देश के 50% जिलों में जल संकट का अलर्ट, वाटर स्ट्रेस की स्थिति GDP को 6% नुकसान का खतरा
Climate Change Water Stress: देश के लगभग 60 करोड़ लोग जल तनाव वाले क्षेत्रों में रह रहे. हर साल होती 2 लाख लोगों की मौत.

Published : June 13, 2026 at 4:32 PM IST
|Updated : June 15, 2026 at 9:20 AM IST
India Water Crisis: देश इन दिनों एक बड़े संकट की राह पर है. ये संकट, अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच जंग, मिडिल ईस्ट और पश्चिम एशिया तनाव के चलते नहीं बल्कि, हमारे और आपके द्वारा तैयार किया गया है. ये है जल संकट. नीति आयोग की ताजा रिपोर्ट (NITI Aayog Water Report) के अनुसार, देश वर्तमान में गंभीर जल संकट का सामना कर रहा है.
लगभग 60 करोड़ लोग अत्यधिक जल तनाव (Water Stress) वाले क्षेत्रों में रह रहे हैं. यही हाल रहा तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भी खराब हो सकती है. क्योंकि, जितना देश में पानी है, यानी सप्लाई है, डिमांड उससे दोगुनी होने के कगार पर है. रिपोर्ट में 2050 तक गंभीर जल संकट पैदा होने की चेतावनी भी दी गई है. ऐसी स्थिति में देश के 50% से अधिक जिलों में पानी की भयंकर किल्लत हो सकती है. यही नहीं, ये जल संकट देश की कुल जीडीपी में लगभग 6% तक की गिरावट भी ला सकता है.
देश में कितना पानी: भारत देश के पास दुनिया के कुल ताजे पानी (Freshwater) का केवल 4% हिस्सा ही है. जबकि यहां विश्व की 17% से अधिक आबादी रहती है. देश में होने वाली सालाना बारिश से करीब 4,000 घन किलोमीटर पानी मिलता है.

इसके अलावा, नदियों में कुल जल प्रवाह लगभग 1,869 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) होने का अनुमान है. देश में उपयोग किए जाने वाले पानी का बड़ा हिस्सा नदियों और भूमिगत जल (Groundwater) से आता है. भारत में 71% जल संसाधन की मात्रा देश के 36 प्रतिशत क्षेत्रफल में सिमटी है. वहीं, 64% क्षेत्रफल के पास सिर्फ 29% ही पानी है. जिसके चलते पानी की भारी किल्लत होती है.
दुनिया में कहां पर सबसे ज्यादा जल संकट: World Resources Institute (WRI) के 'एक्वाडक्ट वॉटर रिस्क एटलस' के डेटा के अनुसार, वर्तमान में 25 देश हर साल पानी के संकट (वाटर स्ट्रेस) का सामना कर रहे हैं. इनमें टॉप-5 देश बहरीन, साइप्रस, कुवैत, लेबनान, ओमान और कतर हैं. इन देशों में संकट मुख्य रूप से कम सप्लाई और घरेलू, खेती, इंडस्ट्री में पानी की मांग के कारण है.
इसका मतलब है कि ये देश सिंचाई, पशुपालन, इंडस्ट्री और घरेलू जरूरतों के लिए अपनी रिन्यूएबल पानी की सप्लाई का 80% से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. थोड़े समय के सूखे से भी इन जगहों पर पानी खत्म होने का खतरा पैदा हो जाता है. कभी-कभी सरकारों को पानी की सप्लाई बंद करनी पड़ती है. यानी जीरो-डे (Zero-day) घोषित करना पड़ता है. पानी के संकट वाले सबसे ज़्यादा प्रभावित इलाके मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका हैं, जहां 83% आबादी बहुत ज्यादा पानी के संकट का सामना कर रही है. साउथ एशिया में 74% आबादी जल संकट से जूझ रही है.

भारत में जल संकट की वजह क्या: भारत में जल संकट के कई कारण हैं. जैसे शहरीकरण, औद्योगीकरण और खेती के ऐसे तरीके जो लंबे समय तक नहीं चल सकते. तेजी से बढ़ती आबादी पानी की बढ़ती मांग और जल संकट, दोनों के लिए जिम्मेदार है. वहीं, जलवायु परिवर्तन के कारण बारिश कम हो रही है और इससे पानी के भंडारण पर असर पड़ रहा है.
पानी का सही प्रबंधन न होना और जल प्रदूषण भी कमी की वजह बनते हैं. इसके अलावा, भूजल का अत्यधिक दोहन, बारिश के पानी को जमा करने की अपर्याप्त व्यवस्था और पानी का गलत प्रबंधन भी संकट पैदा कर रहा है. पानी का प्रदूषण और सिंचाई के गलत तरीके जल संकट को और बढ़ा देते हैं, जिससे पानी की उपलब्धता और गुणवत्ता कम हो जाती है.
भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता कितनी: किसी देश में पानी की औसत सालाना उपलब्धता मुख्य रूप से मौसम और जमीन से जुड़े कारकों पर निर्भर करती है. लेकिन, प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता देश की आबादी पर निर्भर करती है. भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक पानी की उपलब्धता वर्तमान में लगभग 1,400 से 1,486 घन मीटर के बीच है.
यह आंकड़ा अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार जल-तनाव की स्थिति को दर्शाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, वैश्विक स्तर पर प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता का औसत 1,700 घन मीटर. आंकड़ा इससे कम होने पर जल तनाव की स्थिति बनती है. वहीं 1,000 घन मीटर से कम होने पर 'जल-अभावग्रस्त' (Water Scarce) माना जाता है. इस हिसाब से भारत जल तनाव की स्थिति में है.

देश में जल संकट लेने वाला है विकराल रूप: केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, साल 2001 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 1,820 घन मीटर थी. जो बढ़ती जनसंख्या के कारण 2031 तक घटकर 1,367 घन मीटर तक पहुंचने का अनुमान है. वहीं, स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो अनुमानों के अनुसार, 2050 तक भारत में प्रति व्यक्ति वार्षिक जल उपलब्धता घटकर लगभग 1,140 घन मीटर तक पहुंच जाएगी. जिसे जल संकट का एक विकराल रूप माना जा रहा है.
'डे जीरो' क्या है? देश के किन शहरों में यह लग चुका: 'डे जीरो' एक ऐसी स्थिति है जब किसी शहर या इलाके में लोगों को बांटने के लिए पीने का पानी खत्म हो जाता है. ऐसा संकट जलवायु परिवर्तन, आबादी बढ़ने और जल संसाधनों के खराब प्रबंधन की वजह से पैदा होता है. डे जीरो की स्थिति में पानी के इस्तेमाल पर पाबंदियां लगानी पड़ती हैं.
डे जीरो कॉन्सेप्ट 2018 में तब चर्चा में आया जब दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन शहर में पीने का पानी खत्म होने की नौबत आ गई थी. भारत में चेन्नई आधिकारिक तौर पर 19 जून, 2019 को डे जीरो की स्थिति में पहुंच गया था. नीति आयोग ने चेतावनी दी थी कि दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई समेत भारत के 21 बड़े शहरों में भूजल भंडार खत्म होने का खतरा है.
समुद्र का खारा पानी मीठे जल का मुख्य स्रोत: जीवन के लिए सबसे जरूरी मीठा पानी (पीने योग्य पानी), धरती पर मौजूद कुल पानी का सिर्फ 2.7% है. इस मीठे पानी का लगभग सारा हिस्सा बर्फ की चोटियों, ग्लेशियरों और बादलों में जमा है. मीठे पानी का जो थोड़ा सा हिस्सा बचता है, वह सदियों से झीलों और जमीन के नीचे के स्रोतों में जमा होता रहा है.
हैरानी की बात है कि समुद्र का खारा पानी ही धरती पर मीठे पानी का मुख्य स्रोत है. बारिश का लगभग 85% पानी सीधे समुद्र में गिरता है और कभी जमीन तक नहीं पहुंचता. दुनिया भर में होने वाली कुल बारिश का जो थोड़ा सा हिस्सा जमीन पर गिरता है, उससे झीलें, कुएं भरते हैं और नदियां बहती हैं. यही कारण है कि मीठा पानी एक दुर्लभ और कीमती चीज है. भारत में मीठे पानी के संसाधन बारिश, ग्लेशियर, सतह के पानी और जमीन के नीचे का पानी हैं.

किस सेक्टर में पानी की ज्यादा खपत: भारत में खेती, पानी की खपत करने वाला सबसे बड़ा सेक्टर है. पानी की कुल मांग का लगभग 80% हिस्सा खेती से जुड़ा है. अनुमानों के अनुसार, अकेले खेती के लिए निकाला जाने वाला भूजल, कुल भूजल इस्तेमाल का लगभग 87% है.
ग्लोबल वॉटर क्वालिटी मेट्रिक्स में भारत 120वें पायदान पर: येल यूनिवर्सिटी और कोलंबिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर्स के एनवायरनमेंटल परफॉर्मेंस इंडेक्स (EPI) में, भारत 180 देशों में 176वें स्थान पर रहा. हालांकि, असुरक्षित पीने के पानी के संपर्क में आने को मापने वाले खास सब-इंडिकेटर पर, भारत 180 देशों में 144वें स्थान पर रहा. वहीं, नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, ग्लोबल वाटर क्वालिटी मेट्रिक्स पर भारत की स्थिति बहुत खराब है. इसमें भारत 122 देशों में 120वें स्थान पर है. इसकी मुख्य वजह लगभग 70% पानी का दूषित होना है.
क्या AI और डेटा सेंटर जल संकट बढ़ा रहे: जलवायु परिवर्तन पानी की उपलब्धता को बहुत अनिश्चित बनाकर, सूखे की स्थिति को तेज करके और ताजे पानी के बुनियादी स्रोतों को कम करके संकट को और गंभीर बना देता है. वहीं, AI और डेटा सेंटर जैसी आधुनिक तकनीकें दुनिया भर में पानी के संकट को तेजी से बढ़ा रही हैं. इसका मुख्य कारण सर्वर को ठंडा रखने और बिजली बनाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में पानी की जरूरत है.
हालांकि, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अक्सर जलवायु परिवर्तन की समस्या को हल करने में मदद करने वाले टूल के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन इसका फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर सार्वजनिक बुनियादी सुविधाओं पर पानी की भारी खपत करने वाले एक छिपे हुए बोझ की तरह काम करता है. जब तक पारदर्शिता और 'क्लोज्ड-लूप लिक्विड कूलिंग' तरीकों (जिनमें पानी भाप बनकर नहीं उड़ता) को अपनाने के लिए जरूरी सरकारी नियम नहीं बनाए जाते, तब तक AI डेटा सेंटरों का तेजी से होता वैश्विक विस्तार स्थानीय स्तर पर पानी की कमी को सीधे तौर पर और बढ़ाएगा.
जल संकट का देश की GDP पर कितना असर: किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर पानी के संकट का असर बहुत गहरा, व्यापक और तेजी से गंभीर होता जा रहा है. हालांकि, पानी को अक्सर सिर्फ पर्यावरण या मानवीय मुद्दे के तौर पर देखा जाता है, लेकिन अर्थशास्त्री अब इसे मैक्रोइकॉनॉमिक (समष्टि-आर्थिक) स्तर पर एक बुनियादी जोखिम मानते हैं.
वर्ल्ड बैंक और 'ग्लोबल कमीशन ऑन द इकोनॉमिक्स ऑफ वाटर' जैसी प्रमुख वैश्विक रिपोर्टों के अनुसार, अगर पानी की कमी को नहीं रोका गया, तो 2050 तक वैश्विक GDP में औसतन 8% की गिरावट आ सकती है. इसमें सबसे गरीब और कम आय वाले देशों को 15% तक का भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
जब कोई नदी बहुत ज्यादा प्रदूषित हो जाती है, तो उसके निचले इलाकों में आर्थिक विकास 0.8% से 2.0% तक गिर जाता है. वहीं, मध्यम-आय वाले देशों में, जहां उद्योग तो बढ़ रहे हैं लेकिन नियम कमजोर हैं, वहां निचले इलाकों में GDP ग्रोथ आधी तक कम हो सकती है.
तो 17 करोड़ लोगों का भर जाता पेट: नाइट्रेट प्रदूषण के संपर्क में आने वाले शिशुओं का शारीरिक और मानसिक विकास रुक जाता है. बड़े होने पर, उनकी कमाई की क्षमता और प्रोडक्टिविटी 2% तक कम हो जाती है, जिससे देश के कुल वर्कफोर्स (काम करने वाले लोगों) में स्थायी रूप से कमी आती है. वहीं, पानी में ज्यादा खारापन होने से फसल की पैदावार खत्म हो जाती है. हर साल, पानी की खराब गुणवत्ता के कारण इतना अनाज बर्बाद हो जाता है, जिससे 17 करोड़ लोगों का पेट भरा जा सकता था.
6% GDP नुकसान का खतरा: जलवायु परिवर्तन के कारण पानी की कमी से 2050 तक संवेदनशील इलाकों (जैसे मध्य पूर्व और अफ्रीका के कुछ हिस्सों) में GDP 6% तक कम हो सकती है. साथ ही बड़े पैमाने पर पलायन और संघर्ष भी हो सकता है. हालांकि, इस नुकसान को पूरी तरह रोका जा सकता है. स्मार्ट वाटर मैनेजमेंट लागू करके, दक्षता बढ़ाकर और पानी का सिर्फ 25% हिस्सा ज्यादा मूल्य वाले कामों में लगाकर इन जलवायु प्रभावों को बेअसर किया जा सकता है.
जल संकट से देश हर साल 2 लाख लोगों की हो रही मौत: नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश में हर साल दूषित और अपर्याप्त पेयजल के कारण लगभग 2 लाख लोगों की मौत हो जाती है. ये मौतें मुख्य रूप से पानी से होने वाली गंभीर बीमारियों जैसे डायरिया, हैजा, टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस से जुड़ी हैं. इसके अलावा, असुरक्षित जल स्रोतों और बाढ़ जैसे कारणों से हर साल लगभग 39,000 लोग डूबने से भी अपनी जान गंवा देते हैं.
नल का दूषित पानी मेट्रो शहरों, राज्यों की राजधानियों और छोटे शहरों, सभी जगहों पर लोगों को बीमार कर रहा है. जनवरी 2025 से 7 जनवरी 2026 के बीच, 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 26 शहरों (जिनमें 16 राज्यों की राजधानियां शामिल हैं) में कम से कम 5,500 लोग सीवेज से दूषित पाइप वाले पानी के सेवन से बीमार पड़ गए. इनमें 34 की मौत हो गई.
एमपी के इंदौर में दूषित जल ने ली थी 35 की जान: खराब या सीवरेज-युक्त पानी पीने से डायरिया और उल्टी जैसी जानलेवा बीमारियां फैलती हैं. हाल ही में मध्य प्रदेश के इंदौर में दूषित पानी की आपूर्ति के कारण कई लोगों की जान जाने की दुखद घटनाएं सामने आई हैं. इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से फैले संक्रमण के कारण 35 लोगों की मौत हुई थी. साथ ही 1400 से अधिक लोग डायरिया और उल्टी-दस्त से पीड़ित हुए थे.
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