देश की पहली अंडरवाटर रेल-रोड टनल कितनी अहम? क्या चीन-बांग्लादेश के खतरों से निपटने में करेगी मदद
असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे प्रस्तावित है रेल-रोड टनल. 36 किमी लंबी टनल का 16 किमी हिस्सा पानी में होगा.

Published : February 20, 2026 at 2:04 PM IST
हैदराबाद: तकनीक और इंजीनियरिंग के चमत्कार की बात जब आती है तो जापान का नाम सबसे पहले आता है. दरअसल, 1988 में समुद्र के नीचे बनी सीकन टनल (Seikan Tunnel) दुनिया की पहली अंडर वाटर रेल टनल है. लेकिन, अब भारत ने इंजीनियरिंग के इस चमत्कार की दिशा में कदम आगे बढ़ा दिया है. भारत असम में ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे पानी के बीच रेल-रोड टनल बनाने जा रहा है. इस परियोजना को सरकार ने मंजूरी दे दी है.
देश की पहली अंडरवाटर ट्विन ट्यूब रोड-रेल टनल जहां नॉर्थ ईस्ट रीजन में कनेक्टीविटी बढ़ाएगी, वहीं चिकन नेक या सिलीगुड़ी कॉरीडोर की सुरक्षा को भी मजबूत करेगी. साथ ही पड़ोसी देश चीन और बांग्लादेश की ओर से पैदा होने वाले खतरों से भी निपटने में भारत की मदद करेगी. आईए, ETV Bharat Explainer में जानते हैं, अंडरवाटर रेल-रोड टनल पड़ोसी देशों चीन-बांग्लादेश के खतरों से कैसे निपटेगी? टनल से कैसे नॉर्थ ईस्ट की कनेक्टीविटी से औद्योगिक विकास होगा, पर्यटन उद्योग फलेगा-फूलेगा, रोजगार के साधन बढ़ेंगे?
ये भी पढ़ें: पाकिस्तान में बलूचों के विद्रोह से क्यों घबराए चीन-अमेरिका? क्या खतरे में है बलूचिस्तान में दोनों की मौजूदगी
अंडरवाटर ट्विन ट्यूब रेल-रोड टनल परियोजना क्या है: कैबिनेट की आर्थिक मामलों की समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हाल ही में असम में इंजीनियरिंग प्रोक्योरमेंट कंस्ट्रक्शन (EPC) मॉडल के तहत 18,662 करोड़ रुपए की सड़क-सह-रेल सुरंग परियोजना यानी रेल कम रोड सुरंग को मंजूरी दी है. जो पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर जिले के तीन माइल हाट से सिलीगुड़ी से 11 किलोमीटर दूर रांगापानी तक करीब 36 किलोमीटर लंबी होगी.
सुरंग में रेल की पटरियां बिछाई जाएंगी और इसके समानांतर ही सड़क यातायात के लिए दूसरी टनल बनाई जाएगी. इसमें 15.79 किलोमीटर का हिस्सा ब्रह्मपुत्र नदी के नीचे पानी में बनाया जाएगा. परियोजना असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों को कनेक्ट करेगी. सुरंग असम में गोहपुर (उत्तर तट) को नुमलिगढ़ (दक्षिण तट) से जोड़ेगी. जिससे सामाजिक-आर्थिक विकास को गति मिलेगी.
ये भी पढ़ें: कौन है देश का सबसे अमीर और गरीब राज्य? एक क्लिक में जानिए, कहां के लोग कमाते हैं ज्यादा पैसा
बांग्लादेश सीमा के 2 सैन्य बेस कैंप के पास से गुजरेगी रेलवे लाइन: भारतीय सेना बांग्लादेश सीमा के पास 3 जगह नए सैन्य बेस कैंप बना रही है. रेल-रोड लाइन इनमें से दो सैन्य बेस कैंप्स के पास से होकर गुजरेगी. इनमें से एक बिहार के किशनगंज में है और दूसरा पश्चिम बंगाल के चोपड़ा में है. तीसरा सैन्य बेस कैंप असम के धुबड़ी में बन रहा है. यही नहीं पहले से मौजूद 2 ट्रैक वाली रेलवे लाइन को 4 ट्रैक में भी बदला जाएगा.
चिकन नेक कॉरिडोर क्या है: सिलीगुड़ी या चिकन नेक कॉरिडोर अभी प्रस्तावित है. ये पश्चिम बंगाल में स्थित 20-22 किमी चौड़ी और लगभग 60 किमी लंबी एक जमीनी पट्टी है जो 8 पूर्वोत्तर राज्यों (North-East) को जोड़ती है. साथ ही नेपाल, बांग्लादेश व भूटान से घिरी है. यह एक बेहद रणनीतिक इलाका है. यह चीन की चुंबी घाटी के करीब (लगभग 130 किमी दूर) स्थित है. बांग्लादेश और चीन की सीमा के करीब होने के कारण, किसी भी तरह के खतरे की स्थिति में यह हिस्सा सबसे पहले प्रभावित हो सकता है. अंडरवाटर रेल-रोड परियोजना, भारत की इसी कमजोर नस को मजबूत करने की दिशा में बड़ी पहल है.
ये भी पढ़ें: उत्तर कोरिया का अगला शासक कौन, किम जोंग उन की बेटी या बहन? तानाशाह परिवार में टेंशन
महत्वपूर्ण क्यों है चिकन नेक कॉरिडोर: नॉर्थ ईस्ट की बिजली, परिवहन लाइनें, इंटरनेट केबल, तेल और गैस पाइपलाइन भी चिकन नेक कॉरिडोर से होकर गुजरती हैं. ऐसे में जमीन के ऊपर नई रेलवे लाइन बनाना मुश्किल है. इसके अलावा यह एक घनी आबादी वाला इलाका भी है. ऐसे में किसी आपात स्थिति में बिना किसी रुकावट के आवाजाही जारी रहेगी. इसलिए चिकन नेक कॉरिडोर को सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. करीब 12 हजार करोड़ के इस प्रोजेक्ट के स्वीकार होने पर देश की सुरक्षा और मजबूत होगी.
अंडरवाटर रेल-रोड टनल देश की सुरक्षा में कैसे बनेगी मददगार: नेपाल, भूटान और बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय सीमा रेल-रोड सुरंग के बेहद करीब है. किसी प्राकृतिक और सुरक्षा संबंधी समस्या की स्थिति में रोड-रेलवे लाइन काफी महत्वपूर्ण साबित होगी. इससे सेना के जवानों और सैन्य साजो-सामान को आसानी से और सुरक्षित रूप में सीमा पर भेजा जा सकेगा. इसके अलावा प्राकृतिक आपदा की स्थिति में राहत सामग्री पहुंचाने में भी बड़ी मदद मिलेगी. बता दें, इसी रेलवे लाइन के पास बागडोगरा में एयरपोर्ट है और उसके पास ही भारतीय सेना के 33वें कोर का मुख्यालय और बेंगडुबी मिलिट्री स्टेशन भी है. ऐसे में ये परियोजना रेलवे और उड़ानों के बीच संपर्क बहाल करने में भी मदद करेगी.
ये भी पढ़ें: भारत का 'पिनाका' कितना खतरनाक? राफेल डील के साथ जिसका फ्रांस कर सकता है सौदा
परियोजना का मार्ग 2 नेशनल हाईवे और जो रेलवे लाइनों से जुड़ रहा: परियोजना का मार्ग 2 प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों एनएच-15 और एनएच-715 के साथ ही दो रेलवे लाइनों से जुड़ता है, जिनमें गोहपुर की ओर एनएफआर के रंगिया डिवीजन के अंतर्गत रंगिया-मुकोंगसेलेक रेलवे खंड और नुमालीगढ़ की ओर एनएफआर के तिनसुकिया डिवीजन के अंतर्गत फुरकटिंग-मारियानी लूप लाइन खंड शामिल हैं.
नुमालीगढ़ और गोहापुर के बीच की दूरी होगी कम: वर्तमान में, एनएच-715 (तेजपुर और झांजी को जोड़ने वाला हाईवे) पर स्थित नुमालीगढ़ और एनएच-15 (असम के बैहाटा को अरुणाचल प्रदेश के वाकरो से जोड़ने वाला हाईवे) पर स्थित गोहपुर के बीच की दूरी एनएच-52 पर सिलघाट के पास स्थित कालियाभम्भोरा सड़क पुल से 240 किलोमीटर है. इसमें नुमालीगढ़, काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान और विश्वनाथ कस्बे से होते हुए 6 घंटे का समय लगता है. रेल-रोड परियोजना से यह दूरी घटकर मात्र 34 किलोमीटर रह जाएगी. साथ ही यात्रा का समय 6 घंटे से घटकर मात्र 20 मिनट रह जाएगा.
अंडरवाटर रेल-रोड टनल खोलेगी रोजगार के नए साधन: अंडर वाटर रेल-रोड टनल परियोजना असम के प्रमुख आर्थिक, सामाजिक और लॉजिस्टिक्स केंद्रों को जोड़ेगी. इसके अलावा, यह परियोजना 11 आर्थिक केंद्रों, 3 सामाजिक केंद्रों, 2 पर्यटन केंद्रों और 8 लॉजिस्टिक्स केंद्रों को जोड़ेगी. साथ ही 4 प्रमुख रेलवे स्टेशनों, 2 हवाई अड्डों और 2 अंतर्देशीय जलमार्गों से बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी. जो इस क्षेत्र में माल और यात्रियों की आवाजाही बढ़ाएगा. साथ ही इस परियोजना से लगभग 80 लाख व्यक्ति-दिवस का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार भी सृजित होगा. क्षेत्रों में विकास, उन्नति और समृद्धि के नए रास्ते खुलेंगे.
दुनिया में कहां-कहां है अंडरवाटर रेल-रोड टनल: दुनिया में भारत से पहले डेनमार्क और स्वीडन अंडरवाटर रेल-रोड टनल बना चुके हैं. ओरेसुंड सुरंग दुनिया की सबसे लंबी अंडरवाटर रेल-रोड टनल है, जिसमें सड़क यातायात के लिए दो सुरंग ट्यूब, रेलवे के लिए दो ट्यूब और एक सेवा और आपातकालीन ट्यूब शामिल हैं. कोपेनहेगन हवाई अड्डे से आने-जाने वाले हवाई यातायात में व्यवधान से बचने और ओरेसुंड जलडमरूमध्य से बड़े जहाजों के सुगम आवागमन को सुनिश्चित करने के लिए यह सुरंग काफी आवश्यक मानी जाती है. यह सुरंग वेंटिलेशन, प्रकाश व्यवस्था और सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक से सुसज्जित है, जो इसे कार और ट्रेन दोनों के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय मार्ग बनाती है.
ये भी पढ़ें: आसमान में 15.8 हजार टन कचरा, हवाई उड़ानों पर बना बड़ा खतरा; 3 बार ट्रैफिक जाम, फ्लाइट डिले

