देश के 8 पहाड़ी रूटों पर चलेंगी 35 हाइड्रोजन ट्रेनें; एक ट्रेन पर 80 करोड़ रुपये खर्च करेगा रेलवे
पहाड़ों पर इलेक्ट्रिफिकेशन की चुनौती का रेलवे ने निकाला तोड़, जींद-सोनीपत रूट पर दौड़ रही देश की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन ट्रेन.

Published : August 31, 2026 at 4:37 PM IST
हैदराबाद : Hydrogen for Heritage : पहाड़ी रूटों पर इलेक्ट्रिफिकेशन (विद्युतीकरण) अभी भी चुनौती बनी हुई है. अपने देश को साल 2070 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन (Net Zero) का लक्ष्य भी हासिल करना है. इसी के मद्देनजर रेलवे ने देश के पहाड़ी इलाकों में 35 हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने की योजना तैयार की है. 'हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज' योजना के तहत रेलवे को इसके लिए प्रति ट्रेन 80 करोड़, जबकि प्रति रूट 70 करोड़ रुपये खर्च करने होंगे.
जींद-सोनीपत रूट पर 17 जुलाई 2026 से देश की पहली कमर्शियल हाइड्रोजन ट्रेन चल रही है. 90 किलोमीटर की दूरी को यह हाइड्रोजन ट्रेन करीब 2 घंटे में तय कर ले रही है. इसका किराया 5 से लेकर 25 रुपये तक है. इससे लोगों का समय भी बच रहा है, और सफर के लिए ज्यादा रुपये भी नहीं खर्चने पड़ रहे हैं. रेलवे ने अब इस प्रोजेक्ट को विस्तार देने की रणनीति तैयारी की है. इसके लिए देश के पहाड़ी रूटों को चुना गया है.
केंद्र सरकार की ओर से भी हरित हाइड्रोजन और अन्य औद्योगिक कार्यों में उपयोगी इलेक्ट्रोलाइजर उपकरणों के निर्माण को बढ़ावा दिया जा रहा है. इसके लिए नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन के तहत 2029-30 तक कुल 17 हजार 490 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. इससे जीवाश्म आधारित ईंधन यानी पेट्रोल-डीजल और कोयले पर निर्भरता खत्म होगी. इसके अलावा ईंधन के लागत में भी गिरावट आएगी.
क्या है रेलवे की हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज योजना? : प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो (PIB) के अनुसार देश के कई पहाड़ी मार्ग प्राकृतिक रूप से संवेदनशील हैं. यानी वहां डीजल आधारित ट्रेनें चलाने पर पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है. ऐसे इलाकों में पर्यावरण के अनुकूल सफर के लिए हाइड्रोजन ट्रेनें बेहतर विकल्प हैं. ये ट्रेनें हाइड्रोजन ईंधनों से चलती है. इससे प्रदूषण भी नहीं होता है. इसी वजह से हाइड्रोजन फॉर हेरिटेज योजना का खाका खींचा गया है.

हाइड्रोजन ट्रेनों के लिए 8 रूट निर्धारित : रेल मंत्रालय और संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार 35 हाइड्रोजन ट्रेनों को चलाने के लिए देशभर में 8 पहाड़ी रूट तय कर लिए गए हैं. इनमें कालका-शिमला, कांगड़ा घाटी, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, नीलगिरी माउंटेन, माथेरान हिल, बिलमोरा-वाघई, मऊ-पातालपानी और मारवाड़-देवगढ़ मदारिया रूट शामिल हैं. इनमें से कालका-शिमला समेत कई अन्य रूटों पर हाइड्रोजन ट्रेनों को दौड़ाने के लिए काम भी चल रहा है.
पहाड़ों में दौड़ेगी हाइड्रोजन ट्रेन! रेलवे की 35 ट्रेनों की तैयारी, बढ़ेगा ग्रीन रेल नेटवर्क#IndianRailways #HydrogenTrain #GreenRailways #RailwayNews pic.twitter.com/kzAodwIcLF
— Indian Railway भारतीय रेल (News Update) (@Indianrailgadi) August 20, 2026
35 हाइड्रोजन ट्रेनों पर खर्च होंगे 2800 करोड़ : प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो (PIB) के अनुसार पहाड़ी रूटों पर चलाई जाने वाली हाइड्रोजन ट्रेनों पर कुल 2800 करोड़ रुपये खर्च होंगे. एक हाइड्रोजन ट्रेन की अनुमानित लागत करीब 80 करोड़ रुपये आएगी. वहीं कुल 8 रूटों में से प्रत्येक रूट पर 70 करोड़ रुपये खर्च होंगे. यानी इन रूटों को हाइड्रोजन ट्रेनों के दौड़ने लायक बनाने में कुल 560 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है.
रूटों को बनाने में आ रहीं ये समस्याएं : रेलवे की ओर से 8 पहाड़ी रूटों को विकसित करने के लिए साल 2030 तक का टाइम लाइन तय किया गया है. हालांकि इन रूटों को विकसित करने में रेलवे को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. हाइड्रोजन गैस को संकरे पहाड़ी रास्तों और दूर-दराज के इलाकों में पहुंचाना बड़ी चुनौती है. इन हेरिटेज रूटों पर संकरी और बेहद घुमावदार पटरियां हैं. हाइड्रोजन ट्रेनों को इस हिसाब से डिजाइन करना होगा.

पहाड़ों पर विद्युतीकरण बड़ी समस्या : देशभर में अभी तक डीजल और बिजली आधारित ट्रेनें ही चलती रहीं हैं. डीजल इंजनों से छुटकारा पाने के लिए रेलवे की ओर से बड़े पैमानों पर विद्युती कराया गया. हालांकि अभी भी कई पहाड़ी इलाकों के रेलवे मार्गों पर विधुतीकरण बड़ी समस्या है. पीआईबी और रेल मंत्रालय के अन्य सोर्सों के अनुसार पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन और भारी बर्फबारी के कारण तकनीकी टीमों का कई बार पहुंचना मुश्किल हो जाता है. ज्यादा घुमावदार और तंग रास्ते भी मुश्किलें खड़ी करते हैं. ऐसे में हाइड्रोजन ट्रेनें बेहतर विकल्प हैं.
स्विट्ज़रलैंड के बाद दुनिया का दूसरा देश बना भारत : प्रसार भारती की रिपोर्ट के अनुसार देशभर में ब्रॉड गेज रेल नेटवर्क का 99.6 प्रतिशत हिस्सा अब पूरी तरह इलेक्ट्रिफाइड हो चुका है, इस मामले में स्विट्जरलैंड के बाद अपना देश दूसरे नंबर पर आ गया है. हाल ही में लोकसभा में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बताया कि भारतीय रेलवे ने अपने लगभग पूरे ब्रॉड गेज नेटवर्क का इलेक्ट्रिफिकेशन कर लिया है, जबकि बाकी रूटों पर काम चल रहा है. 2014 से पहले के लगभग छह दशकों में 21 हजार 801 रूट किलोमीटर का इलेक्ट्रिफिकेशन हुआ था. 2014 से 2026 के बीच अतिरिक्त 48,072 रूट किलोमीटर इलेक्ट्रिफिकेशन किया गया.
हाइड्रोजन ट्रेन ने 36 टन कार्बन एमिशन घटाया : मीडिया रिपोर्ट के अनुसार जींद-सोनीपत रूट पर 17 जुलाई 2026 से चल रही देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन ने अब तक 6 हजार किलोमीटर से भी ज्यादा का सफर पूरा कर लिया है. इस दौरान इस ट्रेन ने करीब 36 टन कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को घटाया. इस ट्रेन में कुल 10 कोच हैं. इसमें करीब 2,600 यात्री बैठ सकते हैं. यह 110 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है.

जींद में सबसे बड़ा रेलवे हाइड्रोजन भंडारण : पीआईबी के अनुसार जींद में देश का सबसे बड़ा रेलवे हाइड्रोजन भंडारण है. यहां ईंधन भरने की मशीनें लगी हैं. इस पूरे स्वदेशी संयंत्र में एक बार में लगभग 3,000 किलोग्राम कंप्रेस्ड हाइड्रोजन गैस का भंडारण हो सकता है. पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन (PESO) ने इस संयत्र को लाइसेंस जारी किया है. इस हाइड्रोजन इकोसिस्टम का सुरक्षा मूल्यांकन भी कराया गया है. दुनिया की अग्रणी तकनीकी निरीक्षण और प्रमाणन एजेंसी जर्मनी की TUV SUD ने इसे प्रमाणित किया है.
हाइड्रोजन ट्रेनें चलाने वाला दुनिया का पांचवां देश है भारत : दुनिया के कई देशों में पहले से ही हाइड्रोजन ट्रेनें चल रहीं हैं. हालांकि ये काफी सीमित मात्रा में ही हैं. जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और चीन के बाद भारत हाइड्रोजन ईंधन से ट्रेन चलाने वाला विश्व का पांचवां देश बन गया है. दुनिया में सबसे पहले जर्मनी में हाइड्रोजन ट्रेन चली थी. जापान, अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण कोरिया भी यह तकनीक अपनाने वाले हैं. इन देशों से इसे लेकर तमाम कार्य हो रहे हैं.
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