरा गुलाल तैयार करने के लिए उसको छानने में करीब तीन से चार घंटे का समय लगता है."- राजाराम, गुलाल बनाने वाले व्यापारी
ईटीवी भारत से बातचीत करते हुए जयप्रकाश जायसवाल ने कहा कि,
"देहरादून में पिछले 72-75 सालों से गुलाल बनाने का काम उनका परिवार कर रहा है. गुलाल ऑर्गेनिक होने की वजह से साल दर साल उनके गुलाल की डिमांड बढ़ती जा रही है. डिमांड के अनुसार वो 8 अलग-अलग रंग के गुलाल को बनाते हैं, लेकिन वर्तमान समय में भगवा रंग के गुलाल की डिमांड काफी अधिक है.-जयप्रकाश जायसवाल, गुलाल बनाने वाले व्यापारी
"पिछले 7- 8 सालों से भगवा रंग के गुलाल की काफी अधिक बिक्री हो रही है. साथ ही बताया कि शिवरात्रि के पांचवें दिन वो देहरादून पहुंच जाते हैं. पहले लगभग 5 से 6 बोरी गुलाल ही तैयार करते थे, लेकिन डिमांड बढ़ने की वजह से अब करीब 20 बोरी गुलाल तैयार कर रहे हैं." -जयप्रकाश जायसवाल, गुलाल बनाने वाले व्यापारी
जयप्रकाश ने बताया कि अरारोट उन्हें देहरादून में ही मिल जाता है, लेकिन खाने वाला रंग वो प्रतापगढ़ से ही अपने साथ लेकर आते हैं. उत्तराखंड में हर्बल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है. साथ ही राज्य सरकार पर्यावरण-अनुकूल होली को बढ़ावा दे रही है. पिछले साल देहरादून नगर निगम ने केमिकल-मुक्त रंगों पर अभियान भी चलाया था.

ताकि, होली पर्व के दौरान रासायनिक रंगों के इस्तेमाल से त्वचा और स्वास्थ्य को होने वाले नुकसान से बचा जा सके, लेकिन पिछले 6-7 साल से भगवा गुलाल की मांग बढ़ने की वजह भाजपा सरकार के आने के बाद इसे राजनीतिक रंग से जोड़कर देखा जा रहा है. बहरहाल, जयसवाल परिवार का कहना है कि यह धार्मिक महत्व का रंग है, यही वजह है कि इसकी डिमांड बढ़ती जा रही है.
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