कहानी बाघों की; भारत में कभी थे 40 हजार बाघ, आज 3682 पर कैसे सिमटे?
देश में हर साल औसतन 150 बाघ की मौत हो रहीं, 5 साल में 832 की मौत सवाल खड़े कर रही. आईए जानते हैं, आखिर क्या है बाघों की कहानी...

Published : January 8, 2026 at 9:21 AM IST
|Updated : January 8, 2026 at 10:13 AM IST
हैदराबाद: अक्सर सुनाई पड़ता है...बाघ ने किसान को अपना शिकार बना लिया, मां की गोद से बच्चे को छीनकर ले गया, वगैरा-वगैरा...लेकिन, कभी ये 40 हजार की संख्या के पार थे. फिर एक समय आया जब ये विलुप्त होने के कगार पर आ गए. हालांकि, अब बाघों की संख्या में काफी हद तक सुधार हुआ है. लेकिन, साल दर साल बढ़ते मौत के आंकड़े खतरे की घंटी जरूर बजा रहे हैं.
वैसे, खुशी की बात ये है कि अपने देश भारत में सबसे ज्यादा बाघ पाए जाते हैं. वर्तमान में देश के 58 अभ्यारण्यों में 3682 बाघ हैं. जबकि, पूरी दुनिया में इनकी संख्या 5660 है. इस हिसाब से बाघों की संख्या दुनिया के मुकाबले भारत में 75 फीसदी है. यही कारण है कि भारत को बाघों की राजधानी कहा जाने लगा है. लेकिन, इसके बाद भी बाघों के जीवन पर संकट के बादल हैं.
बीते 5 साल की बात करें तो 832 बाघों की मौत हुई. औसतन हर साल 150 की मौत हुई. सबसे ज्यादा 2023 में 182 और 2025 में 167 मौतें हुईं. ये मौतें संरक्षण पर सवाल खड़े करती हैं. आईए ETV Bharat की रिपोर्ट में जानते हैं, संरक्षण में भारी सफलता के बाद भी बाघों पर संकट के बादल क्यों मंडरा रहे...

विलुप्ती के कगार से संरक्षण की ओर: सबसे पहले बात उस काल की करते हैं जब बाघ विलुप्त होने के कगार पर आ गए थे. ये पीरियड था 1970 के आसपास का. तब इनकी संख्या लगभग 1800 रह गई थी. जबकि, जब भारत 1947 में आजाद हुआ तब ये संख्या लगभग 40 हजार थी. इस हिसाब से ये संख्या काफी कम हो गई थी. इसके बाद भारत सरकार की ओर से बाघों के संरक्षण पर चर्चा शुरू हुई और प्रोजेक्ट टाइगर शुरू हुआ. 1972 में प्रोजेक्ट लॉन्च हुआ और 1973 से इसके काम में तेजी आई.
भारत का पहला बाघ अभ्यारण्य कहां पर है: प्रोजेक्ट टाइगर के शुरू होते ही सबसे पहले कर्नाटक के बांदीपुर में बाघों का अभ्यारण्य खोला गया. इसके बाद साल दर साल इनकी संख्या बढ़ती गई और वर्तमान में 58 अभ्यारण्य देश में हैं, जहां पर बाघों का संरक्षण होता है.

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा अभ्यारण्य: प्रोजेक्ट टाइगर के तहत सबसे नए अभ्यारण्यों में माधव राष्ट्रीय उद्यान और वीरंगना दुर्गावती बाघ अभ्यारण्य शामिल हैं. दोनों मध्य प्रदेश में हैं जो 2024 के अंत में बने. 18 राज्यों में फैले ये 58 संरक्षित क्षेत्र बाघों और उनके आवासों की रक्षा करते हैं. इनमें मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा 9 अभ्यारण्य हैं.
भारत में सबसे ज्यादा बाघ: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के अनुसार वर्तमान में भारत में बाघों की अनुमानित संख्या 3682 है. बाघों की संख्या 6 फीसदी सालाना बढ़ रही है. जहां भारत, नेपाल, भूटान और रूस में बाघों की संख्या बढ़ रही है, वहीं लाओस और वियतनाम जैसे दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में स्थिति खराब है. माना जाता है कि इन देशों के जंगल में बाघ लगभग विलुप्त हो चुके हैं.
किस अभ्यारण्य में सबसे ज्यादा बाघ: भारत के उत्तराखंड में स्थित कॉर्बेट अभ्यारण्य में बाघों की संख्या सबसे ज्यादा 319 है. बांदीपुर, नागरहोल, मुदुमलाई, बांधवगढ़ और दुधवा अभ्यारण्यों में 150 या उससे अधिक बाघ पाए जाते हैं. इसके अलावा काजीरंगा, कान्हा, पेंच (मध्य प्रदेश), ताडोबा, सत्यमंगलम और सुंदरबन में बाघों की संख्या 100 से 150 के बीच है. शेष 14 अभ्यारण्यों में बाघों की संख्या 50 से 100 के बीच है.

मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघ: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के आंकड़ों के अनुसार मध्य प्रदेश में सबसे ज्यादा बाघ संरक्षित हैं. यहां बाघों की संख्या 785 बताई गई है. इसके अलावा झारखंड और उत्तर पश्चिम बंगाल में बाघों की संख्या सबसे कम है. झारखंड में एक और उत्तर पश्चिम बंगाल में सिर्फ 2 बाघ हैं.
किस देश में सबसे कम बाघ
- वियतनाम: ग्लोबल टाइगर फोरम (GTF) का कहना है कि वियतनाम में कई साल से प्रजनन करने वाली मादा बाघों के कैमरे में कैद होने का कोई सबूत नहीं मिला है, जिसके चलते उन्हें जंगल में लगभग विलुप्त माना जा रहा है. आधिकारिक तौर पर यहां 5 से कम बाघों की संख्या बताई गई है.
- चीन: यहां पर लगभग 60 जंगली अमूर (साइबेरियाई) बाघों की संख्या बताई गई है. हालांकि, यह संख्या काफी कम है, लेकिन इसे संरक्षण की एक सफलता माना जाता है. क्योंकि इनकी आबादी वास्तव में बढ़ रही है.
- म्यांमार: सरकार द्वारा सत्यापित अंतिम आधिकारिक अनुमानों के अनुसार यहां पर लगभग 22 बाघ हैं. चीन के विपरीत यहां पर्यावरण की अस्थिरता के कारण बाघों की आबादी को खतरे में माना जाता है.
- कम्बोडिया: आधिकारिक तौर पर यहां एक भी बाघ नहीं है. 2016 में इन्हें विलुप्त घोषित किया जा चुका है. हालांकि, इस संकलन में कम्बोडिया टाइगर एक्शन प्लान (सीटीएपी) को मान्यता दी गई है, जिसमें भारत से बाघों को कार्डमम पर्वत श्रृंखला में पुनः स्थापित करना शामिल है.
5 साल में 832 बाघों की मौत: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 2020 और 2025 के बीच 832 बाघों की मौत हुई. औसतन हर साल 150 बाघों ने अपनी जान गंवाई. इनमें 2023 में सबसे ज्यादा 182 बाघों की मौत हुई. बीते साल यानी 2025 की बात करें तो 167 बाघों की मौत हुई. साल 2024 के मुकाबले 2025 में 41 बाघ ज्यादा मारे गए. बाघों की मौत की जो मुख्य वजह सामने आई है, उसमें उनमें वर्चस्व की जंग है.

बाघों की मौत के कारण
- बाघ का अपना एक क्षेत्र होता है. वह उसी में रहकर अपना शिकार करता है. उसमें कोई दूसरा बाघ आ जाए तो संघर्ष होता है. ठीक उसी तरह जैसे इंसानों में गैंगवार होती है. इंसानी आबादी बढ़ने और जंगल छोटे होने के कारण ये संघर्ष भी बढ़े हैं. जिससे बाघों की मौत का आंकड़ा बढ़ा है.
- वृद्धावस्था, बीमारी और शावकों की मृत्यु (2025 में 31 शावकों की मृत्यु हुई).
- बाघों का उनकी खाल, हड्डियों और अन्य शारीरिक अंगों के लिए शिकार किया जाना.
- बिजली का करंट भी बाघों की मौत का बड़ा कारण हैं. 2025 में 31 मामले सामने आए जो बिजली की बाड़ या लाइनों से जुड़े थे.
- सड़क/रेल दुर्घटनाओं में बाघ मारे जा रहे हैं. 2025 में 19 मामले सामने आए. जंगलों के बीच से आबादी के लिए रास्ता निकले होने और उस पर वाहनों के फर्राटा भरने की वजह से बाघ हादसों का शिकार हो रहे हैं.
- बाघ के मवेशियों का शिकार करने के बाद ग्रामीणों का गुस्सा भी मौत का कारण बन रहा है. बाघों को जहर देने या पीट-पीटकर मार डालने की घटनाएं हुई हैं. कर्नाटक में जहर देने का मामला हाल ही में आया है.
क्या है NTCA, क्यों किया गया था इसका गठन: राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) भारत सरकार के पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत एक वैधानिक निकाय है. इसकी स्थापना 2005 में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत बाघों और उनके आवासों (टाइगर रिजर्व) के संरक्षण और प्रबंधन के लिए की गई थी, जो बाघों की आबादी, उनके निवास स्थान और संबंधित संरक्षण पहलों की निगरानी करता है और 'प्रोजेक्ट टाइगर' को कानूनी ढांचा प्रदान करता है.
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