आस्था, इतिहास और देव परंपरा का अद्भुत संगम, छोटी काशी में अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव का भव्य शुभारंभ
महोत्सव में सैकड़ों देवी-देवता अपनी पालकियों में मंडी पहुंचते हैं. ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 16, 2026 at 6:58 PM IST
मंडी: हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर को "छोटी काशी" के नाम से जाना जाता है. पहाड़ों के बीच बसा यह ऐतिहासिक नगर सदियों से शिव भक्ति और देव परंपराओं का केंद्र रहा है. यहां आयोजित होने वाला अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि इतिहास, लोक संस्कृति और आस्था का भव्य संगम है. हर वर्ष देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु और पर्यटक इस उत्सव में शामिल होते हैं.
सोमवार को राजदेवता माधोराय की पारंपरिक शाही जलेब के साथ मंडी में अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव-2026 का विधिवत शुभारंभ हुआ. सदियों पुरानी परंपरा के अनुसार सबसे पहले राजदेवता माधोराय के मंदिर में पूजा-अर्चना की गई. इसके बाद शाही जलेब नगर के मुख्य मार्गों से होती हुई पड्डल मैदान पहुंची, जहां ध्वजारोहण के साथ सप्ताह भर चलने वाले महोत्सव का औपचारिक उद्घाटन किया गया. जलेब के दौरान ढोल-नगाड़ों की गूंज, पारंपरिक वेशभूषा में सजे देव प्रतिनिधि और हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति ने पूरे शहर को भक्तिमय बना दिया.
दंतकथाओं से जुड़ी है शिवरात्रि की शुरुआत
मंडी शिवरात्रि को लेकर कई ऐतिहासिक और लोक मान्यताएं प्रचलित हैं. इतिहासकार डॉ. दिनेश धर्मपाल बताते हैं कि मंडी प्राचीन काल से शिवभूमि रही है. एक मान्यता के अनुसार, 16वीं शताब्दी में बाबा भूतनाथ मंदिर के निर्माण के बाद इस उत्सव की शुरुआत हुई. दूसरी दंतकथा के अनुसार मंडी रियासत के राजा ईश्वरीय सेन की युद्ध विजय के बाद शिवरात्रि के अवसर पर मनाया गया उत्सव ही आगे चलकर महोत्सव में परिवर्तित हुआ. इतिहासकारों का मानना है कि राजा बान सेन और बाद में राजा सूरज सेन के काल में इस पर्व को संगठित रूप मिला और इसे राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ.

शैव, वैष्णव और लोक देवताओं का संगम
मंडी शिवरात्रि महोत्सव की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें शैव, वैष्णव और लोक देव परंपराओं का संगम देखने को मिलता है. भगवान शिव और भगवान विष्णु के साथ लोक देवता कमरूनाग की उपस्थिति इस आयोजन को अद्वितीय बनाती है. मान्यता है कि देव कमरूनाग के आगमन के साथ ही महोत्सव का विधिवत आरंभ होता है.

देवी-देवताओं की भव्य उपस्थिति
महोत्सव के दौरान सैकड़ों देवी-देवता अपने रथों और पालकियों में मंडी पहुंचते हैं. शहर में तीन प्रमुख जलेब निकाली जाती हैं, जो इस आयोजन की मुख्य आकर्षण होती हैं. ढोल-नगाड़ों और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की ध्वनि से पूरा वातावरण जीवंत हो उठता है. इस बार भी शिवरात्रि महोत्सव की विशेषता सैकड़ों देवी-देवताओं की उपस्थिति रही. देव छानणू-झमाहूं की जोड़ी सबसे आगे चल रही थी. इसके बाद देव कोटलू नारायण, देव सरोली मार्कंडेय, देव शैटी नाग, देवी डाहर की अंबिका, देव विष्णू मतलोड़ा, देव मगरू महादेव, देव चपलांदू नाग, श्रीदेव बायला नारायण, देव बिटठु नारायण, देव लक्ष्मीनारायण पखरोल, चौहारघाटी के देव हुरंग नारायण सहित कई अन्य देवी-देवता शामिल हुए. राज माधव की चांदी की कुर्सी और उसके पीछे राजदेवता माधोराय की पालकी आकर्षण का केंद्र रही.

मंडयाली संस्कृति की जीवंत झलक
इस वर्ष की जलेब में हिमाचली और विशेष रूप से मंडयाली संस्कृति की शानदार झलक देखने को मिली. विभिन्न सांस्कृतिक दलों ने पारंपरिक वेशभूषा में ढोल-नगाड़ों की थाप पर आकर्षक नृत्य प्रस्तुत किए. फागली नृत्य, मुखैटा नृत्य, महिलाओं की नाटी और मंडी का नागरीय नृत्य लोगों के आकर्षण का केंद्र रहे. शहर के बाजार और सड़कों पर हजारों लोगों की भीड़ उमड़ी और पूरा वातावरण सांस्कृतिक रंगों में रंग गया. शाही जलेब में सबसे आगे पुलिस के घुड़सवार दस्ते, पुलिस और होमगार्ड बैंड, महिला पुलिस, होमगार्ड्स और पूर्व सैनिक लीग की टुकड़ियां अनुशासन के साथ चलती नजर आईं. उनके पीछे विभिन्न सांस्कृतिक दलों ने अपनी प्रस्तुतियों से आयोजन की शोभा बढ़ाई. ढोल-नगाड़ों की गूंज से पूरा शहर गूंज उठा.

डिप्टी CM ने की महाआरती की सराहना
इस मौके पर उपमुख्यमंत्री मुकेश अग्निहोत्री ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय शिवरात्रि महोत्सव में सैकड़ों देवी-देवताओं की भागीदारी इसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाती है. उन्होंने कहा कि मंडी शहर के लोगों की सक्रिय भागीदारी से यह आयोजन और भी भव्य बना है. उन्होंने महाआरती की सराहना करते हुए कहा कि यह दृश्य ऐतिहासिक और अविस्मरणीय था. आने वाले दिनों में यह उत्सव और भी रंगारंग कार्यक्रमों के साथ आगे बढ़ेगा.

राष्ट्रीय स्तर पर पहचान
अंतरराष्ट्रीय दर्जा प्राप्त कर चुका मंडी शिवरात्रि महोत्सव अब राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर हिमाचल की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है. यह उत्सव भारतीय परंपरा की उस विरासत को दर्शाता है, जहां आस्था, इतिहास और लोक संस्कृति एक साथ जीवित रहती हैं.
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