मक्के के छिलके से बना कप-प्लेट देखा है कहीं, कैंसर से इनोवेशन की ये कहानी है खास
भांजे की कैंसर से मौत के बाद बिहार के नाज ने प्लास्टिक का विकल्प ढूंढ निकाला है. जिसकी आज वैज्ञानिक भी तारीफ कर रहे हैं.

Published : January 2, 2026 at 6:10 PM IST
रिपोर्ट: विवेक कुमार
मुजफ्फरपुर: बिहार के मुजफ्फरपुर के मुरादपुर गांव निवासी इंजीनियर नाज ओजैर (30) बताते हैं कि "साल 2019 में मेरे भांजे की मौत कैंसर से हो गई थी. जब बच्चे ने कभी नशा नहीं किया, फिर कैंसर क्यों हुआ? उसके बाद मैंने प्लास्टिक के विकल्प पर शोध करने का संकल्प लिया."
इंजीनियर नाज ओजैर कहते हैं कि मक्के के छिलके से कप-प्लेट और अन्य सामान बनाने के पीछे पूरे 10 साल की संघर्ष की कहानी छुपी है. नाज इंजिनियरिंग कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर थे, लेकिन नौकरी छोड़ गांव में आकर बसना और नए सिरे से सबकुछ शुरू करना उतना आसान नहीं था, लेकिन मेरा बस एक ही उद्देश्य था कि समाज को इस प्लास्टिक के अभिशाप से दूर करूं.
"मेरा सपना था कि वेस्ट सामग्री से उपयोगी उत्पाद बनाया जाए. मक्के का छिलका सबसे बेहतर लगा. अगर हम प्लास्टिक को थोड़ा-थोड़ा भी कम कर पाए, तो यही मेरी सबसे बड़ी सफलता होगी."- इंजीनियर नाज ओजैर, युवा उद्यमी
क्या कहता है डॉक्टरों का रिसर्च: डॉक्टरों और रिसर्च रिपोर्ट्स में यह बात सामने आई कि प्लास्टिक के लगातार उपयोग से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है. यही वह क्षण था, जिसने नाज को झकझोर दिया और उन्होंने प्लास्टिक के विकल्प पर शोध करने का संकल्प ले लिया.

पर्यावरण की रक्षा के लिए छोड़ दी नौकरी: उन्होंने बीटेक मैकेनिकल और एमटेक की पढ़ाई पूरी की है. पढ़ाई के बाद हैदराबाद में करीब 60 हजार रुपये मासिक वेतन की नौकरी भी मिली, लेकिन उनका मन वहां नहीं लगा. उन्हें लगता था कि केवल नौकरी करने से ज्यादा जरूरी है, समाज और पर्यावरण के लिए कुछ करना. इसी सोच के साथ नाज ने नौकरी छोड़ी और अपने गांव मुरादपुर लौट आए.
5 साल तक नहीं मिली कामयाबी: गांव लौटने के बाद नाज ने प्लास्टिक के विकल्प पर गंभीर शोध शुरू किया. शुरुआती पांच वर्षों तक उन्होंने बांस, केला, पपीता जैसे पौधों पर प्रयोग किया, लेकिन उन्हें वह सफलता नहीं मिली जिसकी तलाश थी. इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान मक्के पर केंद्रित कर दिया.

कैसे आया आइडिया?: मक्का बिहार में बड़े पैमाने पर उगाया जाता है और इसके छिलके को किसान आमतौर पर बेकार समझकर फेंक देते हैं या जला देते हैं, जिससे भारी प्रदूषण होता है. नाज बताते हैं कि एक दिन वह दोस्त की शादी में जा रहे थे. रास्ते में उन्होंने देखा कि गाड़ियां मक्के के खेत में गिरी मक्के की बालियों पर चढ़ती चली जा रही थीं, लेकिन बालियों के पत्तों पर कोई खास असर नहीं पड़ रहा था.
मजबूत और टिकाऊ छिलका: जब उन्होंने उस मक्के की बाली को उठाकर ध्यान से देखा, तो समझ आया कि मक्के का छिलका बेहद मजबूत और टिकाऊ होता है. यहीं से उन्हें नया रास्ता मिल गया. पिछले पांच वर्षों तक लगातार रिसर्च के बाद नाज ने मक्के के छिलके से डिस्पोजेबल कप और प्लेट बनाने में सफलता हासिल की.

सस्ते और बायोडिग्रेडेबल: यह वही छिलका है, जिसे न तो मवेशी खाते हैं और न ही किसानों के किसी काम आता है. अब वही छिलका पर्यावरण अनुकूल उत्पाद में बदल रहा है. मक्के के छिलके से बने कप और प्लेट न केवल सस्ते हैं, बल्कि पूरी तरह बायोडिग्रेडेबल ( ऐसा प्रोड्क्ट जो बैक्टीरिया, कवक या अन्य सूक्ष्मजीवों द्वारा प्राकृतिक रूप से छोटे-छोटे टुकड़ों में टूट जाता है. पर्यावरण में वापस मिल जाता है, जिससे प्रदूषण नहीं होता है.) भी हैं.
सालाना कमाई पांच लाख: नाज एक कप करीब डेढ़ रुपये और प्लेट दो रुपये में बेचते हैं. वह किसानों से मक्के का छिलका एक से दो रुपये प्रति किलो की दर से खरीदते हैं. एक किलो छिलके से करीब 200 कप तैयार हो जाते हैं. एक कप पर लगभग 45 पैसे की लागत आती है. नाज बताते हैं कि रोजाना करीब एक हजार रुपये तक की आमदनी हो जाती है और सालाना कमाई पांच लाख रुपये तक पहुंच रही है.

प्रदूषण कम करने के साथ आय का जरिया: इस नवाचार से किसानों को भी फायदा हो रहा है. जो छिलका पहले बेकार समझकर फेंक दिया जाता था, अब वही किसानों के लिए अतिरिक्त आय का जरिया बन गया है. इसके साथ ही छिलका जलाने से होने वाला प्रदूषण भी कम हो रहा है.
रेलवे से मिल चुका है 30 लाख का ऑर्डर: नाज के बनाए उत्पादों की मांग तेजी से बढ़ रही है. फिलहाल मक्के के छिलके से बने कप और प्लेट का इस्तेमाल पूजा-पाठ और प्रसाद वितरण में किया जा रहा है. इतना ही नहीं, नाज को रेलवे से करीब 30 लाख रुपये का ऑर्डर भी मिल चुका है. यह उनके काम की बड़ी पहचान मानी जा रही है.

फरवरी 2024 पेटेंट: लगातार संघर्ष और शोध के बाद नाज को फरवरी 2024 में अपने उत्पाद का पेटेंट भी मिल गया. पेटेंट प्रक्रिया के दौरान चीन और जापान के वैज्ञानिकों ने भी इस तकनीक पर दावा किया था, लेकिन अंततः नाज को सफलता मिली. पेटेंट मिलने के बाद उनके काम की चर्चा देश-विदेश तक होने लगी है.
"प्लास्टिक में खाना खाने से शरीर में हजारों माइक्रोप्लास्टिक कण चले जाते हैं, जो कैंसर जैसी बीमारियों का कारण बन सकते हैं. आईआईटी खड़गपुर के प्रोफेसरों की रिसर्च के अनुसार पेपर कप में चाय पीने से भी करीब 25 हजार प्लास्टिक कण शरीर में प्रवेश कर सकते हैं."- इंजीनियर नाज ओजैर, युवा उद्यमी

फिलहाल नाज की फैक्ट्री में पांच लोग काम कर रहे हैं, जिनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं. उन्होंने गांव में रहकर रोजगार का नया मॉडल खड़ा किया है. हालांकि शुरुआत में उन्हें काफी विरोध और ताने भी सुनने पड़े. परिवार और गांव के लोग मजाक उड़ाते थे कि नौकरी छोड़कर यह क्या करेगा, लेकिन नाज अपने लक्ष्य पर डटे रहे.
प्लास्टिक के 100 उत्पादों को पूरी तरह से रिप्लेस करना मकसद: नाज ओजैर का सपना आने वाले 10 वर्षों में प्लास्टिक के कम से कम 100 उत्पादों को पूरी तरह से रिप्लेस करने का है. फिलहाल वह कप और प्लेट के अलावा स्ट्रॉ, साबुन रैपर, बिस्कुट रैपर, चॉकलेट रैपर, पेन जैसे कई उत्पादों पर काम कर रहे हैं.

कैसे बनाए जाते हैं छिलके से कप-प्लेट?: मकई के छिलके को ऊपर और नीचे से एक-एक इंच काटना पड़ता है. इसस यह तीन-चार इंच चौड़े आकार में हो जाता है. इसकी लंबाई छह इंच तक होती है. प्लेट बनाने में पांच से छह पत्ते (मक्का) लगते हैं.
घर पर बनाई लेई से इसे चिपकाया जाता है, फिर प्लेट बनाने वाली डाई मशीन पर रखकर आकार देकर काटा जाता है. इसी तरह प्लेट और कटोरी भी बनाते हैं. एक पत्तल बनाने में 50 पैसे का खर्च आता है. नाज के प्रोडक्ट वाटरप्रूफ हैं.
कितने लोगों को रोजगार: नाज ओजैर कहते हैं कि फिलहाल उनकी फैक्ट्री छोटी-सी कुटिया में चल रही है. लेकिन जल्द की 2000 स्क्वायर फीट में फैक्ट्री के कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा है. महीने का 30-35 हजार का कोराबार है और लगभग 5-6 लोगों को रोजगार मिला है. फैक्ट्री को वृहत रूप देने के बाद विदेशों के ऑर्डर पूरे किए जाएंगे.

1 हजार बच्चों को ट्रेनिंग: नाज दो दर्जन स्कूलों में जाकर लगभग एक हजार बच्चों को यह तकनीक सीखा चुके हैं. मक्का वैज्ञानिक भी मानते हैं कि मक्के का छिलका प्लास्टिक का बेहतर विकल्प साबित हो सकता है. यह सस्ता होने के साथ ही उपयोगी भी है.
ये भी पढ़ें
INSPIRING STORY: विदेश की नौकरी छोड़ बिहार के अमेश विशाल बने किसान, ताइवान पिंक अमरूद से हुए मालामाल
बिहार की सीमा, मरियम और राधिका की कहानी, कूड़ा चुनने से लेकर शेफ तक का सफर
एक ऐप ने बदल दी लाखों दिहाड़ी मजदूरों की दुनिया, जानिए कैसे जन्म हुआ ‘Digital Labour Chowk’ का
बेटा-बहू IPS, बेटी PCS, फिर भी किताब बेचते हैं 64 साल के अनिल कुमार

