उत्तराखंड कृषि विभाग में ड्रोन फर्जीवाड़े से हड़कंप, करोड़ों के खेल में एक क्लर्क पर गिरी गाज!
सुर्खियों में कृषि विभाग में ड्रोन खरीद से जुड़ा कथित फर्जीवाड़ा, महाराष्ट्र की फर्म से वसूली गई मोटी रकम, जानिए मामला? रिपोर्ट- नवीन उनियाल

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : June 29, 2026 at 7:58 PM IST
देहरादून: उत्तराखंड में किसानों को तकनीक से जोड़ने के लिए ड्रोन खरीद का एक अनुबंध चर्चाओं में है. खबर है कि ठीक एक साल पहले कृषि विभाग में ये फर्जीवाड़ा किया गया, जिसमें महाराष्ट्र की एक निजी फर्म से मोटी रकम वसूली गई. हैरत की बात ये है कि एक साल बाद जाकर मामले में जांच बैठाई गई है. अब तत्कालीन निदेशक पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है. मामले का खुलासा तब हुआ, जब फर्म ने कृषि मंत्री से शिकायत कर डाली. ईटीवी भारत पर जानिए क्या है ये पूरा मामला?
उत्तराखंड में किसानों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने और खेती को नई उड़ान देने के लिए ड्रोन का सपना दिखाया गया था, लेकिन अब सवाल यह उठ रहे हैं कि कहीं किसानों को आसमान दिखाने के नाम पर कुछ लोगों ने खुद ही उड़ान तो नहीं भर ली? दरअसल, कृषि विभाग में ड्रोन खरीद से जुड़ा एक कथित फर्जीवाड़ा इन दिनों चर्चाओं में है और इसने विभागीय गलियारों में हड़कंप मचा दिया है.
किसानों के लिए ड्रोन खरीदने की थी योजना: महाराष्ट्र की जिस निजी फर्म से रकम वसूली गई उसके प्रतिनिधि शेषाद्रि विश्वनाथन ने कृषि विभाग को भेजे एक शपथ पत्र के जरिए ड्रोन आपूर्ति के संबंध में आरोप लगाया है. आरोप है कि करीब एक साल पहले किसानों के लिए ड्रोन खरीदने के नाम पर उनकी फर्म से करीब डेढ़ करोड़ रुपए की रकम वसूली गई. दिलचस्प बात ये है कि जिस योजना का उद्देश्य खेतों में तकनीक पहुंचाना था, उसकी फाइलें कुछ कमरों तक ही सीमित रह गईं और ड्रोन किसानों के खेतों तक पहुंचने से पहले ही पूरा मामला हवा में उड़ गया.

करीब 250 ड्रोन खरीदने पर बनी थी सहमति: आरोप है कि कृषि विभाग में ड्रोन खरीद को लेकर एक समझौता ज्ञापन यानी एमओयू तैयार किया गया. इस दौरान संबंधित फर्म को भरोसा दिलाया गया कि विभाग की ओर से बड़ी संख्या में ड्रोन खरीदे जाएंगे. बताया जा रहा है कि करीब 250 ड्रोन खरीदने पर सहमति बनी थी.
मामला उस समय का बताया जा रहा है, जब कृषि विभाग की कमान तत्कालीन निदेशक केसी पाठक के हाथों में थी. उस दौर में कृषि क्षेत्र को तकनीक से जोड़ने, आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल और स्मार्ट खेती जैसे कई बड़े विचारों पर काम होने की बातें सामने आ रही थीं. इसी बीच महाराष्ट्र की फर्म ने ड्रोन आधारित कृषि सेवाओं का प्रस्ताव रखा और कथित तौर पर विभाग के कुछ अधिकारियों के साथ बातचीत शुरू हुई.

खरीदे जाने थे 250 ड्रोन, आखिर गए कहां? निजी फर्म के आरोपों के मुताबिक, केवल बातचीत ही नहीं हुई बल्कि कृषि विभाग परिसर में ही संबंधित फर्म के साथ एक अनुबंध भी कर लिया गया. अब सवाल ये है कि यदि ऐसा कोई समझौता हुआ था, तो क्या इसके लिए विभागीय स्वीकृतियां ली गई थीं? क्या वित्तीय नियमों का पालन किया गया था? और सबसे बड़ा सवाल, यदि 250 ड्रोन खरीदे जाने थे तो वे आखिर गए कहां?
एक क्लर्क पर गिरी गाज: मामले ने नया मोड़ तब लिया जब प्राथमिक जांच में कुछ तथ्यों की पुष्टि होने की बात सामने आई. इसके बाद कृषि निदेशालय के एक क्लर्क यानी कनिष्ठ सहायक सुमित सिंह को निलंबित कर दिया गया, लेकिन यहीं से बहस भी शुरू हो गई.

वहीं, मामला सामने आते ही विपक्ष ने सवालों की बौछार कर दी है. कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता अमेंद्र बिष्ट का कहना है कि जब सरकार बीजेपी की हो तो घोटाले से इनकार नहीं किया जा सकता. कृषि विभाग में भी ड्रोन घोटाला सामने आया. उन्होंने आरोप लगाया कि इसमें सरकार की मिलीभगत है. यही वजह है कि विभागीय कर्मचारी बेझिझक किसी प्राइवेट कंपनी से एमओयू साइन कर पैसे ले रहे हैं.
अमेंद्र बिष्ट ने आरोप लगाते हुए कहा कि कृषि विभाग में पहले से ही भ्रष्टाचार के मामले सामने आ चुके हैं. यह कोई नया मामला नहीं है. उनका आरोप है कि निश्चित तौर पर बीजेपी सरकार में भ्रष्टाचार का बोलबाला है. जिसमें सभी मिले हुए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में तमाम कामों में भ्रष्टाचार हो रहे हैं. यह ड्रोन घोटाला भी उसी का एक उदाहरण है.

आखिर क्या डेढ़ करोड़ रुपए जैसे कथित मामले का पूरा भार केवल एक क्लर्क के कंधों पर डाला जा सकता है? विभागीय हलकों में यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या इतना बड़ा कथित लेन-देन बिना वरिष्ठ अधिकारियों की जानकारी के संभव था?
क्या निचले स्तर के कर्मचारी ही जिम्मेदार? यदि आरोप सही हैं तो क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारी ही जिम्मेदार हैं या फिर जांच की रोशनी ऊंचे पदों तक भी पहुंचनी चाहिए? आरोप है कि कथित अनुबंध तत्कालीन निदेशक के कमरे में हुआ था. हालांकि, इन आरोपों की विस्तृत जांच अभी बाकी है और अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे, लेकिन इतना जरूर है कि इन आरोपों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

एक साल पुराने मामले में अब हो रही जांच: सबसे बड़ा सवाल ये भी है कि यदि मामला एक साल पुराना है, तो फिर जांच की शुरुआत अब क्यों हुई? क्या विभाग और शासन को इसकी जानकारी नहीं थी. क्या यहां मामला इतना धीमा चला कि आरोपित अधिकारी सेवानिवृत्त होकर पेंशन तक लेने लगे और विभाग को अब जाकर जांच की याद आई. यदि शिकायतकर्ता सामने नहीं आता तो शायद यह पूरा मामला कभी खुलता ही नहीं.
क्या बोले कृषि मंत्री गणेश जोशी? उधर, फर्म मालिक ने अपनी शिकायत कृषि मंत्री तक पहुंचा दी है, जिसके बाद विभाग में हलचल तेज हो गई है. कृषि मंत्री गणेश जोशी ने भी मामले की जांच कराने और शासन स्तर पर कार्रवाई करने की बात कही है.

इसके अलावा उन्होंने आगे कहा कि,
"जिस व्यक्ति को सस्पेंड किया गया है, प्रथम दृष्टया आरोपी वही है. पूर्व निदेशक की संलिप्तता भी पाई गई है, जिसके खिलाफ शासन से जांच कराई जाएगी. जहां तक मामले की बात है, उसमें शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया कि एक व्यक्ति ने ड्रोन का काम देने की बात कही थी. उसके एवज में कुछ धनराशि ली गई. जबकि, उसे फर्जी एग्रीमेंट दिया गया है. आगे जांच के बाद ही मामले की स्थिति स्पष्ट होगी."
- गणेश जोशी, कृषि मंत्री, उत्तराखंड -
तत्कालीन निदेशक से ईटीवी भारत ने साधा संपर्क: लिहाजा, इन्हीं आरोपों और सवालों का जवाब लेने के लिए ईटीवी भारत ने तत्कालीन निदेशक (अब रिटायर हो चुके हैं) केसी पाठक से फोन पर बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. उनसे बात होने पर तमाम सवालों का जवाब और उनका पक्ष भी रखा जाएगा.
असली सवाल केवल किसी एक अधिकारी, एक क्लर्क या एक फाइल का नहीं है. सवाल उस व्यवस्था का है, जिसमें किसानों के नाम पर योजनाएं बनती हैं, बजट जारी होते हैं, तकनीक की बातें होती हैं और आखिर में किसान वहीं खड़ा दिखाई देता है जहां वह पहले खड़ा था.

निष्पक्ष जांच में ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि कथित फर्जीवाड़े के तार आखिर कहां तक जुड़े हैं. क्या मामला केवल कुछ अधिकारियों तक सीमित था या फिर इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा था? और सबसे महत्वपूर्ण बात, क्या किसानों के नाम पर हुए इस कथित खेल की पूरी सच्चाई सामने आ पाएगी?
फिलहाल, उत्तराखंड का कृषि विभाग एक ऐसे सवाल के सामने खड़ा है, जिसका जवाब केवल जांच ही दे सकती है. क्योंकि, किसानों के खेतों में उड़ने वाले ड्रोन अभी तक दिखाई नहीं दिए, लेकिन आरोपों और सवालों ने जरूर पूरे विभाग के ऊपर चक्कर लगाना शुरू कर दिया है.
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