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चीन-जर्मनी को भी टक्कर देगी भारत की हाइड्रोजन ट्रेन; दुनिया में सबसे ज्यादा शक्तिशाली होगी, कब पटरी पर उतरेगी, कितना होगा किराया?

हरियाणा के जींद-सोनीपत रूट पर ट्रायल पूरा, हाइड्रोजन ट्रेन चलाने वाला पांचवां देश बनेगा भारत, एक ट्रेन की लागत 80 करोड़ रुपये.

भारत में जल्द चलेगी हाइड्रोजन ट्रेन.
भारत में जल्द चलेगी हाइड्रोजन ट्रेन. (Photo Credit; IANS)
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By ETV Bharat Hindi Team

Published : March 1, 2026 at 5:05 PM IST

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Updated : March 1, 2026 at 5:20 PM IST

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हैदराबाद : किसी भी देश की आर्थिक-सामाजिक तरक्की में रेलवे की भूमिका काफी अहम मानी जाती है. भारतीय रेल भी इसी रणनीति पर आगे बढ़ रही है. भाप इंजन के साथ शुरू हुआ रेलवे का सफर अब कई ऐतिहासिक बुलंदियों पर पहुंचने के लिए आमादा है. अगले साल बुलेट ट्रेन का सपना भी हकीकत में तब्दील हो जाएगा. इस बीच देश की पहली और दुनिया की सबसे ज्यादा शक्तिशाली हाइड्रोजन ट्रेन को लेकर भी बड़े अपडेट सामने आने लगे हैं.

साल 2030 तक नेट-जीरो कार्बन उत्सर्जक बनने की दिशा में रेलवे ने तेजी से अपने कदम आगे बढ़ा दिए हैं. हाइड्रोजन ट्रेन इसी स्ट्रेटजी का हिस्सा है. इससे डीजल और इलेक्ट्रिक इंजनों पर निर्भरता खत्म होगी. हाइड्रोजन ट्रेन से प्रदूषण नहीं होगा. यह शोर भी न के बराबर मचाएगी. 25 फरवरी को हरियाणा के जींद में हाइड्रोजन ट्रेन का रनिंग ट्रायल किया गया. यह ट्रेन दुनिया में सबसे ज्यादा लंबी होगी.

चेन्नई की इंटीग्रल कोच फैक्ट्री (ICF) में हाइड्रोजन ट्रेन के कोच का निर्माण चल रहा है. ddnews.gov.in के मुताबिक हाल ही में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने मीडिया को बताया कि हाइड्रोजन ट्रेन जल्द शुरू होने वाली है. हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा रेगुलेटरी क्लीयरेंस के बाद होगी. वहीं ट्रेन की स्पीड लिमिट तकरीबन 110 KM प्रति घंटा तय की गई है. यह ट्रेन दुनिया में सबसे ज्यादा लंबी भी होगी.

ईटीवी भारत के इस Explainer में हम हाइड्रोजन ट्रेन से जुड़े तकरीबन सभी सवालों के जवाब जानेंगे. मसलन हाइड्रोजन ट्रेन कहां से कहां तक चलेगी?, इसकी खासियत क्या है?, यह डीजल और इलेक्ट्रिक ट्रेनों से किस तरह अलग है?, सरकार इस प्रोजेक्ट पर कितना खर्च कर रही है ?, सबसे पहले हाइड्रोजन ट्रेन किस देश में चली थी?, मौजूदा समय किन देशों हाइड्रोजन ट्रेनें चल रहीं हैं?.

हाइड्रोजन ट्रेन की क्या है खासियत? : www.twi-global.com के अनुसार हाइड्रोजन ट्रेन कई खूबियों से भरपूर है. इसे नेक्स्ट जेनरेशन फ्यूल टेक्नोलॉजी के डेवलपमेंट की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. इसे भारत में ही डिजाइन और विकसित किया गया है. यह रेलवे की आत्मनिर्भरता का उदाहरण है. यह ब्रॉड गेज प्लेटफॉर्म पर दुनिया की सबसे लंबी (10 कोच) ट्रेन है. यह सबसे पावरफुल (2400 KW) हाइड्रोजन ट्रेन सेट है. इसमें 1200 KW की 2 ड्राइविंग पावर कार (DPCs) हैं. यानी इसमें एक इंजन आगे जबकि दूसरा पीछे लगा होगा. इसके अलावा 8 पैसेंजर कार (यात्री कोच) भी हैं.

डीजल-इलेक्ट्रिक ट्रेनों से किस तरह अलग है यह ट्रेन? : www.twi-global.com के मुताबिक डीजल इंजन से चलने वाली ट्रेनों में ग्रीनहाउस गैस एमिशन (CO2 और NOx) और फॉसिल फ्यूल (हाई स्पीड डीजल) ठीक से जल नहीं पाते हैं. इन ट्रेनों से प्रदूषण फैलता है. वहीं इलेक्ट्रिक ट्रेनें इसकी तुलना में स्वच्छ विकल्प देती हैं. हालांकि इसके बावजूद इन्हें चलाने में खर्च ज्यादा आता है. इनके लिए ओवरहेड लाइनों के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर काफी ज्यादा खर्च करना पड़ता है. वहीं हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनें महंगे इलेक्ट्रिफाइड ट्रैक के बिना दौड़ सकती हैं.

भारत की हाइड्रोजन ट्रेन कई खूबियों से भरपूर है.
भारत की हाइड्रोजन ट्रेन कई खूबियों से भरपूर है. (Photo Credit; Getty)

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कैसे काम करता है हाइड्रोजन ट्रेन का इंजन? : www.twi-global.com के अनुसार हाइड्रोजन ट्रेन की तकनीक अन्य ट्रेनों के मुकाबले काफी अलग है. इसमें हाइड्रोजन में मॉडिफाइड कम्बशन इंजन का इस्तेमाल करके पावर देने की क्षमता होती है. यानी प्रदूषकों के उत्सर्जन को कम करने के लिए कम्बशन (दहन) की प्रक्रिया में बदलाव किया गया है. इसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन फ्यूल सेल का इस्तेमाल होता है. ये सेल 2 हिस्सों के बीच केमिकल रिएक्शन से बिजली बनाते हैं. इनमें एक नेगेटिव एनोड जबकि एक पॉजिटिव कैथोड होता है.

फ्यूल सेल में हाइड्रोजन ऑक्सीजन के साथ मिलकर इलेक्ट्रिकल एनर्जी बनाता है. इसमें पानी ही एकमात्र वेस्ट प्रोडक्ट होता है. हाइड्रोजन यूनिवर्स में सबसे आम एलिमेंट है. इसे समुद्री पानी से निकाला जा सकता है. फ्यूल सेल हाइड्रोजन से केमिकल एनर्जी को बिजली में बदलते हैं. इसके अलावा पानी और गर्मी भी बनाते हैं.

किस तकनीक पर काम करते हैं अन्य ट्रेनों के इंजन? : www.twi-global.com के मुताबिक हाइड्रोजन ट्रेन के इंजन के काम करने की प्रक्रिया इलेक्ट्रोलिसिस (वह रासायनिक प्रक्रिया जिसमें बिजली का उपयोग करके किसी तरल पदार्थ को उसके मूल तत्वों में तोड़ा जाता है) से विपरीत होती है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इलेक्ट्रिक ट्रेनें मुख्य रूप से 25 KV AC (अल्टरनेटिंग करंट) ओवरहेड ट्रैक्शन सिस्टम पर काम करती हैं. ट्रेन की छत पर लगा पेंटोग्राफ (Pantograph) 25,000 वोल्ट के ओवरहेड तारों से बिजली लेता है. इस बिजली को ट्रांसफार्मर के जरिए कम किया जाता है. रेक्टिफायर इसे DC में बदलकर ट्रैक्शन मोटर को चलाता है.

वहीं ट्रेन के डीजल इंजन मुख्य रूप से डीजल-इलेक्ट्रिक तकनीक पर काम करते हैं. बड़ा डीजल इंजन जनरेटर/अल्टरनेटर के माध्यम से बिजली पैदा करता है. यह बिजली इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन मोटरों को ऊर्जा देती है. इन इंजनों में टर्बोचार्जर का उपयोग किया जाता है. ये शक्ति और क्षमता को बढ़ाते हैं. डीजल इंजनों से वायु प्रदूषण होता है. जबकि हाइड्रोजन ट्रेनों से इस तरह का कोई प्रदूषण नहीं होता है. एक्सपर्ट के मुताबिक रेल इंडस्ट्री को हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों को बड़े पैमाने पर चलाने के लिए हाइड्रोजन के प्रोडक्शन और डिस्ट्रीब्यूशन में निवेश की जरूरत है.

ग्रीन फ्यूल टेक्नोलॉजी पर करोड़ों खर्च कर रही सरकार.
ग्रीन फ्यूल टेक्नोलॉजी पर करोड़ों खर्च कर रही सरकार. (Photo Credit; Getty)

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एक हाइड्रोजन ट्रेन की कितनी है लागत? : हाइड्रोजन ट्रेन की लागत करोड़ो में है. प्रेस इंफार्मेशन ब्यूरो (PIB) की प्रेस रिलीज और railway technology.com के अनुसार हाइड्रोजन से चलने वाली एक ट्रेन की अनुमानित लागत करीब 80 करोड़ रुपये है. जबकि एक रूट पर इसके लिए ग्राउंड इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने पर करीब 60 करोड़ रुपये खर्च हो सकते हैं. अभी शुरुआती फेज में पहले ट्रायल रन के लिए एक पायलट प्रोजेक्ट लागू किया गया है. पहली हाइड्रोजन ट्रेन ट्रायल के बाद जींद से सोनीपत तक चलेगी. लगभग 90 किलोमीटर का ये सफर सामान्य ट्रेनों से करीब 2 घंटे में पूरा होता है, लेकिन हाइड्रोजन ट्रेन यात्रियों का काफी वक्त बचाएगी. इसका किराया भी अन्य ट्रेनों से कम रहने का अनुमान है.

हाइड्रोजन के साथ ऑक्सीजन का रिएक्शन करने के लिए फ्यूल सेल का इस्तेमाल करके ये ट्रेनें बायप्रोडक्ट के तौर पर सिर्फ पानी की भाप और गर्मी पैदा करती हैं. इससे ध्वनि प्रदूषण बेहद बहुत कम होता है. हाइड्रोजन ट्रेनें सोलर या विंड जैसे रिन्यूएबल सोर्स से मिलने वाले ग्रीन हाइड्रोजन से चलती हैं. इसके कारण ये असली सस्टेनेबिलिटी हासिल कर सकती हैं. यानी पर्यावरण पर कम से कम नकारात्मक प्रभाव डालते हुए लंबे समय तक इनका संचालन किया जा सकता है.

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कब और कहां चलेगी देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन? : जींद से सोनीपत रूट पर कई दिनों तक हाइड्रोजन ट्रेन का ट्रायल किया गया. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अंतिम ट्रायल भी पूरा हो चुका है. इसे सफल माना जा रहा है. उम्मीद है कि मंजूरी मिलने के बाद जल्द की यह पटरी पर नियमित रूप से दौड़ने लगेगी. प्रोजेक्ट को लेकर जींद जंक्शन पर ही हाइड्रोजन उत्पादन और रिफ्यूलिंग प्लांट लगाया गया है. इस प्लांट पर लगभग 120 करोड़ रुपये खर्च किए गए हैं. सुविधाओं के लिहाज से भी हाइड्रोजन ट्रेन काफी एडवांस होगी. इसमें ऑटोमेटिक दरवाजे, डिजिटल डिस्प्ले होंगे. अंदर का डिजाइन भी काफी अलग होगा.

आगामी समय में रेलवे कई उपलब्धियों को हासिल करेगा.
आगामी समय में रेलवे कई उपलब्धियों को हासिल करेगा. (Photo Credit; Getty)

अब अन्य देशों में चल रही हाइड्रोजन ट्रेनों की खासियत के बारे में जानेंगे

जर्मनी : alstom.com के अनुसार जर्मनी में किसी भी दूसरे देश के मुकाबले सबसे ज्यादा हाइड्रोजन ट्रेनें चलती हैं. साल 2018 में कोराडिया आईलिंट हाइड्रोजन ट्रेन दुनिया में पहली बार कमर्शियल सर्विस में आ गई थी. यह एक लो फ्लोर पैसेंजर ट्रेन है. इसमें क्लीन एनर्जी कन्वर्जन, फ्लेक्सिबल एनर्जी स्टोरेज, ट्रैक्शन पावर और एनर्जी के स्मार्ट मैनेजमेंट जैसे सस्टेनेबल फीचर्स शामिल हैं, इस ट्रेन में फ्यूल सेल कंपोजिशन और हाइड्रोजन फ्यूल टैंक ट्रेन की छत पर लगे हैं. ट्रेन के निचले हिस्से में ट्रैक्शन मोटर, ट्रैक्शन इन्वर्टर, AC/DC और DC/DC कनवर्टर, ऑक्सिलरी कनवर्टर और बैटरी कंपोजिशन लगे हैं.

ट्रैक्शन ड्राइव और ऑन-बोर्ड सिस्टम के लिए जरूरी बिजली एक फ्यूल सेल से मिलती है. यह हवा में स्टोर हाइड्रोजन को ऑक्सीजन के साथ मिलाकर एनर्जी बनाता है. इस ट्रेन में 150 यात्रियों के बैठने के लिए सीट है. जबकि इतने ही यात्री इसमें खड़े भी हो सकते हैं. यह ट्रेन अधिकतम 140 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है. यह एक हजार किमी तक की दूरी एक बार में तय कर सकती है. लोअर सैक्सनी में 14 जबकि फ्रैंकफर्ट मेट्रोपॉलिटन एरिया के लिए 27 हाइड्रोजन ट्रेनें चल रही हैं. सीमेंस मोबिलिटी की मिरियो प्लस H ग्रीन हाइड्रोजन ट्रेनें बर्लिन-ब्रैंडेनबर्ग और बवेरिया में चल रही हैं. इनकी रेंज 1200 किलोमीटर तक है. टॉप स्पीड 160 किमी प्रति घंटा है.

चीन : fuelcellsworks.com के अनुसार चीन में साल 2025 में 10 मई से हाइड्रोजन ट्रेन चल रही है. इस ट्रेन का इस्तेमाल दक्षिण-पश्चिम चीन के गुइझोउ प्रांत के लिउपांशुई शहर के मेइजिन रेलवे स्टेशन पर शंटिंग ऑपरेशन के लिए किया जा रहा है. यह 60 किलोग्राम हाइड्रोजन से एक बार चार्ज होने पर 140 से 150 किलोमीटर तक चल सकती है. इसकी माल ढुलाई क्षमता 4500 टन से ज्यादा है. इस ट्रेन में लगभग 15 मिनट में ही ईंधन भरा जा सकता है. इस ट्रेन की रेंज 800 किलोमीटर है.

साल 2025 में ही 16 अक्टूबर को हाइड्रोजन से चलने वाली चीन की पहली टूरिज्म ट्रेन, 'किंगचुन' का चांगचुन में अनावरण किया गया. इसे नॉर्थईस्ट चीन में कम तापमान झेलने के लिए डिजाइन किया गया है. ठंडे मौसम में भी हाइड्रोजन फ्यूल सेल के परफॉर्मेंस में कोई फर्क नहीं पड़ता है.

दुनिया के 4 देशों में चल रहीं हैं हाइड्रोजन ट्रेनें.
दुनिया के 4 देशों में चल रहीं हैं हाइड्रोजन ट्रेनें. (Photo Credit; Getty)

जापान : hydrogenindustryleaders.com के अनुसार जापान ने HYBARI (हाइड्रोजन-हाइब्रिड एडवांस्ड रेल व्हीकल फॉर इनोवेशन) नाम की एक हाइड्रोजन से चलने वाली हाइब्रिड ट्रेन बनाई है. HYBARI जापान की पहली हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रायल ट्रेन है. यह टोक्यो के ताचिकावा में ताचिकावा स्टेशन और कावासाकी, कानागावा में कावासाकी स्टेशन को कनेक्ट करती है. साल 2030 तक इसका व्यावसायिक संचालन शुरू करने लक्ष्य रखा गया है.

HYBARI में हाइड्रोजन से चलने वाले फ्यूल सेल और स्टोरेज बैटरी को मिलाकर एक नया हाइब्रिड सिस्टम लगा है. ट्रेन के टैंक में स्टोर हाई-प्रेशर हाइड्रोजन को फ्यूल सेल सिस्टम में डाला जाता है. यह सिस्टम हवा से ऑक्सीजन के साथ केमिकल रिएक्शन से बिजली बनाता है. इसके बाद फिर बैटरी में स्टोर करके ट्रेन के इंजन को पावर देता है. ट्रेन का हाइब्रिड ड्राइव सिस्टम बिना किसी रुकावट और अच्छे से काम करता है.

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फ्रांस : alstom.com के अनुसार फ्रांस में एल्सटॉम के कोराडिया पॉलीवैलेंट (रेगियोलिस H2) और कोराडिया आईलिंट की अगुवाई में हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों तेजी से निर्माण और संचालन हो रहा है. यह पूरी तरह से प्रदूषण मुक्त और शांत ट्रेन है. इस ट्रेन में कई अलग-अलग तकनीकी का इस्तेमाल किया गया है. इनमें क्लीन एनर्जी कन्वर्जन, एफिशिएंट एनर्जी सप्लाई और स्टोरेज सिस्टम शामिल हैं. इंटेलिजेंट एनर्जी मैनेजमेंट सिस्टम भी ट्रेन में लगा है.

आगामी वर्षों में इन देशों में भी चलेंगी हाइड्रोजन ट्रेनें : कनाडा, इटली, सऊदी अरब, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड्स, पोलैंड, स्वीडन में भी हाइड्रोजन ट्रेनों को चलाने के लिए ट्रायल हो चुके हैं. एल्सटॉम के पास अभी यूरोपियन देशों से 41 हाइड्रोजन ट्रेन सेट के ऑर्डर हैं. यानी दुनियाभर के देशों का रुझान ग्रीन एनर्जी से संचालित होने वाली ट्रेनों की तरफ है. स्पेन ने भी हाइड्रोजन से चलने वाली ट्रेनों के अपने शुरुआती ट्रायल पूरे कर लिए हैं. अगले साल भारत में भी इसका विस्तार देखने को मिल सकता है. इसी साल जनवरी में देश में पहली स्लीपर वंदे भारत ट्रेन चलनी शुरू हुई थी. मार्च में दूसरी वंदे भारत स्लीपर ट्रेन भी चल सकती है.

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Last Updated : March 1, 2026 at 5:20 PM IST