Exclusive Interview: मुस्कान नेगी और म्यूजिक की लव स्टोरी, आंखों में रोशनी नहीं पर संगीत में पीएचडी, अमेरिका में किया परफॉर्म
एक छोटे से पहाड़ी गांव की लड़की की आवाज अमेरिका तक गूंजी, वो देख नहीं सकती लेकिन आज वो कईयों के लिए प्रेरणा है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : December 20, 2025 at 8:47 PM IST
शिमला से श्रेया शर्मा की रिपोर्ट
'5 से 6 साल की उम्र तक मुझे थोड़ा बहुत दिखाई देता था, मुझे लगता था कि शायद सबको इतना ही दिखाई देता होगा, सब इतना ही देख पाते होंगे, मुझे पता ही नहीं लग रहा था कि मैं क्यों नहीं पढ़ पा रही हूं.'
29 साल की मुस्कान नेगी अब बिल्कुल नहीं देख पातीं, लेकिन मुस्कान ने इस कमी को इतना बौना साबित कर दिया है कि उनकी कहानी सुनने वाला हर शख्स उन्हें सलाम करेगा. मुस्कान नेगी ने हिमाचल प्रदेश यूनिवर्सिटी से संगीत में पीएचडी डिग्री हासिल कर ली है और ऐसा करने वाली वो हिमाचल प्रदेश की पहली शत प्रतिशत दृष्टिबाधित महिला हैं. ये सफर न आसान रहा न छोटा लेकिन मुमकिन हुआ सिर्फ और सिर्फ मुस्कान की मेहनत की बदौलत.
7 साल की उम्र में कड़वी सच्चाई से सामना
शिमला जिले की चिड़गांव तहसील के संदासली गांव में मुस्कान का जन्म हुआ. जहां उनके किसान पिता और गृहणी मां आज भी रहते हैं. मुस्कान के जहन में गांव के स्कूल में पढ़ाई और बच्चों के साथ खेलकूद की यादें आज भी ताजा हैं. शुरुआती सालों में वो अपनी धुंधली नजर को ही हकीकत मानती रहीं, लेकिन 7 साल की उम्र में जिंदगी ने सबसे कड़वी सच्चाई से सामना करवा दिया.
मुस्कान बताती हैं कि, 'बचपन में मुझे थोड़ा बहुत नजर आता था, तब लगता था कि इतना ही दिखता होगा. पढ़ने में परेशानी होती थी तो सोचती थी कि मैं क्यों नहीं पढ़ पा रही हूं. मुझे कम दिखता था, इस बात पर मैंने कभी गौर ही नहीं किया. 7 साल की उम्र में जब मुझे कुल्लू के स्पेशल स्कूल भेजा गया तब मुझे पता लगा कि मैं ब्लाइंड हूं.'
इस कड़वी हकीकत को याद करते वक्त भी मुस्कान के होठों पर मुस्कुराहट खिल उठती है. मुस्कान बताती हैं कि कुल्लू में नेशनल एसोसिएशन फॉर द ब्लाइंड स्कूल में दाखिला के बाद जब मां मुझे हॉस्टल छोड़कर गई तो लगा मेरी दुनिया उजड़ गई है, शुरुआत में फूट-फूटकर रोती थी. लेकिन, इस स्कूल से ही मुस्कान की दुनिया संवरने वाली थी.

मुस्कान और म्यूजिक की लव स्टोरी
कुल्लू के स्कूल में टीचर की गाइडेंस में मुस्कान का पहली बार संगीत से वास्ता पड़ा. फिर मुस्कान और म्यूजिक की लव स्टोरी ऐसी शुरू हुई कि आज तक कायम है. ब्रेल लिपि और ऑडियो बुक्स के सहारे मुस्कान ने कुल्लू से 10वीं और शिमला के मशहूर पोर्टमोर स्कूल से 12वीं पास की. फिर शिमला के आरकेएमवी कॉलेज से संगीत में ग्रेजुएशन और एचपीयू से एमए की डिग्री ली. इस बीच उन्होंने एमफिल में भी एडमिशन ले लिया. ये सारी डिग्रियां म्यूजिक में ही आईं, लेकिन अब भी बचपन में सोचा सबसे बड़ी डिग्री का ख्वाब अभी दूर था. जिसे पाने में मुस्कान को 5 साल का वक्त लगा.

बचपन से ही सोचती थी कि सबसे बड़ी डिग्री लेकर रहूंगी, पीएचडी करूंगी. जब एमए तक पहुंची तो लगा कि मुझसे नहीं होगा. ये थीसिस लिखना और रिसर्च का काम थोड़ा मुश्किल है. फिर मैंने एमफिल में एडमिशन ली और अगले ही साल मैंने पीएचडी में एडमिशन लिया. हालांकि एक समय ऐसा भी आया जब लगा कि नहीं हो पाएगा, मैं छोड़ दूंगी, नहीं कर पाऊंगी. सोचती थी कि अभी एमफिल का काम शुरू हुआ नहीं पीएचडी कैसे होगी. लेकिन, मैंने सोचा जब एक बार एडमिशन ले लिया है तो कर लेते हैं, करके देखने में क्या हर्ज है. - मुस्कान नेगी, पीएचडी होल्डर
जिस कॉलेज से डिग्री ली वहीं प्रोफेसर हैं मुस्कान
NET (National Eligibility Test) और SET (State Eligibility Test) पहले अटेम्प्ट में ही क्लीयर कर चुकीं मुस्कान की मेहनत 2023 में रंग लाई. जब उन्हें संगीत के प्रोफेसर के तौर पर नौकरी मिली और किस्मत का पहिया उन्हें शिमला के उसी आरकेएमवी कॉलेज ले गया जहां से उन्होंने कुछ बरस पहले संगीत में ग्रेजुएशन की थी. फिलहाल वो असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर हैं और बच्चों को उसी संगीत से रूबरू करवा रही हैं, जिसने उनको इस मुकाम तक पहुंचाया.

मुस्कान बताती हैं कि 'ऑडियो बुक्स के जरिए सिलेबस को सुनना और याद करना एक बड़ी चुनौती थी, जिसे उन्होंने अपनी आदत बना लिया. वह कहती हैं, मैं बहुत ज्यादा 'पढ़ाकू' नहीं थी, लेकिन क्लास कभी मिस नहीं करती थी. संगीत से ऐसा लगाव था कि सुबह से शाम तक कॉलेज में बैठी रहूं, तो भूख भी नहीं लगती थी.'
शिमला के दूर दराज गांव की नन्ही सी मुस्कान अब डॉ. मुस्कान नेगी हो गई हैं. प्राइमरी से पीएचडी के सफर में उन्हें कई लोगों का साथ मिला और इसके लिए वो अपने माता-पिता से लेकर टीचर्स, दोस्त और खासकर पीएचडी के दौरान गाइड रहे मृत्युंजय शर्मा सर का जिक्र करना नहीं भूलतीं. मुस्कान के गुरु भी अपनी शिष्या की मेहनत और जज्बे के कायल हैं.
यूनिवर्सिटी से संगीत में एमए, एमफिल और पीएचडी के सफर के दौरान मुस्कान ने असाधारण कड़ी मेहनत की है. उन्होंने अपनी दृष्टिबाधिता को कभी बाधा नहीं बनने दिया, बल्कि इसे एक चुनौती के रूप में स्वीकार कर उस पर विजय प्राप्त की है. उच्च शिक्षा के स्तर पर केवल ब्रेल में उपलब्ध कोर्स मैटेरियल के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होता, इसलिए मुस्कान ने आधुनिक तकनीक अपनाते हुए 'टॉकिंग सॉफ्टवेयर' वाले लैपटॉप और मोबाइल के माध्यम से ई-रिसोर्सेस का अधिकतम उपयोग किया. - डॉ. मृत्युंजय शर्मा, मुस्कान के शोध निर्देशक
म्यूजिक की बदौलत पहली हवाई और विदेश यात्रा
उधर मुस्कान और म्यूजिक की जुगलबंदी चलती रही, जिसे अब 20 साल से ज्यादा का वक्त हो गया है. अब उनके गाए गाने किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकते हैं. म्यूजिक की कई प्रतियोगिताएं जीत चुकीं मुस्कान अपने संगीत प्रेम की बदौलत 7 समंदर पार भी अपनी आवाज का जादू बिखेर चुकी हैं.

2018 में ऑनलाइन रेडियो 'उड़ान' की एक सिंगिंग कॉम्पिटिशन जीतने के बाद मुझे अमेरिका जाने का मौका मिला था. हमारा 10 लोगों का ग्रुप था, हमने बोस्टन, न्यूयॉर्क, न्यू जर्सी, वाशिंगटन और कैलिफोर्निया में हमने शोज किए थे. तब मैं पहली बार फ्लाइट में बैठी और पहली बार विदेश गई थी. ये मेरे लिए सपनों की उड़ान जैसा था. - मुस्कान नेगी, पीएचडी होल्डर
चुनाव आयोग की स्टेट यूथ आइकन
मुस्कान ने अपनी मेहनत और जज्बे से जो मुकाम हासिल किया है. उसे देखते हुए चुनाव आयोग ने भी उन्हें 4 बार (2017, 2019, 2022, 2024) स्टेट यूथ आइकन बनाया. उस दौरान मुस्कान ने लोगों को वोट देने के लिए प्रेरित किया और कहा कि "जब मैं वोट देकर अपनी जिम्मेदारी निभा सकती हूं तो आप लोग क्यों नहीं?'

मुस्कान उन छात्र-छात्राओं के लिए भी प्रेरणा हैं. जिन्हें वो संगीत सिखाती हैं. स्टूडेंट अपनी मुस्कान मैडम की तारीफ किए नहीं थकते. छात्र कहते हैं कि, 'मुस्कान मैडम हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करती हैं. हमारी मदद के लिए हर वक्त खड़े रहने का भरोसा देती हैं. वो हमारे लिए मिसाल हैं और उन्हें देखकर हमें भी आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है'
आरकेएमवी कॉलेज की प्रिंसिपल प्रोफेसर अनुरिता सक्सेना कहती हैं कि, 'डॉ. मुस्कान नेगी कभी इसी कॉलेज की छात्रा रही हैं और आज असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में यहां पढ़ा रही हैं, जो पूरे संस्थान के लिए गर्व की बात है. एक दृष्टिबाधित महिला होते हुए उन्होंने पीएचडी पूरी की और यह साबित किया कि दृढ़ संकल्प के आगे कोई बाधा नहीं टिकती. कॉलेज में वह पूरी निष्ठा और ईमानदारी से अपने दायित्व निभा रही हैं और छात्रों के लिए प्रेरणास्रोत हैं.'

'कुछ भी हो जाए हार नहीं माननी चाहिए'
मुस्कान के दो बड़े भाई और एक छोटी बहन हैं. माता-पिता भाई-बहन को मुस्कान की उपलब्धि पर खुशी है. अपने माता-पिता को मुस्कान सबसे बड़ी ताकत बताती हैं. "मेरे माता-पिता मेरी रीढ़ हैं. जब मैं छोटी थी तब बाकी बच्चों के साथ बेधड़क भागती-दौड़ती थी. उन्हें पता था कि मुझे कम दिखता है, लेकिन उन्होंने मुझे कभी कमजोर नहीं कहा. जब मुझे पीएचडी का सर्टिफिकेट मिला और मेरा वाइवा (Viva) हुआ, तब भी मेरे माता-पिता मेरे साथ खड़े थे. मैं भले देख ना पाऊं लेकिन जानती हूं कि उनकी आंखों में गर्व के आंसू थे, वही मेरी असली डिग्री है."
मुस्कान ने अपनी कमी को कभी भी आड़े नहीं आने दिया. किसी ने सच ही कहा है कि मेहनत, हौसले और जज्बे का कोई शॉर्ट कट नहीं होता है. यही टिप्स मुस्कान नेगी आज के युवाओं को भी देती हैं.
हार तो बिल्कुल नहीं माननी है. हर चीज की शुरुआत करके देखो, संकल्प अगर दृढ़ हो तो रास्ते अपने आप बनते चले जाते हैं. जैसे मैंने पीएचडी के वक्त सोचा था कि मुझसे नहीं होगा, लेकिन फिर भी मैंने सोचा करके देखना चाहिए और फिर रास्ता निकल ही आया. उसी तरह सबसे कहती हूं कि हार बिल्कुल नहीं माननी है, कड़ी मेहनत करें तो मंजिल जरूर मिलेगी. - मुस्कान नेगी, पीएचडी होल्डर
मुस्कान ने अपने अनुभवों के आधार पर सरकारों को एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया है कि सभी पुस्तकालयों में किताबें 'डिजिटल फॉर्मेट' में उपलब्ध होनी चाहिए ताकि दृष्टिबाधित छात्रों को दूसरों पर निर्भर न रहना पड़े. मुस्कान नेगी की कहानी साबित करती है कि आंखों में रोशनी न होना मंजिल के रास्ते की रुकावट नहीं बन सकता, अगर आपके सपनों में जान और हौसलों की उड़ान भरने की हिम्मत हो तो हर मंजिल कदम चूमती है.
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