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जहां कभी नक्सली फहराते थे अपना झंडा.. वहां 25 साल बाद आन-बान और शान से लहराया तिरंगा

80वें स्वतंत्रता दिवस पर ETV BHARAT की टीम कभी नक्सलियों का गढ़ रही 'गुरमाहा गांव' पहुंची, जहां 25 साल बाद झंडा लहराया. रिपोर्ट- राजेश कुमार

Gurmaha village Jamui
गुरमाहा गांव में 25 साल बाद फहराया गया तिरंगा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 15, 2026 at 5:40 PM IST

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जमुई : जिले के गुरमाहा गांव में 25 वर्षों बाद 80वें स्वतंत्रता दिवस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया गया. जिला प्रशासन के पदाधिकारियों और स्थानीय ग्रामीणों ने मिलकर राष्ट्रगान गाया. कभी इस सुदूर जंगली इलाके में नक्सली शीर्ष कमांडरों की याद में 'पिंड' बनाकर अपना झंडा फहराते थे. अब यहां हर तरफ शान से तिरंगा लहरा रहा है. दहशत का वह पुराना दौर अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका है.

नक्सली आतंक का खौफ खत्म : स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार पहले नक्सली आतंक के कारण लोग राष्ट्रीय ध्वज नहीं फहरा पाते थे. अपने घरों पर तिरंगा लगाने पर माओवादी उन्हें पुलिस का आदमी बताकर मार देते थे. वे बीहड़ में जंगल की समानांतर सरकार चलाते थे. ग्रामीणों को जबरन पीटकर मृत नक्सलियों के पिंड पर माला चढ़ाने के लिए ले जाया जाता था. लोग हमेशा भारी डर के साये में जीते थे.

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'75 साल में पहली बार देखा झंडारोहण': गुरमाहा गांव के ग्रामीण जानकी कोड़ा बताते हैं कि इस गांव में तीन टोला है और 45 परिवार हैं. खेती मजदूरी करते हैं. मेरी उम्र 75 साल है और मैंने आज तक गांव में तिरंगा फहरते नहीं देखा था.

"गांव में सड़क, बिजली, सरकारी स्कूल कुछ नहीं है. पहली बार यहां तिरंगा फहरते देखा है और काम भी शुरू हुआ है. थोड़ा और काम हो जाएगा तो सुविधा होगी. पहले प्रशासन के लोग भी नहीं आते थे. देखभाल के लिए कोई नहीं आता था. पहले राशन भी नहीं मिलता था. इस बार राशन मिला है. पहली बार गांव में भी विधानसभा चुनाव में वोट दिए थे."- जानकी कोड़ा, ग्रामीण, गुरमाहा गांव

सुरक्षाबलों का मोर्चा और अभियान : गुरमाहा में नक्सलियों ने करीब 12-15 वर्षों तक अपना क्रूर जंगल राज कायम रखा था. खौफ से परेशान होकर गांव के अधिकांश युवा बाहर पलायन कर गए थे. अत्यधिक दुर्गम और नेटवर्क विहीन इलाका होने से पुलिस भी आने से कतराती थी. फिर सुरक्षाबलों ने मोर्चा संभालकर वहां स्थाई कैंप बनाए. लगातार चले एंटी नक्सल ऑपरेशन के कारण यह क्षेत्र आखिरकार नक्सल मुक्त हो गया.

Gurmaha village Jamui
नक्सली आतंक का खौफ खत्म (ETV Bharat)

विकासात्मक बदलाव और मतदान : नक्सल समस्या से मुक्त होने के बाद गांव में विकास की नई किरणें पहुंचीं. वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव में गुरमाहा, चोरमारा, मुसहरीटांड, जमुनियाटांड और कुमरतरी के लोगों ने मतदान किया. अपने ही गांव में बने केंद्रों पर रिकॉर्ड वोट पड़े. पहले नक्सलियों ने स्कूल को बारूद से उड़ा दिया था, जिससे मतदान केंद्र 40 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय बनाना पड़ता था.

लोगों में खुशी की लहर : ग्रामीण महिला प्रमिला देवी, सबिता देवी, सुशीला देवी और आरती कुमारी कहती हैं कि आज से पहले गांव में तिरंगा नहीं फहराया गया था. इस बार तिरंगा लहराया है, जिसकी खुशी महिलाओं के चेहरों पर साफ देखी गई.

प्रशासनिक पहल और बुनियादी सुविधाएं : वर्ष 2025 में चोरमारा में पहली बार मतदान केंद्र बना था. इस वर्ष 2026 में प्रशासन की पहल से जन वितरण प्रणाली का राशन, नल-जल योजना और बिजली पहुंची. अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर उसी स्थान पर योग शिविर लगा, जहां नक्सली स्मारक था. ईटीवी भारत की टीम जब गांव पहुंची, तो ग्रामीण बिना किसी डर के खुलकर अपनी आपबीती सुना रहे थे.

Gurmaha village Jamui
हर घर में लहराया तिंरगा (ETV Bharat)

रणनीतिक भौगोलिक स्थिति : भौगोलिक स्थिति देखें तो जमुई, लखीसराय और मुंगेर का सीमावर्ती भीमबांध क्षेत्र घने जंगलों और पहाड़ों से घिरा है. नक्सलियों ने इसे सुरक्षित जोन समझकर अपना मुख्य डेरा डाला था. पुलिस कार्रवाई के दौरान वे आसानी से जंगल के रास्ते जिला बदल लेते थे. इस पर काबू पाने के लिए सुरक्षाबलों को 3 जिलों की संयुक्त पुलिस के साथ मिलकर अभियान चलाना पड़ता था.

दोतरफा मार और जबरन भर्ती : शुरुआत में नक्सली ग्रामीणों को पुलिस का मुखबिर मानकर प्रताड़ित करते थे, जबकि सुरक्षाबल उन्हें संदेह की नजर से देखते थे. पूर्व पंचायत समिति सदस्य नरेश कोड़ा ने बताया कि वर्ष 2000 में माओवादियों ने प्रवेश किया था. उन्होंने हर घर से दो युवकों को जबरन संगठन में भर्ती करने का क्रूर फरमान सुनाया. आनाकानी करने वाले परिवारों के लोगों को मार दिया जाता था.

Gurmaha village Jamui
गुरमाहा गांव (ETV Bharat)

"2000 में माओवादियों का प्रभाव था. जिन लोगों की ज्यादा जमीन थी, वह नक्सलियों के डर से यहां से भाग गए. नक्सली बोले कि हमारा राज चलेगा. नक्सली बनने के लिए मारा जाता था. नक्सली बनाने के लिए ग्रामीणों से उनका बेटा मांगते थे. जिसको 6 बेटा होता था, उसका 2 बेटा मांग लेते थे. नहीं देने पर मार दिया जाता था. हमें भी मारने की कोशिश की गई थी, लेकिन किसी तरह मैं बच गया."- नरेश कोड़ा, पूर्व पंचायत समिति सदस्य

मुख्यधारा से जुड़ाव : नक्सलियों की प्रताड़ना से बचने के लिए गांव के सभी युवा बाहर मजदूरी करने चले गए. नक्सलियों ने नरेश कोड़ा के चाचा सिकंदर कोडा की हत्या कर दी थी और उन पर भी हमला किया था. अब हालात सामान्य हो चुके हैं. प्रखंड कृषि पदाधिकारी ऋषिकेश कुमार की मौजूदगी में झंडोत्तोलन हुआ और ग्रामीण सरकार की मुख्यधारा और कल्याणकारी योजनाओं से जुड़ रहे हैं.

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25 साल बाद आन-बान और शान से लहराया तिरंगा (ETV Bharat)

"अब यहां स्थिति सामान्य हो चुकी है. लोग मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं. प्रशासन की ओर से जो भी सुविधा है, मिलती रहेगी. पूरे जमुई की तरह इस गांव में भी विकास कार्य होगा. बीडीओ सर बताए थे, बिजली का काम हो रहा है. पोल लग गया है. ग्रामीण भी पूरा सहयोग कर रहे हैं."- ऋषिकेश कुमार, प्रखंड कृषि पदाधिकारी

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