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बिहार की सीमा, मरियम और राधिका की कहानी, कूड़ा चुनने से लेकर शेफ तक का सफर

कुछ कहानिंया दिल को छू लेती हैं, तालियां बजाने को मजबूर नहीं करतीं. ऐसी की कहानी है बिहार की सीमा, मरियम और राधिका की, पढ़िए

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सीमा, मरियम और राधिका (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : December 17, 2025 at 8:12 PM IST

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रिपोर्ट : कृष्णनंदन

पटना : जिनका बचपन सड़क पर कचरा चुनने और दूसरों के घरों में चौका-बर्त्तन करने में बीता, वह आज पटना के एक बड़े होटल में शेफ हैं. 18 साल की सीमा और मरीयम होटल ताज के कैफेटेरिया को संभालती हैं. वहीं 18 साल की ही राधिका क्लीनिंग सेक्शन में हैं.

सीमा, मरियम और राधिका तीनों ही 12वीं की छात्रा हैं. अगले साथ इंटर की परीक्षा देंगी. एक वक्त था जब तीनों बेघर थीं. लेकिन मंजिल मिली और होटल ताज ने उनकी जिंदगी बदल दी है. कुछ समय पहले तक लोग उन्हें सहानुभूति भरी नजरों से देखते थे, लेकिन आज उसमें आत्मविश्वास है. वह पूरे आत्मविश्वास से केक, पेस्ट्रिज और अन्य खाद्य सामग्री बनाती हैं और इन लजीज व्यंजनों का स्वाद होटल में आने वाले देश-विदेश के लोग चखाते हैं.

तीनों लड़कियों से खास बातचीत (ETV Bharat)

आंसुओं से गुजरकर कामयाबी की कहानी : सीमा और मरियम को ताज होटल ने 'अप्रेंटिस इन फूड प्रोडक्शन डिपार्मेंट' प्रोग्राम के तहत लिया है. दोनों को अच्छा खाना बनाने और विभिन्न प्रकार के वैरायटी बनाने के स्किल सिखाए जा रहे हैं और ₹12000 प्रति माह की सैलरी भी दी जा रही है. 15 दिसंबर को दोनों को पहली सैलरी प्राप्त हुई है.

राधिका क्लीनिंग सेक्शन में हाईटेक मशीनों के संचालन के साथ-साथ रूम डेकोरेशन के स्किल सीख रही हैं. तीनों अब आत्मनिर्भर हो गई हैं और कहती हैं कि यदि आप मान ले तो पूरी दुनिया आपका परिवार हो जाता है. सीमा और मरियम होटल मैनेजमेंट में सबसे ऊंची पोस्ट पर जाना चाहती हैं और राधिका आगे स्नातक की पढ़ाई करके मैनेजमेंट के क्षेत्र में जाना चाहती हैं.

छात्रा राधिका
छात्रा राधिका (ETV Bharat)

बचपन में तीनों को किया गया था रेस्क्यू : सीमा, मरियम और राधिका तीनों को रेस्क्यू करके बचपन में आश्रय गृह में लाया गया था जहां उनकी पढ़ाई लिखाई शुरू कराई गई. सभी को पढ़ाई लिखाई के साथ-साथ पेंटिंग डांस मार्शल आर्ट जैसे स्किल सिखाए गए.

सीमा, मरियम और राधिका जैसी लड़कियों को भारत सरकार के समग्र शिक्षा अभियान कार्यक्रम के तहत रेनबो फाउंडेशन ऑफ इंडिया के माध्यम से राजकीय नवीन मध्य विद्यालय राजवंशी नगर में शिक्षा विभाग के सहयोग से चलने वाले आश्रय गृह में आत्मनिर्भर होकर जीवन जीने की बेसिक स्किल सिखाए जाते हैं. इस केंद्र का नाम खिलखिलाहट रेनबो होम है.

छात्रा मरियम
छात्रा मरियम (ETV Bharat)

पटना जंक्शन पर मिली थी कचरा चुनते : सीमा ने बताया कि बचपन में ही उसके पापा की मौत हो गई थी और मां के साथ वह कचरा चुनती थी. कुछ दिनों बाद मां की भी मौत हो गई और वह कचरा चुनते चुनते भटक कर पटना जंक्शन के प्लेटफार्म नंबर एक पर पड़ी हुई थी जहां उसे साल 2014 में रेस्क्यू किया गया था.

''7 साल की उम्र में कचरा में से भोजन की तलाश और कचरा चुनकर जो पैसा मिलता है उससे भोजन का प्रबंध होता था. लेकिन जब यहां शेल्टर होम में आई तो न्यूट्रीशन के बारे में सिखाया समझाया गया. सही गलत की पहचान बताई गई. हाइजीन के बारे में बताया गया और सामाजिक नियमों को समझाया गया. साथ साथ पढ़ाई भी सिखाया गया और आज के समय में मैं आत्मनिर्भर बनी हूं.''- सीमा, छात्रा

होटल मैनेजमेंट में बनाना है करियर : सीमा ने बताया कि अभी वह साइंस में बायोलॉजी सब्जेक्ट के साथ इंटरमीडिएट कर रही है. आगे भी वह पढ़ाई जारी रखते हुए उच्च शिक्षा लेकर होटल मैनेजमेंट के उच्च पद पर जाना चाहती हैं. ताज ग्रुप ने उन्हें यह छूट दी है कि इंटरमीडिएट परीक्षा के दौरान वह छुट्टी लेकर परीक्षा आराम से दे सकती हैं.

छात्रा सीमा
छात्रा सीमा (ETV Bharat)

''अभी 1 महीने में मैं वेज बिरयानी, चिकन बिरयानी, गोलगप्पे बनाना सीख गई हूं. ताज होटल की गाड़ी प्रतिदिन शेल्टर होम आती है और पिकअप भी करती है. ड्यूटी खत्म होने के बाद ड्राप करने भी आती है.''- सीमा, छात्रा

बाल मजदूरी से कराई गई थी मुक्त : मरियम बताती हैं कि पिता की मृत्यु के बाद उनकी मां ने उन्हें एक धनी व्यक्ति के घर में मेड का काम करने के लिए सौंप दिया और अपनी नई दुनिया बसा ली. जिनके यहां वह मेड का काम करती थी, वह उन्हें भरपेट भोजन नहीं देते थे और कुछ भी गलती होने पर मारपीट करते थे. उस समय वह 7 साल की थी और यह घटना 2014 की है.

एक दिन जब किस्मत ने दी दस्तक : कुछ लोगों ने मरियम पर जुल्म होते देखा तो प्रशासन को कॉल कर दिया. प्रशासन ने हस्तक्षेप कर उसे बाल मजदूरी से आजाद कराते हुए यहां आश्रय गृह में भर्ती कराया. मरियम कहती है कि ''यहां की सभी दीदी और मम्मा अच्छी हैं और प्यार से सभी ने जीवन जीने के स्किल सिखाए. जिंदगी में मैंने बहुत कुछ सहा है, लेकिन अब मुस्कुराने का वक्त है.''

कराटे और पेंटिंग का हुनर भी है साथ : मरियम बताती हैं कि वह एनसीसी में भी हैं और मार्शल आर्ट में ब्लैक बेल्ट भी हासिल कर ली है. इन सबके साथ-साथ वह मिथिला पेंटिंग के अलावा और अलग-अलग प्रकार की पेंटिंग का स्किल जानती हैं. इन सबके साथ ही शास्त्रीय नृत्य में वह सिक्स्थ लेवल (डांस शिक्षण कला की योग्यता) में है.

''मैं चाहती हूं कि एक दिन मेरा भी अपना परिवार हो और परिवार के साथ खुशी से जिंदगी बिताना चाहती हूं. अभी के समय में मैं मोमोज, नूडल्स, गोलगप्पा, समोसा, बिरयानी जैसे अलग-अलग प्रकार के दर्जनों डिशेस बनाना सीख गई हूं. आर्ट्स लेकर इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रही हूं. काम के साथ-साथ रात में पढ़ाई के लिए भी समय निकालती हूं.''- मरियम, छात्रा

बचपन में ही उठ गया था माता-पिता का साया : राधिका बताती हैं कि जब उन्हें होश भी नहीं आया था तब तक उनकी मां दुनिया से चल बसी थी. पिता भी कचरा चुनते थे. जब कुछ बड़ी हुई तो पिता भी गुजर गए. बचपन में बेउर जेल के पास मुसहरी में वह रहती थी. इस दौरान वह अपने बड़े भाई के साथ कचरा चुनती थी और कचरे का जो पैसा मिलता था उससे दोनों भाई बहन खाना खाते थे. कई बार लोगों से मांग कर खाना खाया.

इसी दौरान एक बार कचरा चुनने के दौरान उसे रेस्क्यू कर लिया गया और शेल्टर होम में डाल दिया गया. उन्हें पढ़ाई से जोड़ा गया लेकिन शुरू में पढ़ाई में मन नहीं लगता था. यह 2014 का साल था और वह 7 साल की थी. एक दो बार वह शेल्टर होम से भाग कर अपने घर चली गई लेकिन जो भी आसपास के लोग थे वह उठाकर फिर से शेल्टर होम में ला दिए.

'मैनेजमेंट में बनाना है करियर' : राधिका बताती हैं कि बड़े भाई ने समझाया कि जहां गई हो वहां से जीवन बन जाएगा. फिर वह शेल्टर होम में ही मन लगाने लगी. धीरे-धीरे उनका मन पढ़ाई में लगने लगा और वह अक्षर जानकार शब्द पढ़ना सीख गई तो उन्हें काफी अच्छा लगा. इसके बाद उन्होंने कई सारे स्किल सीखे, जैसे पेंटिंग और डांस. इसके साथ-साथ एनसीसी ज्वाइन किया.

अब नई मंजिल बुला रही हैं : आज राधिका इंटरमीडिएट की पढ़ाई के साथ-साथ ताज ग्रुप में क्लीनिंग एंड वाशिंग सेक्शन में काम कर रही है और सैलरी प्राप्त कर रही हैं. आज वह आत्मनिर्भर बन गई है लेकिन वह आगे और पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं और मैनेजमेंट क्षेत्र में कैरियर बनाना चाहती हैं. राधिका कहती हैं कि मानो अब नई मंजिल उसे बुला रही हैं.

अभावग्रस्त बेघर बच्चियों को मिलता है आश्रय : इन बच्चियों को बचपन में ही अभावग्रस्त स्थिति से रेस्क्यू कर आत्मनिर्भर बनाने वाली संस्था रेनबो होम की प्रोजेक्ट इंचार्ज विशाखा ने बताया कि उनके यहां जितनी भी बच्चियों हैं, सभी सड़क पर भीख मांगने वाली या कचरा चुनने वाली रही हैं जो बेघर हैं. अधिकांश के माता-पिता नहीं है और कुछ के माता या पिता हैं भी तो बच्चे की केयर करने में सक्षम नहीं थे.

''जब बच्चियां यहां आई थी तब कुछ भी लिखना, पढ़ना, बोलना नहीं जानती थी. ऐसे में इन बच्चियों का 1 साल का ब्रिज कोर्स कराया गया. जिसमें अक्षर पहचान की क्षमता के साथ-साथ बच्चों से बोलने की क्षमता विकसित हुई.''- विशाखा, प्रोजेक्ट इंचार्ज, रेनबो होम

सिखाया जाता है आत्मनिर्भर जीवन जीने का स्किल : विशाखा बताती है कि उन लोगों का उद्देश्य यही होता है कि 18 साल की उम्र होते-होते जो बच्चियां पढ़ना चाहती हैं, उन्हें आगे पढ़ाया जाए और नहीं तो कोई स्किल के साथ उन्हें काम में एंगेज किया जाए. ताकि वह आत्मनिर्भर होकर जी सकें. आज यह तीनों बच्चियां आत्मनिर्भर हो गई हैं और पहली सैलरी मिली है तो तीनों के चेहरे पर जो खुशी है वह उन्हें प्रफुल्लित कर रही है.

''यहां बच्चियों को किताबी ज्ञान के साथ-साथ नृत्य, संगीत, पेंटिंग, मार्शल आर्ट की स्किल्स भी सिखाए जाते हैं. हम लोगों का प्रयास होता है कि 18 साल की उम्र होने के बाद जब रेनबो होम से बच्चियां निकले तो समाज में आत्मनिर्भर होकर रहें.''- विशाखा, प्रोजेक्ट इंचार्ज, रेनबो होम

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