ईरान-अमेरिका संघर्ष से बासमती और मसाला निर्यात संकट में, यूपी-पंजाब-हरियाणा के किसानों की बढ़ी टेंशन
किसानों की चिंता है कि युद्ध की वजह से डीजल, गैस और दूसरी चीज़ों के दाम बढ़ सकते हैं, जिसका असर उनकी रोजी-रोटी पर पड़ेगा.


Published : March 3, 2026 at 7:49 PM IST
चंचल मुखर्जी
नई दिल्लीः ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ता संघर्ष भारतीय किसानों के लिए चिंता का सबब बन गया है. खासकर उनके लिए जो बासमती चावल, मसाले और अन्य फसलों के निर्यात पर निर्भर हैं. किसानों को डर है कि यदि यह संघर्ष लंबे समय तक चला, तो इससे उनका निर्यात कारोबार प्रभावित होगा. इसके अलावा, यदि गैस की कीमतें बढ़ती हैं तो इसका सीधा असर खाद और यूरिया की कीमतों पर पड़ेगा, जो अपने आप बढ़ जाएंगी.
उत्तर प्रदेश के एक किसान धर्मेंद्र मलिक ने ईटीवी भारत से अपनी चिंता व्यक्त करते हुए, कहा- "संघर्ष के पूर्ण प्रभाव का आकलन करना अभी जल्दबाजी होगी. हालांकि, यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो यह निश्चित रूप से किसानों को प्रभावित करेगी. हमारा बासमती चावल और मसालों का निर्यात कारोबार प्रभावित होगा, खासकर तब जब हमारे बासमती का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले ईरान को सप्लाई किया जाता है."
पंजाब के बठिंडा की महिला किसान सुखविंदर कौर ने ETV Bharat को बताया, "स्थिति बेहद गंभीर और गहरी चिंता वाली है. कई लोग जो काम और बेहतर अवसरों की तलाश में मध्य पूर्व के देशों में गए थे, वे अब वहां फंसे हुए हैं और डर के साये में जी रहे हैं. इस मानवीय संकट के साथ-साथ, चल रहे संघर्ष के कारण व्यापार को भी भारी नुकसान हो रहा है, जिससे इस क्षेत्र से जुड़े हर व्यक्ति के लिए यह संकट और भी दर्दनाक हो गया है."
कौर ने कहा, "जैसा कि सभी जानते हैं, बढ़ते संघर्ष के कारण परिवहन मार्ग बाधित हो गए हैं. इस वजह से, बासमती चावल के लिए कोई नए ऑर्डर नहीं दिए जा रहे हैं और मौजूदा खेप भी अनिश्चितता में फंसी हुई है. यह असमंजस उन किसानों और निर्यातकों के लिए भारी तनाव पैदा कर रहा है जिनकी आजीविका इन शिपमेंट पर निर्भर है."
पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के बासमती उत्पादक विशेष रूप से चिंतित हैं, क्योंकि उनके उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों (ईरान-खाड़ी देश) में निर्यात किया जाता है. यदि मौजूदा स्थिति के कारण ऑर्डर कम होते हैं या कीमतें गिरती हैं, तो किसानों को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ सकता है.
किसानों को यह भी डर है कि संघर्ष के कारण डीजल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं. ईंधन की लागत में किसी भी वृद्धि का सीधा असर कृषि क्षेत्र पर पड़ता है, क्योंकि सिंचाई पंपों, ट्रैक्टरों और कटाई मशीनों के लिए डीजल बहुत महत्वपूर्ण है. गैस की ऊंची कीमतें यूरिया जैसे उर्वरकों की लागत भी बढ़ा सकती हैं, जो भारी मात्रा में नाइट्रोजन उत्पादन पर निर्भर करते हैं. यदि खेती की लागत बढ़ती है, तो इसका अंतिम बोझ किसानों पर ही पड़ता है, जिससे उनका पहले से ही कम मुनाफा और घट जाता है और खेती करना और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है.
ETV Bharat से बात करते हुए हरियाणा के किसान अमरजीत सिंह मोहरी ने कहा, "शुरुआत में तो इस चल रहे संघर्ष का असर निर्यातकों पर पड़ेगा, लेकिन अंततः इसका पूरा बोझ हम जैसे किसानों पर ही आएगा. अगर यह स्थिति जारी रही, तो पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को इसका सबसे बड़ा नुकसान उठाना पड़ेगा. उम्मीद करता हूं कि सरकार हमारी आवाज सुनेगी और हमें भारी नुकसान से बचाने के लिए किसी समाधान के साथ आगे आएगी."
ईरान और खाड़ी देशों में फैला कारोबार
सरकारी आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत के कुल बासमती निर्यात का लगभग 77.5 प्रतिशत हिस्सा मात्र 10 देशों पर निर्भर है. इनमें से अधिकांश देश एशियाई और मध्य-पूर्व क्षेत्र के हैं. हालांकि पिछले कुछ वर्षों (2021-22 से 2023-24) में ईरान, यूएई और कुवैत जैसे देशों की हिस्सेदारी में मामूली गिरावट दर्ज की गई थी, लेकिन आज भी ईरान भारतीय बासमती का सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है. भारत के कुल बासमती निर्यात का लगभग 25 प्रतिशत हिस्सा अकेले ईरान को जाता है, जो अब पूरी तरह अधर में है.
बासमती के साथ-साथ मसालों के मोर्चे पर भी खतरा बड़ा है. स्पाइस बोर्ड के वर्ष 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने दुनिया भर के 180 देशों को 39,994.48 करोड़ रुपये के मसाले निर्यात किए हैं. इस निर्यात बास्केट में यूएई (9%) और सऊदी अरब (3%) जैसे खाड़ी देश भारत के सबसे बड़े खरीदारों में शामिल हैं. यदि यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो भारत के कुल मसाला निर्यात का करीब 12 प्रतिशत से अधिक हिस्सा और बासमती का एक चौथाई हिस्सा सीधे तौर पर प्रभावित होगा.
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