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भारत की 117 भाषाओं पर खतरा; 10 हजार से भी कम बोलने वाले, क्या खत्म हो जाएगी देश की अनोखी विरासत?

अमेरिका की भी 191 भाषाएं खत्म होने के कगार पर, पेरू की ताउशिरो लैंग्वेज को जानने वाला केवल एक व्यक्ति बचा.

भारत के अलावा दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी संकट में.
भारत के अलावा दुनिया की कई अन्य भाषाएं भी संकट में. (Photo Credit; Getty images)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 21, 2026 at 10:25 AM IST

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हैदराबाद : भाषा भावनाओं को व्यक्त करने का मजबूत जरिया है. यह लोगों को आपस में जोड़ती है. देश की भाषाई विरासत हमेशा से ही काफी समृद्ध रही है. यह संस्कृति की हिफाजत में भी अपनी भूमिका अदा करती रही है. वक्त के साथ गांव से लेकर शहर तक तरक्की कर रहे हैं, लेकिन भाषाओं की ये 'सल्तनत' बिखरती जा रही है. देश-विदेश की कई भाषाएं अपने वजूद को बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहीं हैं.

भारत सरकार के प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो के अनुसार भारतीय भाषाओं का पहला भाषाई सर्वेक्षण 1894 में जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन ने शुरू किया था. इसके बाद 1961 की जनगणना में एसपीपीईएल (Scheme for Protection and Preservation of Endangered Languages) ने लुप्त होने के कगार पर खड़ी 50 से अधिक भाषाओं की पहचान की थी. जबकि उस दौरान देश में 1652 मातृभाषाओं के होने की भी जानकारी सामने आई थी. हालांकि मौजूदा समय इनकी संख्या काफी ज्यादा है.

हाल की रिपोर्ट के अनुसार देश के अलग-अलग राज्यों में बोली जाने वाली 117 से अधिक भाषाएं खतरे में हैं. अन्य देशों की भी भाषाओं के अस्तित्व पर संकट है. भारत में कई भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले 10 हजार से भी कम लोग बचे हैं, जबकि दुनिया की कई भाषाएं ऐसी हैं जिन्हें बोलने वाले 10 से भी कम लोग रह गए हैं. यह आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है. वडोदरा के भाषा रिसर्च एंड पब्लिकेशन सेंटर के एक सर्वे से पता चला है कि पिछले 5 दशकों में भारत ने अपनी लगभग 20% भाषाएं खो दी हैं.

पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (PLSI) नाम के सर्वे में लीड कोऑर्डिनेटर गणेश देवी के अनुसार देश की लगभग 220 भाषाएं गायब हो चुकी हैं. यह सर्वे साल 2011 से 2 साल तक किया गया था. भाषाओं की महत्ता को समझाने और उन्हें संरक्षित करने के मकसद से 17 नवंबर 1999 में यूनेस्को ने हर साल 21 फरवरी को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा की थी. साल 2026 का थीम बहुभाषी शिक्षा पर युवाओं की आवाज (Youth voices on multilingualism) है.

ईटीवी भारत के इस Explainer के जरिए हम आपको भाषाओं की ताजा स्थिति से रूबरू कराएंगे, यह भी बताएंगे कि देश और दुनिया में कौन सी भाषा सबसे ज्यादा बोली जाती है?. भाषाओं के विलुप्त होने के पीछे का कारण भी जानेंगे. भारत की पहली और दुनिया की सबसे प्राचीन भाषा के बारे में भी बताएंगे, कौन सी भाषाएं विलुप्त हो चुकी हैं?, मौजूदा किन भाषाओं पर संकट है?, इसके बारे में भी जानेंगे. ये सभी जानकारियां People's Linguistic Survey of India, पीआईबी, रिसर्च गेट, ebsco.com, UNESCO Atlas, census india.gov.in, Global Language Services आदि से मिले डाटा पर आधारित हैं.

मुसीबत में ये भारतीय भाषाएं : चंडीगढ़, हरियाणा, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में करीब 25 भाषाएं बोली जाती हैं. इनमें स्पीति, जाड़, दरमिया, गैहरी, कनाशी शामिल हैं. इन भाषाओं पर संकट के बादल हैं, क्योंकि इन्हें बोलने वाले काफी कम हो गए हैं. इसी तरह अरुणाचल, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, त्रिपुरा की भी 43 भाषाएं (ऐमोल, तांगम, शेरडुकपेन, सिंगफो, ताराओ आदि) भी खत्म होने के कगार पर हैं.

गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, दमन, दीव, दादरा नगर हवेली, गोवा में भी 5 भाषाओं पर संकट है. इनमें निहाली, बराडी, भरवाड, दिवेही, भाला आदि भाषा शामिल हैं. इसी तरह तेलंगाना, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल की 20 भाषाओं में शामिल सोलिगा, जेनु कुरुम्बा, सिद्धि, उराली, टोडा पर भी संकट है. अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की सेंटिनलीज, ओन्गे, शोम्पेन, लैमोंगसे, लूरो भाषाएं भी बहुत संकटग्रस्त हैं.

भारत में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाती है.
भारत में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाती है. (Graphics Credit; ETV Bharat, डेटा सोर्स census india.gov.in)

इन भाषाओं का मिट चुका वजूद : मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अंडमान में बोली जानी वाली 'सारे' भाषा विलुप्त हो चुकी है. यह भाषा अंडमान के दक्षिणी द्वीप में बोली जाती थी. इस भाषा को बोलने और जानने वाली केवल एक ही महिला बची थी. उसका नाम लीचो था. साल 2020 में उसकी भी मौत हो गई थी. साल 2010 में ग्रेट अंडमानी भाषा खोरा और बो भी खत्म हो गई थी, क्योंकि इसे बोलने वाले दुनिया में ही नहीं रहे. यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार अहोम, आंद्रो, रांगकास, सेंगमई और तोल्चा भारतीय भाषाएं भी खत्म हो चुकी हैं.

खतरे में दुनिया की 2464 भाषाएं : यूनेस्को की ओर से जारी एटलस ऑफ वर्ल्ड लैंग्वेज इन डैंजर (Atlas of the World’s Languages in Danger) की रिपोर्ट के अनुसार साल 1950 से अब तक पूरी दुनिया में कई सौ भाषाएं खत्म हो चुकी हैं. यूनेस्को ने साल 2001 में जब पहली बार पूरी दुनिया के भाषाओं पर खतरे को लेकर रिपोर्ट जारी की थी तो उस दौरान 900 भाषाएं ऐसी थी जो विलुप्त होने के कगार पर थी. साल 2017 की रिपोर्ट में यह आंकड़ा 2464 तक पहुंच गया.

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सदी के अंत तक खत्म हो जाएंगी दुनिया की आधी भाषाएं : अहम बात ये है कि विलुप्त होने वाली भाषाओं में भारतीय भाषाओं की संख्या काफी ज्यादा है. ऐसे में भाषाओं के खत्म होने के मामले में भारत दुनिया में नंबर वन है. दूसरे स्थान पर अमेरिका है. वहां 191 भाषाएं संकट में हैं. जबकि ब्राजील में 190 भाषाएं खत्म होने के मुहाने पर हैं. दुनिया भर के भाषा विशेषज्ञों का मानना ​​है कि सदी के आखिर तक बोली जाने वाली 7,159 भाषाओं में से करीब आधी खत्म हो जाएंगी. ये ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें अब इस्तेमाल करने के लिए बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है. इन भाषाओं के अस्तित्व पर संकट है.

भारत में कितनी भाषाओं को मिल चुकी है मान्यता? : भारत में साल 2026 तक संविधान के आठवें शेड्यूल में 22 भाषाएं शामिल हैं. शुरू में सिर्फ 14 भाषाएं शामिल की गईं थीं. बाद में संविधान संशोधनों ने इस संख्या को बढ़ाकर 22 कर दिया. इन भाषाओं को संविधान के आर्टिकल 344(1) और 351 के तहत मान्यता दी गई है. यानी इन्हें संरक्षित कर दिया गया है. इन भाषाओं का उपयोग सरकारी कामकाज, संसद, राज्य विधानमंडल और परीक्षाओं में भी किया जा सकता है.

भाषा को संकटग्रस्त मानने का क्या है पैमाना? : पीआईबी की साल 2025 की रिपोर्ट के अनुसार 2011 की जनगणना में दर्ज की गई तर्कसंगत मातृभाषाओं की संख्या 2843 थी. इनमें से 1369 मातृभाषाएं थीं. 10 हजार से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली सभी मातृभाषाओं को उपयुक्त भाषाओं के तहत वर्गीकृत किया गया था. यानी 10 हजार के कम लोगों की ओर से बोली जाने वाली भाषाओं को लुप्त होने के काफी करीब माना गया. इनके खत्म होने का अंदेशा जताया गया था.

दुनिया में कई भाषाओं को बोलने वाले 10 से भी कम लोग.
दुनिया में कई भाषाओं को बोलने वाले 10 से भी कम लोग. (Graphics Credit; ETV Bharat, डेटा सोर्स UNESCO Atlas)

दुनिया की 10 सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाएं : इंटरनेशनल सेंटर फॉर लैंग्वेज स्टडीज की साल 2025 की रिपोर्ट के अनुसार विश्व में करीब 1.52 अरब लोग अंग्रेजी बोलते हैं. यह आम आधिकारिक भाषा है. यह 186 देशों में बोली जाती है. इस तरह यह दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा है. इसी तरह चीनी (मंदारिन) दुनिया की दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. इसे 1.14 अरब लोग बोलते हैं. यह 83 देशों में बोली जाती है.

भारत में हिंदी सबसे व्यापक रूप से बोली जाने वाली भाषा है. इसे 52.83% भारतीय बोलते हैं. इसके विपरीत, बंगाली और मराठी देश में दूसरी और तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाएं हैं. हिंदी विश्व में तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. स्पैनिश 56 करोड़ लोग बोलते हैं. वहीं दुनिया भर में 42 करोड़ 20 लाख लोग अरबी भाषा बोलते हैं.

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इसी तरह जून 2022 तक दुनियाभर में फ्रेंच भाषा बोलने वालों की संख्या 32 करोड़ 10 लाख थी. यह भाषा 32 देशों की आधिकारिक भाषा है. इसी तरह बंगाली बांग्लादेश की आधिकारिक भाषा है. यह भारत में भी बोली जाती है. करीब 27 करोड़ 30 लाख लोग बंगाली बोलते हैं. पुर्तगाली विश्व की आठवीं सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. वहीं रूसी भाषा को 25.5 करोड़ से अधिक लोग बोलते हैं. यह नौवीं सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है. वहीं 23 करोड़ 20 लाख लोग उर्दू बोलते हैं. यह सबसे अधिक पाकिस्तान में बोली जाती है.

विश्व भर में 178 देशों में कम से कम एक आधिकारिक भाषा है. इनमें से लगभग 100 देश एक से अधिक भाषाओं को मान्यता देते हैं. पूरी दुनिया में 7,159 भाषाएं प्रयोग में हैं.

कितनी भाषाओं को मिल चुका है शास्त्रीय भाषा का दर्जा? : पीआईबी के अनुसार भारत सरकार ने 3 अक्टूबर 2024 को मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली भाषाओं को 'शास्त्रीय भाषा' का दर्जा दिया. वहीं साल 2004 से 2024 के बीच छह भारतीय भाषाओं, तमिल, संस्कृत, कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और उड़िया को भी शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला. इस तरह साल 2025 में अक्टूबर तक कुल 11 भाषाओं को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिला.

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अब कुछ शास्त्रीय भाषाओं के बारे में विस्तार से जानेंगे

मराठी : मराठी एक भारतीय-आर्यन भाषा है. यह मुख्यत महाराष्ट्र में बोली जाती है. इस भाषा का इतिहास एक हजार साल से भी अधिक पुराना है. यह दुनिया की शीर्ष 15 सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है. इसकी उत्पत्ति प्राचीन महारथी, मराठथी, महाराष्ट्री प्राकृत और अपभ्रंश मराठी जैसी भाषाओं से हुई है.

तमिल भाषा को भारत की पहली भाषा माना जाता है.
तमिल भाषा को भारत की पहली भाषा माना जाता है. (Graphics Credit; ETV Bharat, डेटा सोर्स ebsco.com)

पाली : यह भी भारत की प्राचीन भाषा है. इस भाषा का राज विभिन्न पांडुलिपियों में छिपा है. श्रीलंका, म्यांमार, थाईलैंड जैसे बौद्ध देशों के अलावा जापान, कोरिया, तिब्बत, चीन और मंगोलिया में भी इस भाषा पर अध्ययन जारी है. पाली के प्रारंभिक संदर्भ बौद्ध विद्वान बुद्धघोष की टीकाओं में मिलते हैं. प्राचीन भारत में बौद्ध और जैन संप्रदायों ने अपनी पवित्र भाषा के रूप में पाली को अपनाया था. भगवान बुद्ध ने पाली भाषा में उपदेश दिया था.

प्राकृत : यह भाषा मध्यकालीन भारतीय-आर्य भाषाओं के एक समूह का प्रतिनिधित्व करती है. यह कई आधुनिक भारतीय भाषाओं का आधार है. पाणिनि, चंद, वररुचि और समंतभद्र जैसे आचार्यों ने इस भाषा के व्याकरण को आकार दिया. महात्मा बुद्ध और महावीर ने अपने उपदेशों को जन-जन तक पहुंचाने के लिए इस भाषा को भी जरिया बनाया था.

असमिया : यह असम की आधिकारिक भाषा है. इसका विकास 7वीं शताब्दी में हुआ था. इस भाषा को मगधी अपभ्रंश से निकला माना जाता है. एक समय भाषाविद जीए ग्रियर्सन ने उल्लेख किया था कि मगधी इस क्षेत्र की प्रमुख बोली थी. इसका विस्तार हुआ. यह गंगा के उत्तर को पार करके असम घाटी में पहुंची तो वहां असमिया में तब्दील हो गई. असमिया का सबसे पहला उल्लेख कथा गुरुचरित में मिलता है.

बंगाली : यह भारत की प्रमुख भाषाओं में से एक है. बंगाली में ऐसे कवि, लेखक और विद्वान हुए हैं, जिन्होंने न केवल बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को बल्कि भारत की राष्ट्रीय चेतना को भी आकार दिया है. बंगाली की प्रारंभिक रचनाएं 10वीं और 12वीं शताब्दी ईसवी में देखी जा सकती हैं. 19वीं और 20वीं शताब्दी के क्रांतिकारी लेखन, बंगाली साहित्य ने सामाजिक, राजनीतिक और बौद्धिक आंदोलनों को गति देने में अहम भूमिका निभाई है.

किसी भाषा को कैसे मिलता है शास्त्रीय भाषा का दर्जा? : भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय ने किसी भी भाषा को शास्त्रीय भाषा का दर्जा देने के लिए कुछ मापदंड निर्धारित किए हैं. इसके अनुसार जिस भाषा का ग्रंथों आदि के जरिए लिखित इतिहास हो, 1500 से 2000 वर्षों की अवधि में जिसके प्रमाण मिलते हो, पीढ़ियां जिसे विरासत मान रही हों, ज्ञान ग्रंथ, विशेष रूप से गद्य ग्रंथ, काव्य के अलावा शिलालेख में उससे सबूत हो, ऐसे भाषाओं को इस कैटेगरी में रखा जाता है.

इंटरनेशनल मदर लैंग्वेज डे के मायने : यूनेस्को की वेबसाइट के अनुसार इंटरनेशनल मदर लैंग्वेज डे (अतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस) मनाने का आइडिया सबसे पहले बांग्लादेश ने दिया था. साल 1999 में इसे UNESCO जनरल कॉन्फ्रेंस में मंजूरी मिल गई थी. इसके बाद वर्ष 2000 से यह पूरी दुनिया में मनाया जाने लगा. मौजूदा समय में भाषाओं के गायब होने के कारण भाषाई डाइवर्सिटी पर खतरा बढ़ता जा रहा है.

दुनिया भर में 40% आबादी को ऐसी भाषा में एजुकेशन नहीं मिलती जिसमें वे बोलते या समझते हों. इसे देखते हुए इस साल दुनिया भर के स्कूलों के 13 से 18 साल के बच्चों को 13 फरवरी को यूनेस्को कैंपस (पेरिस) में बुलाया गया था. इसमें बच्चों को भाषाई विविधत के महत्व के बारे में बताया गया.

सुमेरियन दुनिया की सबसे पुरानी भाषा मानी जाती है.
सुमेरियन दुनिया की सबसे पुरानी भाषा मानी जाती है. (Graphics Credit; ETV Bharat, डेटा सोर्स Global Language Services)

भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही? : शास्त्रीय भाषाओं (classical languages) समेत सभी भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने का काम सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ इंडियन लैंग्वेजेज (CIIL) के जरिए किया जाता है. यह शिक्षा मंत्रालय के लैंग्वेज ब्यूरो का हिस्सा है. इसके अलावा कई खास सेंटर भी बनाए गए हैं. 2020 में संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए संसद के एक एक्ट के जरिए तीन सेंट्रल यूनिवर्सिटी बनाई गईं.

इनमें नई दिल्ली में सेंट्रल संस्कृत यूनिवर्सिटी, श्री लाल बहादुर शास्त्री नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी और तिरुपति में नेशनल संस्कृत यूनिवर्सिटी शामिल हैं. इसके अलावा आदर्श संस्कृत महाविद्यालयों और शोध संस्थानों को भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए वित्तीय मदद भी मुहैया कराई जाती है. तमिल भाषा को बढ़ावा देने के लिए पुराने तमिल की सामग्रियों को अनुवाद कर उन्हें आसान बनाया गया है. स्टूडेंट्स और स्कॉलर्स को तमिल कोर्स करने की सुविधा दी जा रही है. मैसूर में CIIL के तहत कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिया में सेंटर्स फॉर एक्सीलेंस भी बनाए गए हैं.

क्यों विलुप्त हो रहीं भाषाएं : एक्सपर्ट के मुताबिक भाषाओं के विलुप्त होने का सबसे बड़ा कारण इनका प्रचार-प्रसार न करना है. जिन भाषाओं को जानने वाले बेहद कम लोग बचे हैं, उनकी मौत के साथ ये भाषाएं भी दफन हो जाएंगी. मौजूदा समय जो लोग इन भाषाओं को जानते हैं, उनसे कोई सीखना नहीं चाहता है, न ही सरकार की कोई ऐसी योजना है जिनके जरिए वे इसका प्रचार-प्रसार कर सकें. दूसरी वजह अंग्रेजी, हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाओं का बढ़ता प्रभाव है. इनकी वजह से स्थानीय भाषाएं पीछे छूट जा रहीं हैं.

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